हिंदी आलोचना एवं समकालीन विमर्श/आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना पध्दति

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सन् १९३० ई. के आस-पास श्री नन्ददुलारे वाजपेयी 'प्रसाद', 'पन्त' और 'निराला' के समर्थक ओजस्वी आलोचक के रूप में हिन्दी साहित्य में आये थे। उनकी पहली कृति 'हिन्दी साहित्य:बीसवी शताब्दी (१९३२), उसके बाद जयशंकर प्रसाद (१९४०), प्रेमचन्द, आधुनिक साहित्य (१९५०), नया साहित्य:नये प्रश्न (१९५५) आदि। प्राचीन कवियों में वाजपेयीजी ने 'सूरदास' (१९५२), को अधिक महत्त्व दिया है। उनके स्फुट निबंधों के तीन संग्रह 'राष्ट्रभाषा की कुछ समस्याएं (१९६१), 'राष्ट्रीय साहित्य[१] तथा अन्य निबन्ध (१९६५) और प्रकीर्णिका (१९६५) भी प्रकाशित हुए हैं। आचार्य वाजपेयी के दिवगंत होने के बाद उनकी कई कृतियां प्रकाशित हुए- 'कवि सुमित्रानन्दन पन्त (१९७६), 'रस सिध्दांत (१९७७), साहित्य का आधुनिक युग (१९७९), वस्तुत: उनकी अन्तिम कृति 'नयी कविता' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस प्रकार छायावाद-युग से चलकर 'नयी कविता' तक की समीक्षा यात्रा करते हुए उन्होंने हिन्दी आलोचना के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। [२]

नन्ददुलारे वाजपेयी जी का कहना है कि स्थूल व्यवहारवाद को निस्सीम बतलाकर और रहस्यवाद की कनकौए से तुलना कर विद्वान शुक्लजी ने नवीन कविता के साथ अन्याय किया है। [३]वड्सवर्थ, शैली और पन्त तो शुक्लजी के भी प्रिय कवि थे। वाजपेयीजी ने वड्सवर्थ, शैली की जिन विशेषताओं का उल्लेख किया है उसे शुक्ल जी स्वाभाविक रहस्यभावना कहते हैं और इसकी अभिव्यक्ति के वे प्रशंसक हैं। जबकि वाजपेयीजी कहते है- हिन्दी के कवियों में यदि कहीं रमणीय और सुन्दर अद्वैती रहस्यावाद है तो जायसी में। अतः 'नवीन कविता' यानी छायावाद के साथ अन्याय करने का प्रश्न आवश्य विचारणीय है। वाजपेजी का विचार था कि छायावाद की काव्य शैली योरोप से बंगाल होती हुई हिन्दी में आई हैं। ...रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रभाव से हिन्दी की स्वच्छन्दतावादीधारा श्रीधर पाठक से होकर मुकुटधर पाण्डेय आदि की कविताओं के द्वारा आगे बढ़ रही थी कि छायावाद की धूम मची। छायावाद पर रवीन्द्रनाथ के प्रभाव को किसी ने नहीं नकारा है। शिकायत यह है कि शुक्लजी छायावाद को काव्य शैली [४] मात्र मानते हैं। वाजपेयी जी ने छायावाद की भावभूमि को पहचाना तथा शुक्ल के छायावादी सम्बन्धी विचारों की सीमाओं का उल्लेख पॅ. शान्तिप्रिय द्विवेदी और डाॅ. नगेन्द्र आदि आलोचकों ने भी किया। छायावाद के कवि 'प्रसाद' पर वाजपेजी ने कई निबन्ध लिखे हैं, जिनका संकलन 'जयशंकर प्रसाद' में हुआ है। कामायनी को शुक्लजी ने एकांकी काव्य समझा था उनका [५]मत था कि- "जिस सम्बन्ध का पक्ष कवि ने अनर्थ में सामने रखा है उसका निर्वाह रहस्यवाद की प्रकृति के कारण काव्य के भीतर नहीं होने पाया है। पहले कवि ने कर्म को बुध्दि या ज्ञान के बिन्दुओं को अलग-अलग रखा जबकी वाजपेयी जी कामायनी के अन्तर्गत बुध्दि और हृदय के समन्वय की वकालत करते हैं, उनका विचार है कि- "मनु जितनी बुध्दि का भार सहज रूप से वहन कर सकता है, अथवा जितनी अतिरिक्त बुध्दि वह संभाल सकता है, उतनी ही उसे धारण करनी हैं...किन्तु मनु तो उतने से सन्तुष्ट नहीं हुआ और बुध्दि का अधिपति बनने का दम भरने लगा। अन्यथा वह ऐसा दुस्साहस का काम न करता। आधुनिक मानव भी तो यही कर रहा है। वह मन की[६]शक्ति या पहुंंच के बाहर बुध्दि को दौडा़ कर जो भयानक अविष्कार करता जा रहा है, उसका परिणाम क्या वह अभी नहीं भोग रहा? क्या इसी पध्दति पर चलने से आज निकट भविष्य में ही मानवीय सभ्यता के विनाश की आशंका नहीं हो रही? [७]

हिन्दी साहित्य: बिसबी शताब्दी की भूमिका में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए वाजपेयी जी ने आलोचना सम्बन्धी अपनी सात चेष्टाओं की ओर संकेत किया- कवि की अन्तवृतियों का अध्ययन, कलात्मक सौष्ठव का अध्ययन, टकनीक (शैली), का अध्ययन, आदि। [८] 'नया साहित्य: नये प्रश्न' में अपनी समिक्षा सम्बन्धी मान्यताओं को स्पष्ट करते हुए वाजपेयी जी ने कहा है- 'प्राचीन साहित्य और समीक्षा मोटे तोर पर आर्दशवादी रही हैं। उसमें बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियों के प्रभाव के आकलन का प्रश्न कम रहा है। साहित्य की प्रेषणीयता के सम्बन्ध में 'साधारणीकरण' सम्बन्धी व्यंजना या ध्वनि-सिध्दांत भारत की विशेष सम्पति है। प्रकट है कि वाजयेयी जी पाश्चात्य और भारतीय सिध्दांतों के सुन्दरतम तत्त्वों का समन्वय चाहते हैं। वे भारतीय विचारधारा को आदर्शोन्मुख रखते हुए 'स्वस्थ' और विकासोन्मुख 'यथार्थवाद' को भी स्वीकार करना चाहते हैं। [९]

नई कविता की प्रतिष्ठा के बाद वे उसके वैचारिक आधार की तलाश करते हुए वे 'मानववाद' और सैक्लूलरिज्म तक आते हैं। वे कहते हैं- 'नई कविता की कुछ रचनात्मक उपलब्धियां भी है, जो आधुनिक बोध से ग्रहीत हुई है। उनमें से मुख्य वह 'मानववाद' है, जो एक ओर आध्यात्मिक भूमिका से पृथक रहता हैं। दूसरी ओर वर्ग-संघर्ष की कठोरता से भी रहित है। वर्तमान युग में विशेषकर भारतीय भूमिका पर 'सिक्यूलरिज्म' एक व्यापक विचार दृष्टि है। उसी का साहित्य रूपान्तर 'नई कविता' के मानवतावादी स्वरूप में प्रतिबिम्बित है। [१०] अतः जिस प्रकार आचार्य शुक्ल 'छायावाद' से टकराते हुए भी अपने लोकमंगलवादी नैतिक चिन्तन भूमि से बहुत आगे नहीं बढ़ पाते, उसी प्रकार आचार्य वाजपेयीजी प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता से टकराते हुए भी अपने स्वच्छन्दतावादी चिन्तन-भूमि का अतिक्रमण नहीं कर पाते।[११]

संदर्भ[सम्पादन]

  1. हिन्दी आलोचना शिखरों का साक्षात्कार - रामचन्द्र तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, २०१४, पृष्ठ- ७०
  2. हिन्दी आलोचना शिखरों का साक्षात्कार - रामचन्द्र तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, २०१४, पृष्ठ- ७१
  3. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, २०१८, पृष्ठ-१२८
  4. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, २०१८, पृष्ठ-१२९
  5. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, २०१८, पृष्ठ-१३०
  6. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, २०१८, पृष्ठ-१३१
  7. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, २०१८, पृष्ठ-१३२
  8. हिन्दी आलोचना शिखरों का साक्षात्कार - रामचन्द्र तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, २०१४, पृष्ठ- ७२
  9. हिन्दी आलोचना शिखरों का साक्षात्कार - रामचन्द्र तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, २०१४, पृष्ठ- ७३
  10. हिन्दी आलोचना शिखरों का साक्षात्कार - रामचन्द्र तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, २०१४, पृष्ठ- ८०
  11. हिन्दी आलोचना शिखरों का साक्षात्कार - रामचन्द्र तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, २०१४, पृष्ठ- ८२