हिंदी आलोचना एवं समकालीन विमर्श/भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना

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Bharatendu Harishchandra 1976 stamp of India.jpg

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र युग में कई साहित्यिक विधाओं का नवीनीकरण हुआ। इनमें से एक आलोचना भी थी। भारतेन्दु का व्यक्तित्व भारतीय पुनर्जागरण का साहित्यिक प्रतीक और हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग के प्रर्वतन का सूचक था उन्होंने हिन्दी साहित्य को एक नये मार्ग पर खड़ा किया "भारतेन्दु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य सन्तों की कुटिया से निकालकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुंच गया था, उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मन्दाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ उसे दरबारीपन से निकालकर लोकजीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया।

भारतेन्दु युग का साहित्य जनवादी इस अर्थ में हैं कि वह भारतीय समाज के पुराने ढांचे से सन्तुष्ट न रहकर उसमें सुधार भी चाहता है। वह केवल राजनीतिक स्वाधीनता का साहित्य न होकर मनुष्य की एकता, समानता और भाईचारे का भी साहित्य हैं। जीवन को समझने-बूझने और दिखने की भारतेन्दु की निश्चित दृष्टि है, साहित्य को वे वृहत्तर जीवन की संगती में देखते हैं, उसमें अलग या बाहर नहीं। १८७४ ई. में उन्होंने विलायती कपड़े का बहिष्कार करने का व्रत लिया था और देशवासियों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दी थी। भारतेन्दु स्वदेशी आंदोलन के ही अग्रदूत न थे। वे समाज-सुधारकों में स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, विदेश यात्रा आदि के समर्थक थे।[१]

पहले कहा गया है कि भारतेन्दु पुनर्जागरण के प्रतीक या प्रतिनिधि साहित्यकार थे। जागरण का पहला लक्षण आंखों का खुलना है। आंखें खोलकर जाग्रत व्यक्ति अपने आसपास को देखता है। अपनी स्थिति का निश्चय करता है और तदनुसार उधोग में लग जाता है। यानी यथार्थबोध जाग्रत व्यक्ति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। इस प्रकार यथार्थ-बोध, बिषमता-बोध और इस बिषमता से उबरने की छटपटाहट ये वे तीन भेदक लक्षण है जो भारतेन्दु युग को रीतिकालीन साहित्य से अलग करते हैं और इन्हीं कारणों से भारतेन्दु युग हिन्दी के आधुनिक साहित्य का प्रर्वतक युग है। [२]

हिन्दी आलोचना का इतिहास रीतिकाल के थोड़ा पहले शुरू होता है। सच तो यह है कि रीतिकाल का रीतिबध्द साहित्य रीतिवादी आलोचना से प्रभावित है, और लक्षणों के उदाहरण रूप में रचा गया है। रीतिकालीन लक्षण ग्रन्थों का उपजीव्य संस्कृत का काव्य-शास्त्र है। संस्कृत काव्य-शास्त्र के चार प्रसिद्ध सम्प्रदाय १. भामह, उद्भट का अलंकार संप्रदाय, २. कुन्तक का वक्रोक्ति सम्प्रदाय ३. वामन का रीति सम्प्रदाय ४. आनन्दवर्धन का ध्वनि सम्प्रदाय। रीतिकाल में हिन्दी का जो काव्यशास्त्र रचा गया ,वह इन्हीं सम्प्रदायों की नकल पर। कहा जाता है कि 'हिमतरंगिणी' के लेखक कृपाराम हिन्दी के सर्वप्रथम काव्यशास्त्री थे। उन्होंने १६ वी. शताब्दी में ही थोड़ा बहुत रस-निरूपण किया था, लेकिन हिन्दी में काव्य-रीति का सम्यक् समावेश पहले-पहल आचार्य केशव ने ही किया। पं. रामचन्द्र शुक्ल ने रीतिकालीन काव्य शास्त्र की सिमाओं की ओर संकेत करते हुए लिखा है- इस एकीकरण का प्रभाव अच्छा नहीं पड़ा। आचार्यत्व के लिए जिस सूक्ष्म विवेचन और पर्यालोचन-शक्ति की अपेक्षा होती है उसका विकास नहीं हुआ। कवि लोग दोहे में अपर्याप्त लक्ष्ण देकर अपने कविकर्म में प्रवृत हो जाते थे। इसका कारण यह भी था कि उस समय गध का विकास नहीं हुआ था। जो कुछ लिखा जाता था वह पध में ही अतः पध में किसी बात की सम्यक् मीमांसा या उस पर तर्क-वितर्क नहीं हो सकता। [३]

ये लक्षण ग्रन्थ रसवादी दृष्टि से लिखे गए थे और रस युक्त वाक्य को ही काव्य मानते थे। डाॅ. रामविलास शर्मा के निबन्ध 'बालकृष्ण भट्ट और हिन्दी आलोचना का जन्म' नामक अध्याय में भट्टजी के "साहित्य जन-समूह का विकास है।" का उल्लेख किया है। लेखक के नाम से ही भट्टजी का आधुनिक दृष्टिकोण प्रकट हो जाता है। अतः जनसमूह के हृदय की भावनाओं का आग्रह करके ही हिन्दी की आलोचना रीतिकालीन केंचुल उतारकर आधुनिक बनी। पं. रामचन्द्र शुक्ल ने आधुनिक युग को गध युग कहा। नाटक, पत्र-पत्रिका, उपन्यास, कहानी इन सबमें गध सहसा साहित्य पर फट पड़ता है। देखनेवालों में यह बात छिपी नहीं रह सकती कि वैचारिकता गंध में तो है ही, कविता में भी है। कारण यह है कि इस काल का समूचा साहित्य प्रधानत: विचारपरक और इतिवृत्तात्मक है।[४]

भारतेंदु ने नाटक पर विचार करते समय उसकी प्रकृति, समसामयिक जनरूचि एवं प्राचीन नाट्यशास्त्र की उपयोगिता पर विचार किया है। उन्होंने बदली हुई जनरूचि के अनुसार नाट्यरचना में परिवर्तन करने पर विशेष बल दिया है। यधपि भारतेन्दु युग में विशिष्ट साहित्यांग के रूप में आलोचना का उल्लेखनीय विकास नहीं हुआ, किन्तु आलोचना दृष्टि का भरपूर विकास हुआ। यह दृष्टि पत्र-पत्रिकाओं के मध्यम से विकसित होती दिखाई पड़ती है। हरिश्चन्द्र मैंगनीज, हरिश्चन्द्र चन्द्रिका, भारतमित्र, सारसुधानिधि, बाह्मण आदि विविध बिषयों पर लिखित टिप्पणियां है। आलोचना के अन्तर्गत किसी सम्पूर्ण कृति के गुण-दोषों की समीक्षा का कार्य हिन्दी में चौधरी बदरी नारायण 'प्रेमघन' और बालकृष्ण भट्ट द्वारा प्रारम्भ हुआ।[५]

प्रेमघनजी ने लाला श्रीनिवासदास के नाटक संयोगिता स्वयंवर की समालोचना आनन्द कादम्बिनी में और हिन्दी प्रदीप में बालकृष्ण भट्ट ने सच्ची समालोचना नामक शिर्षक में किया। आलोचना जितनी सच्ची थी उतनी ही कटु, भट्टजी ने ऐतिहासिक आख्यानों के साहित्यिक उपयोग, देशकाल, पात्रों की स्वाभाविकता और रचना की जीवंतता इन सब बातों के आधार पर कीये। वे कहते है- क्या केवल किसी पुराने समय ऐतिहासिक पुरावृत की छाया लेकर नाटक लिख डालने, विख्यात राजा या रानी के आने से ही वह ऐतिहासिक हो जाएगा। यदि ऐसा है तो गप्प हांकनेवाले दास्तानगो और नाटक के ढंग में कुछ भी भेद न रहा। [६]

भट्टजी ने श्रीधर पाठक के द्वारा अनूदित गोल्डस्मिथ की कृति 'हरमिट' की भी समालोचना 'हिन्दी प्रदीप में की थी। यह समालोचना प्रशंसाकक थी जिसमें भट्टजी का भिन्न रूप प्रकट होता है। हम हिन्दीभाषियों के लिए अंग्रेजी बड़े काम की है, इसमें कोई संदेह नहीं, किन्तु हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति अपनी भाषा में ही हो सकती है। हमारे मित्र पाठक महाशय ने अपने इस परिश्रम से हमें अच्छी तरह जता दिया कि कविता के पच्छिमी संस्कार हमारे लिए मनोरंजन और दिलचस्प नहीं हो सकते, अंग्रेजी अत्यंत विस्तृतभाषा और उन्नति के शिखर पर चढ़ी हुई है, परन्तु कविता के अंश में हमारी देशी भाषाओं से कभी होड़ नहीं कर सकती। 'हरमिट' का मूल रूप हमें उतना अच्छा न लगे किन्तु अंग्रेजों को उसी प्रकार प्रिय होगा जैसे हमें उसका अनुवाद या अपनी भाषा की कोई अन्य अच्छी कृति। आगे चलकर आलोचना का स्वरूप अधिकाधिक स्पष्ट हुआ। यह कार्य आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और इनके युग के अन्य लेखकों द्वारा हुआ। [७]

संदर्भ[सम्पादन]

  1. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ- १३,१४
  2. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ- १४,१५
  3. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ- १५,१६
  4. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ- १६,१७
  5. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ- १८
  6. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ- २०,२१
  7. हिन्दी आलोचना- विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ- २१,२२