हिंदी आलोचना एवं समकालीन विमर्श/रामविलास शर्मा की आलोचना पद्धति

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हिंदी आलोचना में रामविलास शर्मा की आलोचना पद्धति 'प्रगतिवादी समीक्षा' के आधार स्तंभ के रूप में स्वीकार की गई है। उनकी आलोचना का क्षेत्र न केवल विषय की दृष्टि से बल्कि कार्य की दृष्टि से भी अत्यधिक विस्तृत है। उन्होंने हिंदी आलोचना की चर्चा करते हुए संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य, भाषा विज्ञान, इतिहास, मार्क्सवाद, उपनिवेशवाद, समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों पर गहराई से विचार किया है। उनकी आलोचना का काल भी प्रायः १९३४ (निराला जी की कविता) से शुरु होकर २००० ई. (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश) तक लगभग सात दशकों में विस्तृत है। इस रूप में समय के साथ-साथ कुछ बाहरी परिवर्तन तो उनकी आलोचना में दिखाई देते हैं पर जैसा कि उन्होंने खुद कहा है कि उनका दृष्टिकोण तो मूलतः एक ही है जो समय के साथ-साथ कुछ बदल गया है। उन्हें आलोचकों में रामचंद्र शुक्ल (आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना), उपन्यासकारों में प्रेमचंद (प्रेमचंद और उनका युग) तथा कवियों में निराला (निराला की साहित्य साधना) सर्वाधिक प्रिय हैं।

किसी आलोचक का मूल्यांकन मूलतः उस दृष्टिकोण का मूल्यांकन होता है जिसे वह अपनी कृतियों में धारण करता है। इस दृष्टिकोण से देखें तो डॉ. शर्मा मूलतः एक मार्क्सवादी रचनाकार हैं, किंतु उन्होंने अपने सृजनात्मक विवेक से मार्क्सवाद का एक प्रगतिशील संस्करण तैयार किया है। इनके लिए प्रगतिशीलता किसी भी परंपरा का सकारात्मक निषेध है। उन्होंने अपनी पुस्तक 'भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद' में स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार लेनिन आदि दार्शनिकों ने मार्क्सवाद को परिस्थितियों के अनुकूल बनाया है वैसे ही भारत की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मार्क्सवाद में आवश्यक परिवर्तन किए जा सकते हैं।

डॉ. शर्मा न केवल मार्क्सवाद में संशोधन की बात करते हैं बल्कि करके दिखाते भी हैं। वे सिद्ध करते हैं कि मार्क्स द्वारा विश्लेषित औद्योगिक पूंजीवाद चाहे इंग्लैंड में पहले आया हो किंतु पूंजीवाद का एक और प्रकार व्यापारिक पूंजीवाद १२वीं-१३वीं शताब्दी में ही आ चुका था। मार्क्स ने पूंजी या उत्पादन प्रणाली को 'आधार' तथा शेष सामाजिक पक्षों को 'अधिरचना' माना था तथा आधार में परिवर्तन से अधिरचना की स्थिति को प्रभावित माना था। रामविलास जी इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं, क्योंकि पुरानी अधिरचना के तत्व लिए बिना नई अधिरचना नहीं बन सकती। वे आर्थिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक कारणों को भी महत्व देते हैं। क्रांति में मजदूरों के साथ किसानों की भूमिका को भी स्वीकार करते हैं, इस प्रकार मार्क्सवाद का एक नया संस्करण तैयार करते हैं।

साहित्य के संबंध में भी उनकी प्रमुख मान्यताएँ या तो मौलिक हैं या सामाान्य प्रगतिवादियों से अलग हैं। सबसे पहले वे 'सौंदर्य की वस्तुगत सत्ता और सामाजिक विकास' नामक निबंध में सौंदर्य को केवल व्यक्ति या विषय में नियत करने के स्थान पर दोनों की अंतर्क्रिया के रूप में देखते हैं। वे साहित्य को भाषा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, समाज और भौगोलिक परिवेश से बनने वाली जातीयता (Nationality) से जोड़कर देखते हैं। उर्वशी की समीक्षा करते हुए प्रगतिशील आंदोलन के लोकवादी स्वरूप के भीतर रस सिद्धांत को स्वीकार कर लेते हैं। निराला की महानता को स्पष्ट करते हुए उनकी जन्मजात प्रतिभा को स्वीकार करते हैं और प्रगतिशील आंदोलन में प्रेम की संभावना को घोषित रूप से स्वीकृति देते हुए कहते हैं - "प्रेम और प्रगतिशील विचारधारा में कोई आंतरिक विरोध नहीं लेकिन स्वामी विवेकानंद से प्रभावित होेने वाले क्रांतिकारी यह समझते आए थे कि क्रांति और ब्रह्मचर्य का अटूट संबंध है जैसे आजकल के बहुत से कवि और कहानीकार समझते हैं कि आधुनिकता बोध का अटूट संबंध परकीया प्रेम से है।" इसी सृजनात्मक शक्ति का परिणाम है कि वे अपनी प्रगतिशीलता में वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति के साहित्य का सूक्ष्म विश्लेषण कर पाते हैं।

रामविलास जी की व्यावहारिक आलोचना का प्रस्थान बिंदु रामचंद्र शुक्ल हैं। उन्होंने उस समय के आलोचकों द्वारा शुक्ल जी की आलोचना का खंडन करने की प्रवृत्ति को देखते हुए उनके महत्व को वैसे ही स्थापित किया जैसे उपन्यासकार के तौर पर प्रेमचंद और कवियों के रूप में निराला को। उनका मानना था कि शुक्ल जी ने आलोचना के माध्यम से उसी सामंती संस्कृति का विरोध किया जिसका उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद और कविता के माध्यम से निराला ने। उन्होंने शुक्ल जी के छायावाद संबंधी मत को समझाते हुए तर्क दिया कि वे नएपन के नहीं बल्कि अगोचरता, परोक्षता तथा लाक्षणिकता के विरुद्ध थे। अगर ऐसा न होता तो वे प्रसाद की लोकपक्ष समन्वित कविता तथा पंत की प्राकृतिक रहस्य भावना का समर्थन न करते। रीति काव्य के संबंध में उन्होंने डॉ. नगेन्द्र के मत का खंडन करते हुए शुक्ल जी के मत की पुनः प्रतिष्ठा की तथा संत साहित्य की समीक्षा में शुक्ल जी के अधूरे कार्य को पूरा करते हुए उसके महत्व का उल्लेख किया।

रामविलास शर्मा की साहित्यिक आलोचना का महत्वपूर्ण बिंदु निराला की साहित्य साधना है, जो कि वस्तुतः रामविलास जी की ही साहित्य साधना है। इस रचना के पहले खंड में उन्होंने निराला के व्यक्तित्व तथा उनकी निर्माणकारी परिस्थितियों की समीक्षा की है। यह हिंदी समीक्षा का वह दुर्लभ बिंदु है जहाँ व्यक्तित्व और कृतित्व अलग-अलग न रहकर एक दूसरे में घुल मिल जाएं। निराला हिंदी में प्रायः शक्ति, ऊर्जा तथा ओज के रचनाकार माने गए हैं किंतु डॉ. शर्मा ने उनके साहित्य का गहरा विश्लेषण करते हुए करुणा को उसके मूल भाव के रूप में प्रतिष्ठित किया तथा उन्हें पश्चिम की महान ट्रेजडी लेखन की परंपरा से संबद्ध किया। इतना ही नहीं उन्होंने निराला-साहित्य के कला पक्ष का भी विस्तृत अध्ययन किया। ट्रैजिक सेंस की दृष्टि से वाल्मीकि, भवभूति तथा तुलसी से और समग्रता की दृष्टि से टैगोर, तुलसी और सूर से निराला की तुलना और मूल्यांकन किया है।

रामविलास जी ने उन रचनाकारों के महत्व की स्थापना की जो किसी न किसी रूप में साहित्य की जनवादी परंपरा से जुड़े हुए थे। ऐसे रचनाकारों में प्रेमचंद का नाम अग्रगण्य है। उनके 'सेवासदन' को डॉ. शर्मा ने नारी पराधीनता को उजागर करने वाला उपन्यास तो गोदान को ग्रामीण और शहरी कथाओं को मेहनत और मुनाफे की दुनिया का अंतर बताने वाला माना। इसके अतिरिक्त 'भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ' में भारतेंदु तथा उनके युगीन लेखकों के महत्व का अंकन किया तथा 'महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण' में नवजागरण के संदर्भ में द्विवेदी जी के आर्थिक-सामाजिक व अन्य विषयों के विश्लेषण को महत्व प्रदान किया।

रामविलास शर्मा की एक सीमा यह है कि वे जिस रचनाकार को पसंद नहीं करते उसके प्रति विध्वंसात्मक रवैया अपना लेते हैं। उनकी आलोचना इस बात को भी लेकर की जाती है कि वे पहले अपना शत्रु तय कर लेते हैं फिर उसके विचारों को पढ़कर तथा संभावित विचारों की कल्पना करके आक्रामक शैली में आलोचना लिखते हैं। इस दृष्टि से पंत की 'स्वर्ण किरण' और 'स्वर्ण धूलि' की समीक्षाएँ महत्वपूर्ण हैं। अज्ञेय और मुक्तिबोध के प्रति 'नई कविता और अस्तित्ववाद' में व्यक्त उनके विचार भी इसी पूर्वग्रह का परिणाम कहे जा सकते हैं। हालांकि ध्वंसात्मक भंगिमा रखते हुए भी वे आलोचकों को चुनौती देते हैं कि जो बातें मुझसे छूट गई हों, उन्हें प्रकाश में लाइए और जो बातें मैंने गलत कहीं हों उनका तर्कपूर्ण खंडन करिए ('मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य' में व्यक्त विचार)। उनकी इस चुनौती को हिंदी आलोचना में नामवर सिंह और मैनेजर पांडे ने स्वीकार किया तथा छायावाद, नई कविता, मुक्तिबोध और साहित्य के इतिहास दर्शन से संबंधित विभिन्न विषयों पर एक समानांतर विचार प्रस्तुत किया।

समग्र रूप में रामविलास शर्मा के आलोचना कर्म के संबंध में कहा जा सकता है कि वे विस्तार और गहराई की दृष्टि से अप्रतिम हैं। अपने मौलिक चिंतन तथा लोकबद्ध मान्यताओं के कारण प्रगतिशील समीक्षा की धुरी बन जाते हैं। उनकी आक्रामक शैली कहीं-कहीं औदात्य का अतिक्रमण अवश्य करती है, किंतु जटिल से जटिल बात को सरलतम शब्दों में ओजपूर्ण प्रवाह के साथ कहने की उनकी क्षमता मौलिक है। उनसे विद्वानों की सहमति हो या न हो किंतु उनकी मान्यताओँ से जूझे बिना आलोचना का विकास संभव नहीं है।