हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/त्रिबली वर्णन/(२)दसन जोति बरनी नहिं जाई।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि मंझन द्वारा रचित हैं। यह 'त्रिबली वर्णन' के अंतर्गत संकलित है, जो 'मधुमालती' कृति से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इसमें कवि ने मधुमालती के रूप-सौंदर्य, अंग-प्रत्यंगों तथा शरीर की कांति और सुंदरता का सत्य के रूप में वर्णन किया है। विधाता ने उसकी रचना बड़ी ही सूझबूझ के साथ की है। कवि उसकी सुंदरता से मोहित है। उसके मन पर जो प्रभाव पडा है, उसी को यहाँ कहता है-

व्याख्या[सम्पादन]

दसन जोति बरनी नहिं जाई......विधि गुपुत जग माहीं काहुं न देखा काउ।।

उसके दर्शन करने के बाद कुछ भी कहने के लिए शब्द ढूँढना कठिन हो जाता है अर्थात् उसकी सुंदरता एवं अंग-प्रत्यंगों की बनावट को देखकर उनका वर्णन करना मश्किल हो जाता है। अर्थात उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उसको देखने के बाद द्रष्टि भी चौंध जाती है। उसकी शारीरिक चमक को देखकर आँखे भी लज़ा जाती हैं। इसकी चकाचौंध इतनी ज्यादा है। तनिक या थोड़ी-सी विकसित हंसी नींद में भी हँस दे तो जान लो लगता है जैसे बिजली चमकी है। जैसे वह स्वर्ग से नीचे आ गिरी हो। वह अपने को अलग होते ही ऐसे लगती है जैसे वह सबसे अलग रूप लिए हुए है। उसके होंठों की चमक तथा उसके दर्शन से मानों तीनों लोगों के वासी तथा मुनि भी उसकी चका चौंध में स्वयं को भुला बैठते हैं। मंगल, शुक्र, बृहस्पति, शनि चारों ग्रह उसके दर्शन से ही उस राजकुमारी को देखने के बाद अपने को भूल जाते हैं।

उसके दाँत के चारचौके के उपमान के रूप में मौजूद हों। पता नहीं वे कहाँ जाकर अपने को छिपाने के लिए चले गए। वे कहाँ जाकर छिप गए हों। चंद्रमा भी मानो अपनेको छिपा गया हो। जो कोई उसको देखले तो विधि के विधान की बात कहने लगेगा कि विधाता ने उसे कैसे बनाया होगा। ? यह सुनकर मन में अपार खुशी होती है। उसका स्वभाव तो सबको मोहित करने वाला है। विधाता की गप्त रहस्यमयी कारगजारी को किसी ने कहीं भी नहीं देखा होगा। इस संसार में उस जैसी राजकुमारी किसी ने कहीं नहीं देखी होगी।

विशेष[सम्पादन]

कवि मंझन ने राजकुमारी मधुमालती के रूप-सौंदर्य का वर्णन बहुत ही सुंदर रूप में किया है। उसका सौंदर्य और उसकी शारीरिक रचना को शायद इस संसार में किसी ने देखी होगी, ऐसी कवि की मान्यता है। उसके अंग-प्रत्यंगों से निकलने छवि को देखकर विधाता की प्रशंसा करनी पड़ती है। उसके सामने सारे उपमान फीके पड़ जाते हैं। पूरे पद में कवि का सौंदर्य-बोध देखते ही बनता है। उसकी काव्य-कला का परिचय मिलता है। अवधी भाषा है। भावों में उत्कर्ष है। मिश्रित शब्दावली है। शब्द-चयन सुंदर है। अर्थ-गर्भत्व पाया जाता है। विभिन्न उपमानों का प्रयोग मिलता है। अनुप्रास, उपमा, रूपक अलंकारों का भी प्रयोग हुआ है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

चौंधे - चकाचौंध। नेक - तनिक, थोड़ा। बिगसाइ विकसित। सेउं- से। खसी - गिर गई हो, गिरी हो। बिहरत - अलग होते ही। भुलाने -भ्रम में पड़ गए। मंगर-मंगल (ग्रह)। सूक - शुक्र। गुरु = बृहस्पति। सन्हि - शनि। ये चार ग्रह दाँतों के चार चौके के उपयान रूप है। कहं दुरि जाई - कहाँ जाकर छिप गये। लुकाई - छिप गये। बिध्धि - विधि, विधाता। सुनहु सुभाउ = स्वभाव सुनो। गुपुत - गुप्त।