हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/दोहे/(5)सेज सूनी देख के रोऊँ दिन रैन।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत 'दोहा' खड़ी बोली के प्रवर्तक आदिकालीन कवि अमीर खुसरो द्वारा रचित हैं।

प्रसंग[सम्पादन]

इस दोहे में रहस्यात्मक रूप में 'परमात्मा को स्मरण किया गया है। जीवात्मा प्रिय (ब्रह्मा) से मिलने के लिए आतुर है। कवि अपने गुरु औलिया को शैय्या पर न पाकर दुखी हो जाता है। उनकी मृत्यु पर वह अपने आँसू बहाता है। उसी का यहाँ वर्णन मिलता है। वह कहता कि-

व्याख्या[सम्पादन]

सेज सूनी देख के रोऊ...पल भर सुख न चैन॥

जब से मैंने अपने प्रिय की शैय्या को सूने रूप में देखा है तभी से मैं दिन-रात रोता रहता हूँ। मैं उनके बिना अपने को अकेला एवं विरह में आँसू बहाता हुआ पाता हूँ। जब से मैंने उन्हें अपनी शैय्या पर नहीं देखा है तब से मैं जीवात्मा प्रिय-प्रिय कहती हुई रोता रहता हूँ। मेरी आत्मा को तनिक भी शाँति नहीं मिल रही है मैं अपने को अशांत या बेचैन पाता हूँ। उनके बिना मेरा सारा चैन मानो खो गया हो। मुझे हमेशा ऐसा प्रतीत होता है।

विशेष[सम्पादन]

इसमें कवि ने रहस्य-भावना, आध्यात्मिकता तथा प्रिय के बारें में ही बताया है| परमात और जीवात्मा के मिलन की आतुरता ही झलकती है। इसमें प्रतीकात्मकता है। उर्दू एवं खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग हुआ है। दोहा छंद है। अद्वैत-भावना है। माधुर्य गुण है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

दिन-रैन = दिन-रात। पल-भर = क्षणिका। चैन = शाँति। सेज़ = शैय्या। रोऊ - रोना। कै - कर।