हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/वंदना

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वंदना
विद्यापति/

सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि विद्यापति द्वारा रचित हैं। यह उनकी 'पदावली' के 'वंदना' खंड से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इस पद में वे श्रीकृष्ण की वंदना कर रहे हैं। इसमें कवि ने श्रीकृष्ण के विभिन्न क्रिया-कलापों का वर्णन किया है। कवि इनकी वंदना में उनकी विशेषताएँ बता रहे हैं। उनके मन की पीड़ा, बाँसुरी का बाना. श्रीकृष्ण राधा के बारे में पूछते हैं तथा इसमें श्रीकृष्ण की वंदना करके उन्हें प्रसन्न करने की बात कहते हैं। वे राधा को संबोधित करते हुए कहते हैं-

व्याख्या[सम्पादन]

देख देख राधा रूप अपार।........अहिनसी कोर आगोरी।।

हे राधा! नन्द-पुत्र श्रीकृष्ण कदम्ब वृक्ष के नीचे निर्धारित समय पर और मिलने के लिए निश्चित गुप्त स्थान पर बैठे हुए धीरे-धीरे मुरली बजा रहे हैं और उसके द्वारा बार-बार तेरे लिए बुलावा भेज रहे हैं। हे श्यामा! तुझमें अनुरक्त होकर श्रीकृष्ण प्रतिक्षण अत्यन्त दु:खी हो रहे हैं। वे यमुना के किनारे पर स्थित उपवन में उद्विग्न होकर बार-बार उसी ओर देख रहे हैं, जिस ओर से तुम्हारे यहाँ पहुँचने की सम्भावना है दही बेचने के लिए आती-जाती प्रत्येक गोपी से श्रीकृष्ण तुम्हारे ही विषय में पूछ रहे हैं। तू बुद्धिमती है और श्रीकृष्ण भी श्रेष्ठ बुद्धि वाले हैं, तुम मेरी यह छोटी-सी बात सुनो। विद्यापति कहते हैं कि हे युवतियों में श्रेष्ठ राधा सुनो, तुम नन्दकिशोर श्रीकृष्ण की वन्दना करो, अर्थात् वहाँ जाकर उनसे मिलो और उन्हें पूर्णतया प्रसन्न करो।

विशेष[सम्पादन]

(1). इस पद का मंगलाचरण वस्तु निर्देशात्मक है। वस्तु निर्देशात्मक मंगलाचरण में आराध्या अथवा आराध्य की वन्दना के साथ-साथ परोक्ष रूप से काव्य के प्रतिपाद्य का भी संकेत कर दिया जाता है। इस पद में यह संकेतित है कि विद्यापति की पदावली का प्रतिपाद्य शृंगार रस है।

(2). इस पद में शब्द-चयन अत्यन्त समृद्ध एवं भावानुकूल है। नन्दक नन्दन' में नन्दन शब्द कृष्ण के व्यक्तित्व को साकार बना रहा है। इससे कृष्ण के मधुर व्यक्तित्व के साथ-साथ उनका मनोन्मत्त यौवन, यौवन में मचलती हुई अपरिमित सुनहली कामनाएँ और देह-गठन की कोमलता का बोध होता है।

(3). 'घिरे-घिरे' में कृष्ण की राधा से मिलने की आतुरता और समाज का भय मुखरित है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कृष्ण की अत्यधिक आतुरता तो उन्हें वशी बजाकर अपनी उपस्थिति का बोध कराने को विवश कर रही है, पर समाज का भय उनका गला दबोच रहा है। मानस की असमय आतुरता और समाज के बंधनों की कठोरता का भीषण दंड 'घिरें-घिरे' में भरा हुआ है। यदि यहाँ 'धीरे-धीरे' का प्रयोग होता तो यह भावमयता न आती।

(4). 'सामरि' शब्द के प्रयोग से राधा का अपार सौंदर्य और नायक को सुख देने वाली उसकी सहजता व्यजित होती है, क्योंकि श्यामा नायिका की ये विशेषताएँ होती हैं

(5).'घिरे-घिरे', 'बेरि-बेरि','फिरि-फिरि' और 'जनि-जनि' में भाव-व्यंजक शब्दावृत्ति होने से वीप्सा अलंकार हैं ।

(6).'नन्दक नन्दन' में 'नन्द' पर की सार्थक-निरर्थक किन्तु रस-व्यंजक पदावत्ति होने से यमक अलंकार हैं ।

(7). 'तोहे मतिमान सुमति मधुसूदन' में प्रकारान्तर से राधा और श्रीकृष्ण के प्रेम के औचित्य की सम्पुष्टि की अभिव्यक्ति होने से पर्यायोक्ति अलंकार है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

क = के। तर = तले। नीचे- छाया में। संकेत प्रेमी-प्रेमिका के गुप्त मिलन का पूर्व-निश्चित स्थान। निकेतन = स्थान। बेरि-बेरि = बार-बार। पठाव = संकेत अथवा संदेश देना। सामहि = शयामा राधा। तोरा लागि = तेरे कारण। अनुखन = अनुक्षण,प्रशिक्षण, निरंतर। तिर = तीर, किनारे। उदवेगल = उद्विवग्न हुआ, व्याकुल। ततहि = उसी ओर। बेचए = बेचकर। अबइत = आती हुई। जाइत = जाती हुई। जनि-जनि = एक-एक से। बनवारी बुद्धिमान, अनुरक्त। सुमति बनमाली-कृष्ण। तोहे = तुम्हारी ओर। गतिमान = बुद्धिमान। किछु = कुछ। भनई = कहते हैं। बर जौवति = युवतियों में श्रेष्ठ। बंदह = वंदना करो।