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हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका/बांधो न नाव

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हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका
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बांधो न नाव


संदर्भ

बांधो न नाव कविता छायावादी कवि सूर्य कांत त्रिपाठी ' निराला ' द्वारा उद्धृत है। निराला जी अपनी कविता जीवन से जुड़ी वस्तुओं का समावेशन करते हैं।


प्रसंग

बांधो न नाव कविता में कवि ने डलमऊ के पक्के घाट पर बने गुंबद के नीचे बैठ कर अपनी पत्नी की याद में लिखी थी।


व्याख्या

कवि कहते है इस ठाव पर नाव मत बांधो। यह वही घाट है जिस पर मेरी प्रियतम नहाया करती थी। मेरी आंखे उसी को निहारती रहती थी। हम दोनों ही था मिला करते थे। वह हंसते हंसते बहुत कुछ बोल जाती थी और फिर भी वह अपने में रहती थी। वह सभी की सुनती थी, ओर अत्याचार भी सहती थी। सभी को प्रेम और सम्मान देती थी।


विशेष

1) भाषा सरल है।

2) मर्मस्पर्शी कविता है।

3)प्रियतमा की याद का वर्णन है।