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हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका/खेत जोत कर घर आए हँ

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हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका
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खेत जोत कर घर आए हँ


संदर्भ

खेत जोतकर घर आए हैं' कविता छायावादी कवि सूर्य कांत त्रिपाठी ' निराला ' द्वारा उद्धृत है। निराला जी अपनी कविता जीवन से जुड़ी वस्तुओं का समावेशन करते है।


प्रसंग

खेत जोतकर घर आए हैं कविता में कवि ने एक गांव का वर्णन करते हुए एक किसान परिवार के खेत जोत कर घर आने के बाद का वर्णन किया है।


व्याख्या

कवि किसान परिवार का वर्णन करते देखते हैं कि बैलो के कंधे पर लकडी का माची रहा हुआ है। उस माची पर हल को उल्टा करके रखा गया है। अब कभी माता पिता का वर्णन करते हुए कहते हैं पिता जी अधेड़ उमर के है। माताजी ने सर पर कपड़ा बांध रखा है। अब कवि बताते हैं कि वह लोग खेत से आ गए हैं पिताजी गाय को बांध रहे हैं माता और लड़के घर के अंदर आ गए हैं घर में आम और जामुन के फल है कुछ पक्के फल है तो कुछ कच्चे फल हैं। लड़की और पेड़ के नीचे थककर बैठ जाते हैं वह पेड़ की छांव लेते है। बड़ी बहू ने पूए पका लिए हैं अर्थात वह है उन्होंने खाना बना लिया है। मुन्नी ने यह पकवान बनाए हैं।


विशेष

1) भाषा सरल एवं सहज है

2) किसान परिवार का वर्णन किया गया है

3) मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया गया है।