हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका/मेरे पथिक

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका
 ← मुरझाया फूल मेरे पथिक झाँसी की रानी की समाधि पर → 
मेरे पथिक


संदर्भ

मेरे पथिक कविता प्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित हैं। सुभद्रा जी स्वच्छंद व्यतित्व की कवियित्री है।

प्रसंग

मेरे पथिक कविता में कवियित्री ने जीवन के सफर में आने वाली मुश्किलों का वर्णन किया है। मनुष्य को हर कदम सोच समझ कर  चलना चाहिए।

व्याख्या कवियित्री पूछती है पथिक अर्थात् पथ प्र चलने वाले , इतनी जल्दी कहा जा रहे हो। कुछ देर रुक जाओ और आने वाले समय के बारे में सोचो। इस तरह कवियित्री कहना चाहती है कि कुछ भी करने से पहले उसके बारे में सोच लेना चाहिए। कवियित्री कहती है आगे रास्ते में बहुत से धोखे है और तुम्हे जीवन भर प्यार ही मिला है। कैसे उस स्तिथि में रहोगे। रुकावटें हर राह पर मिलेगे जो निराशा से परिपूर्ण है। अस्त्र शस्त्र के साथ लोग मुश्किल खड़ी है। मुश्किलों की गर्मी में शरीर जल जाएगा। सोने के लिए अनुकूल जगह भी नहीं मिलेगी। जीवन की शांति ख़तम हो जाएगी, और राज से भटक जाओगे। इस प्रकार जीवन के डगर में आने वाली समस्या को दर्शाता गया है।

विशेष

1) सहज और सरल भाषा है।

2)जीवन में आने वाली मुश्किलों का वर्णन किया है।

3) दिग्ग - दिगंत में अनुप्रास अलंकार हैं।

4) ओज गुण विद्यमान है।

5) उपदेश प्रधान है।

6)जागरूकता है।