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हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका/ले चल मुझे भुलावा दे कर

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हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका
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ले चल मुझे भुलावा दे कर


 संर्दभ

ले ले चल मुझे भुलावा देकर कविता छायावादी प्रेम सौंदर्य के महान कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित है।साहित्यिक जगत में प्रसाद जी एक सफल व श्रेष्ठ कवि, नाटककार कथाकार व निंबंध लेखक के रूप में विख्यात रहे है।

प्रसंग

ले ले चल मुझे भुलावा देकर कविता में कवि ने पलायन वादी दृष्टिकोण को दर्शाया है। कवि कविता में एक ऐसे स्थान को खोज रहे हैं जिसमें कोई सांसरिकता ना हो। सत्य हो और निश्चल हो।


व्याख्या

कवि ईश्वर को नाविक के रूप में बताते हुए कहते हैं कवि ईश्वर से कहते हैं हे ईश्वर मेरे जीवन की नैया को धीरे धीरे इस सागर की लहरों से दूर ले चल मुझे एक ऐसी जगह ले चल जहां सत्य प्रेम का आवास हो जहां दूर-दूर तक कोई आवाज ना हो कानों में एक मधुर आवाज गूंजती रहे मुझे एक ऐसी जगह ले जा। जहां जीवन छाया के समान होकर कोमलता का भाव ले ले। और नेत्र आसमान के नीले रंग के समान शांत हो जाए। आगे कवि कहते हैं हे ईश्वर मुझे एक ऐसी दुनिया में ले चले जहां माधुर्य का वातावरण हो। जहां सुख दुख का सत्य वातावरण हो। जहां श्रम में भी आनंद की प्राप्ति हो जहां जागरुकता की ज्योति दिखाती हो। कवि संसार की संसरिकता से उब चुका है। उसे संसार में कहीं भी कोई तालमेल नहीं दिखाई दे रहा है। कभी अपनी जीवन रूपी नहीं आ ईश्वर के हाथ में देकर उन्हें कैसे जाने के लिए कह रहे हैं जहां इस सांसरिकता से मुक्ति मिल जाए।


विशेष

1) भाषा खड़ी बोली है

2) रहस्यवाद का वर्णन किया गया है

3) मानवीकरण अलंकार है।