हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका/सरोज-स्मृति

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सरोज-स्मृति


संदर्भ

सरोज स्मृति कविता छायावादी कवि सूर्य कांत त्रिपाठी ' निराला ' द्वारा उद्धृत है। निराला जी अपनी कविता जीवन से जुड़ी वस्तुओं का समावेशन करते हैं। निराला की 'सरोज स्मृति' और 'राम की शक्ति-पूजा' एक ही समय में लिखी गई हैं। पहली कविता का रचनाकाल 1935 है तो दूसरे का 1936। हिंदी का श्रेष्ठतम शोक गीत है।


प्रसंग

सरोज स्मृति कविता पुत्री सरोज के आसमयिक मृत्यु पर लिखी गई है। कवि कविता में यथार्थ जीवन को चित्रित करता है। कवि जीवन के दुखों के साथ साथ ही सरोज की स्मृतियों का चित्रण करते है।


व्याख्या

सरोज स्मृति' में कवि निराला को वे दिन याद आते हैं जब वे दूर स्थित प्रवास से करीब दो वर्ष बाद अपनी पुत्री सरोज को देखने अपनी ससुराल गये। वहाँ वे फाटक के बाहर मोढ़े पर बैठे थे और हाथ में अपनी जन्म कुंडली पकड़े हुए थे। उनकी जन्म कुंडली में दो विवाह लिखे हुए थे। वे अपना दूसरा विवाह करके बच्चों की सौतेली माँ लाकर उन्हें परेशानी में नहीं डालना चाहते थे। वे अपनी कुंडली में लिखे भाग्य अंक को खंडित करना चाहते थे। उनके विवाह के तमाम प्रस्ताव आये किंतु वे अपने को मांगलिक कहकर टालते रहे। उन्होंने अपनी जन्म कुंडली को सरोज को खेलने को दे दिया। सरोज ने फाड़-फाड़ कर कुंडली के टुकड़े कर दिये। अपनी पत्नी मनोहरा देवी की मृत्यु के बाद निराला ने सरोज के माता और पिता दोनों के कर्तव्य का निर्वहन किया। बाल्यावस्था को छोड़कर जब सरोज ने यौवनावस्था में प्रवेश किया तो वह सुंदरता की प्रतिमूर्ति बन गयी। सरोज जब शादी योग्य हो गई तब निराला जी की सास ने निराला जी से सरोज की शादी करने को कहा। कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने अपनी कन्या सरोज का विवाह बहुत ही सीधे-साधे ढंग से किया था। वे कन्नौजी बाह्मणों की विवाह पद्धति का समर्थन भी नहीं करते थे। वे दहेज तथा बारात पर किया गया खर्च व्यर्थ समझते थे। कान्य कुब्ज ब्राह्मणों के पैर पूजने में भी उन्हें संकोच था। कविवर निराला आर्थिक विपन्नता से ग्रस्त रहे थे। उन्हें सरोज के लिए एक ऐसा वर मिल गया था जो धन सम्पन्न तो नहीं था पर विद्धान था।दहेज और बारात पर किये गये व्यय को मिथ्या बताते है।निराला जी सरोज के विवाह में कुछ साहित्यिक मित्रों को बुलाकर बिना किसी आडंबर के पुरोहित कार्य स्वयं ही करने लगे थे। निराला ने विवाह के समय कलश का जल पड़ने पर सरोज के सौन्दर्य का वर्णन 'सरोज स्मृति' में करते है।तरूण कन्या सरोज जब निराला जी का घर छोड़कर दूसरे के घर जातीं है कविवर श्री राम नरायण 'रमण' ने अपने एक लेख में बताया है कि सरोज का जन्म 1917 में और 1929 में उसका विवाह हुआ तथा 1935 मे उसकी मृत्यु हुई। रमण जी के अनुसार विवाह के समय सरोज की उम्र बारह वर्ष होनी चाहिए जो सही प्रतीत नहीं होती।निराला की पुत्री सरोज के विवाह के एक वर्ष बाद ही सरोज की मृत्यु हो गई।सरोज की मृत्यु बीमारी और समुचित चिकित्सा के अभाव को कारण न मानकर यह मानते हैं कि उसके जीवन के अठारह अध्याय पूरे हो चुके थे। सरोज का मरण जीवन के शाश्वत विराम की ओर जाने की यात्रा है क्योंकि उसने अपने जीवन के अठारह वर्ष जो गीता के अठारह अध्याय के समान हैं, पूरे कर लिए थे।राला सरोज की मृत्यु बीमारी और समुचित चिकित्या के अभाव को कारण न मानकर यह मानते हैं कि उसके जीवन के अठारह अध्याय पूरे हो चुके थे जो गीता के अठारह अध्याय के समान हैं। सरोज का मरण जीवन के शाश्वत विराम की ओर जाने की यात्रा है। निराला अपने हृदय की करूणा उड़ेलते हुए अपना जीवन दर्शन प्रस्तुत करते हैंकविवर निराला को यह बात सालती रही कि वे अपनी एक मात्र पुत्री के प्रति पिता का दायित्व सही तरह नहीं निभा सके।अपनी पुत्री सरोज का तर्पण स्वयं निराला ने दार्शनिक विधान के साथ किया थाअंत में निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि सरोज महाप्राण निराला की अति प्रिय लाड़ली बेटी थी जिसे असमय ही काल ने अपना ग्रास बना लिया। सरोज अपना पार्थिव शरीर तो निराला जी के जीवन काल में ही छोड़कर चली गयी थी किन्तु निराला जी ने अपनी लेखनी से 'सरोज स्मृति' के माध्यम से उसे अमरत्व प्रदान कर दिया है।


विशेष

1) भाषा खड़ी बोली है।

2) शोक गीत है

3) स्मृतियों का समावेशन है।

4) वियोग श्रृंगार है।