हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/कलगी बाजरे की

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
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कलगी बाजरे की

सप्रसंग[सम्पादन]

कलगी बाजरे की कविता हरि घास पर क्षण भर काव्य सन्ग्रह से लिया गया, जिसका प्रकाशन 1949 मे हुआ। इसके माध्यम से कवि को प्रयोग धर का कवि कहा गया। अज्ञेय ने इस कविता के माध्यम से पुराने उपमान का विद्रोह किया है। काव्य के क्षेत्र में नए उपमान का प्रयोग किया है। यह कविता मूलतः प्रेम और प्रकृति को अभिव्यक्त करती है। कवि इस कविता में प्रेयसी को किसी प्रकार के रीतिकालीन उपमानो तरीका, कमलिनी, चम्पे की कली जैसे सीमित उपमानो से नहीं सजाना चाहता। वह यदि उसे कलगी बाजरे की या बिछली घास कहता है तो उसे अपना प्रेम कहीं अधिक विस्तृत व फैला दिखाई देता है।

व्याख्या[सम्पादन]

इस कविता के माध्यम से नायक अपनी नायिका की तुलना बाजरे की कली से करता है और कहता है कि नायिका कितनी कोमल, नाजुक और कितनी सुन्दर है। अपनी प्रेमिका को हरि भरी चिकनी घास कहते है जो बाजरे की डोलती हुई बाली है कवि कहते है कि अगर साझ के समय चमकने वाला तारा या किरण अब नहीं कहता या शरद ऋतू की सुबह के समय पाले मे ढकी हुई कुमुदनी वो भी मैं तुम्हे नहीं कहता अभी अभी तजा खिली हुई चम्पे की काली भी नहीं कहता तो ऐसा नहीं है  कि मेरा मन या ह्रदय सुना है या मेरा प्यार मैला या झूठा है। यह सब उपमान अब पुराने हो चुके है। यानि सभी कवियों ने इन प्रतीकों का प्रयोग कर लिया है। अतः यह घिस घिस कर पुराना हो चूका है, जिस तरह वर्तनो को अधिक घिसने से उनकी चमक ख़त्म हो जाती है। उसी प्रकार इन उपमानो का अधिक प्रयोग होने से अब यह भी पुराने हो चुके है। कवि अपनी प्रेमिका से प्रश्न करते है। क्या तुम यह पहचानती तुम्हारे करीब तुहरे रूप के निकट सिर्फ इसलिए इन पुराने उपमानो के साथ कवि ने उनकी तुलना नहीं की है। तुम्हारे इस जादू के कारण मैं अपनी निजी सहज गहरे भाव बोद से प्यार से यह कह रह हूँ, अगर तुमसे कहता हूं कि तुम बिचली हरि घास में लहराती बाजरे की कली हो तुम। हम शहरी लोगों ने पाले हुए बगीचे में जुली के फुलो को लगाया है। यह हरि भरि घास सृष्टि का विस्तार है यही समतिधि ऐशवर्य सम्पन्नता शक्ति सहनशीलता सभा का प्रतीक है यह बिचलि हुई घास इस ससार के सफलता सच्चई प्यार का प्रतिक है। यह शरद श्रीतु की सह्या के समय सूने आकाश पर अपनी जगह डोलती हुई यह बाजरे की कलगी उस जूही के फूलों से भी सुन्दर है। जब जब मैं घास बाजरे की कलगी को इस देखता हूँ तो सचमुच सम्पूर्ण संसार विरान होते हुए दिखाई देता है। इस संस्कृति का समापन और भी सिमटा हुआ प्रतीत होने लगता है और सुमे स्वयं को अकेले ही समर्पित कर देता हूँ। कवि कहते है कि शब्द जादू है इस से अपनी भावनाओ को अभिव्यक्ति मिलती है। कवि प्रेयसी से प्रश्न करते है। क्या सम्पुर्ण कुछ नही है? क्या इसका कोई मोल नही है? क्या ससार के प्रति किया गया सम्पूर्ण कुछ नहीं है?

कवि अन्तिम कुछ पंक्तियों में प्रकृति के प्रति अपने अथाह प्रेम को दर्शाया है और वह इन्ही पंक्तियों मे एक प्रश्न उठाते है कि क्या यह समर्पण कुछ नही? जो मै अपने प्रेमिका के प्रती समर्पण भाव रखता हूँ उसका कोई मोल नही। प्रती समर्पण भाव रखता हूँ उसका कोई मोल नही।

विशेष[सम्पादन]

1 :- सहज एवं प्रवाह पर्ण भाषा का प्रयोग है।

2 :- नए उपमानो का प्रयोग किया गया है।

3 :- उपमा अलंकार का प्रयोग किया गया है।

4 :- मनवीकरण किया गया है।

5 :- उपरोक्त कविता मे कवि जमीन से जुडा रहना चहता है।

6 :- कवि ने कविता के कुछ अन्तिम पंक्तियों मे प्रकृति के प्रति अपना     अथाह प्रेम को दर्शाया है।

7 :- अपनी प्रेमिका के प्रती समर्पण भाव को दर्शाया है।

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