हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/गुलाबी चूड़ियाँ

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
 ← उनको प्रणाम गुलाबी चूड़ियाँ अकाल और उसके बाद → 

संदर्भ[सम्पादन]

सन् १९६१ में रचित "गुलाबी चूड़ियां" कविता सुविख्यात प्रगतिशील कवि एवं कथाकार 'नागार्जुन' द्वारा रचित है। नागार्जुन अपनी कविता में यथार्थ को खुलकर चित्रित करते है। वे अपनी कविता मै सदैव साधारण मनुष्य की बात करते है।

प्रसंग[सम्पादन]

नागार्जुन द्वारा रचित यह कविता दो मानक पात्रों के बीच भावनात्मक संवाद हैं। इस कविता में कवि ने बच्ची के प्रति प्रेम के माध्यम से एक साधारण मनुष्य के जीवन में प्रेम के महत्व को दर्शाया है। बस में लटकी हुई गुलाबी चूड़ियां उस बस ड्राईवर के बच्ची के प्रति और बच्ची के अपने पिता के प्रति प्रेम की सूचक हैं।

व्याख्या[सम्पादन]

कविता का आरंभ सात साल की बालिका के पिता से है जो एक बस के ड्राइवर है कवि कहता है कि वह व्यक्ति यदि प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो इसमें खेद की कोई बात नहीं है। वह अपनी लग्न, मेहनत एवं ईमानदारी से अपनी जीविका चला रहा है। और एक ड्राइवर होने के साथ ही वह एक सात साल की नन्ही बच्ची का पिता भी है। अर्थात कवि स्पष्ट करना चाहता है कि वह बस ड्राईवर आखिर इंसान ही है। अतः कवि यहां आम जन की मानवीय संवेदनाओं को अपने काव्य में स्थान देता है।

ड्राइवर ने बस में आगे शीशे के पास गियर के ठीक ऊपर कांच की गुलाबी चार चूड़ियां लटका रखी है। वे गुलाबी चूड़ियां बस की गति के अनुसार हिलती रहती है और उसे उसकी बच्ची की याद दिलाती रहती है।

कवि कहता है कि आखिरकार मैंने थोड़ा झुककर उससे उन चूड़ियों के बारे में पूछ ही लिया, तो वह बस ड्राईवर आकस्मिक चौंक गया मानो जैसे वह किसी की याद में खोया हुआ था और मेरे पूछने से अचंभित हो गया हो। वह अधेड़ (आधी) उम्र का व्यक्ति जिसके मूंछें भी थी और उसके चेहरे पर तेज झलक रहा था,वह बहुत ही धीरे स्वर में बोला की हां साहब ये नन्ही कलाइयों की चूड़ियां मेरी बेटी की है, मैं अपनी बेटी से बार बार कहता हूं और उसे बहुत समझाता हूं कि ये चूड़ियां तू ले ले ये तेरी ही अमानत है परन्तु मुनिया(बच्ची) मानती ही नहीं है,और जिद के कारण वह अपनी अमानत को अपने अब्बा के सामने ही देखना चाहती है, इसलिए कई दिनों से वह इन चूड़ियों को यहां टांगे हुए है। कवि यहां दर्शाता है कि संतान का प्रेम व्यक्ति के कठोर मन पर भी विजय पा लेता है। इसीलिए कवि नन्ही बच्ची की जिद के आगे पिता कि बेबसी को दर्शाता है, हालांकि यहां बेबसी नकारात्मक नहीं है और वह व्यक्ति नहीं चाहता कि उन चूड़ियों को अपने सामने से हटाकर अपनी बच्ची के बाल मन को किसी प्रकार की ठेस पहुंचाए।

आगे वह व्यक्ति कहता है कि फिर में भी सोचता हूं कि बच्ची की जिद है तो चूड़ियों को टंगा रहने दूं क्योंकि वह चूड़ियां कुछ बिगाड़ती तो है नहीं और न ही इनसे किसी को किसी प्रकार की कोई परेशानी है। और जब उन चूड़ियों का कोई गुनाह है ही नहीं तो आखिर इन्हें किस जुर्म या अपराध पर यहां से हटा दूं?

जब ड्राईवर ने एक नजर से कवि की ओर देखा और कवि ने भी एक नजर से ड्राइवर को देखा तो यह संवाद मार्मिक रूप ले लेता है, ड्राइवर की आंखों में उसकी सात साल की बच्ची की याद और उसके प्रति प्रेम भाव स्पष्ट झलक रहा था, कवि ड्राइवर की आंखो में वात्सल्य भाव को महसूस करता है उस वक्त ड्राईवर की आंखों में बच्ची के लिए एक मां की तरह वात्सल्य भाव या प्रेम भाव स्पष्ट देखा जा सकता था।

वह ड्राईवर सीधे ढ़ंग से कवि के प्रश्नों का उत्तर दे रहा था और उसके बाद उसकी दोबारा आंखें सड़क की ओर हो गईं। वात्सल्य के पवित्र पावन रस को देख कर कवि का हृदय भी पिघल जाता है, और कवि कहता है कि हां भाई मै भी एक पिता हूं, मैंने तो बस ऐसे ही इन चूड़ियां के बारे मै तुमसे पूछ लिया था, वरना ये नन्ही कलाइयों की छोटी छोटी चूड़ियां किसके हृदय को नहीं भाएंगी या किसे पसंद नहीं आएंगी।

विशेष[सम्पादन]

(१) सहज खड़ी बोली एवं प्रवाहयुक्त भाषा का प्रयोग।

(२) साधारण मनुष्य के जीवन में प्रेम के महत्व को दर्शाया है।

(३) वात्सल्य प्रेम की रस धारा का स्पष्ट चित्रण।

(४) छंद मुक्त कविता।