हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/उनको प्रणाम

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
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उनको प्रणाम
नागार्जुन

उनको प्रणाम कविता सुविख्यात प्रगतिशील कवि एवं कथाकार नागार्जुन द्वारा रचित है। जन-मन के सजग और सतर्क रचनाकार कवि नागार्जुन अपनी कविता में यथार्थ को खुलकर चित्रित करते है। वे अपनी कविता मै सदैव साधारण मनुष्य की बात करते है।

व्याख्या[सम्पादन]

कविता मे नागार्जुन ने उन महान लोगों के प्रति अपना आस्था - भाव प्रकट किया है, जो जीवन पथ पर सफल नही हो पाए है। कवि नागार्जुन कहते है कि सफल व्यक्ति को सब नमस्कार करते हैं मगर असफल को कोई नहीं। ऐसा क्यों परिश्रम तो असफल व्यक्ति ने भी किया है मगर वो सफल नहीं हो सका। कवि महान उन्हें बता रहा है जो अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे और उन्होंने हार नहीं मानी।

(योद्धा का वर्णन) कुछ लोग कुंठित मनोवृत्ति अर्थात मन्दबुद्धि विचार वाले जो अपने पथ से विचलित हुए है ,वो ऐसे तीरों के समान हैं जो मंत्रो द्वारा अभिमंत्रित तो थे, किन्तु युद्ध की समाप्ति से पहले ही इनका तूणीर अर्थात तरकस (जिस में तीर रखा जाता है) वो खाली हो गया। कवि ऐसे महान आदर्श सूचक व्यक्तियों का हार्दिक अभिनंदन करता है उनको प्रणाम करता है ।

(नाविक) उनकी मनोवृति जो उन्हें पथ से विचलित नहीं होने देती जो व्यक्ति छोटी सी नाव लेकर समुद्र रूपी जीवन को पार करना चाहते थे अर्थात कवि यहां कहना चाहता है की योद्धा या परिश्रमी व्यक्ति साधन की चिंता नहीं करता उसके पास जो है उसी से कार्य करता है। किन्तु उनकी इच्छा मन में रह गई अर्थात वे असमय ही काल के जाल में फंस गए और अपनी नैया को पार नहीं कर पाए एवं उस निराकार अनंत सागर में समा गए ।

(प्रवातारोहियो का वर्णन) कुछ लोगो ने उच्च शिखर पर जाने की ठानी और उनके मन मे उत्साह का भरपूर संचार था । रह - रहकर उनके मन मे उत्साह हिलोरे ले रहा था पर उनमें कुछ लोग ऐसे भी थे ,जो उच्च शिखर की ओर बढ़े कुछ लोगों ने बर्फानी चोटी पर समाधि ले ली,और कुछ असफल ही नीचे उतर गए । कवि ऐसे लोगो के मनोबल को भी प्रणाम करता है।

कवि कहता है इस संसार मे ऐसे व्यक्ति भी है, जो एकाकी - मतलब अकेले है । पूरी पृथ्वी पर अपना पहचान पद-चिन्ह छोड़ने के लिए निकले थे,पर अब दिखाई नहीं दे रहे हैं । वह ओझल हो गए है अर्थात वह अब कहीं विलुप्त हो गए है, यानी कि अब हमें उनका मार्गदर्शन नही मिल पा रहा है कवि उन्हें प्रणाम कर रहा है।

(स्वाधीन सेनानियों का वर्णन) कवि फिर कहता है कि कुछ लोग अपने अद्भुत और अनुकरणीय कार्यो से धन्य नही हो पाए है ,स्वयं फाँसी पर झूल गए । जिन महावीरों के कारण भारत में आजादी की किरणों को देखा गया , जिन्होंने अपनी जान को देश के लिए न्योछावर कर दिया। उन्हें शहिद हुए ज्यादा वक्त भी नही हुआ है, पर दुख की बात यह है कि संसार उन्हें भूला बैठा है। उन महान व्यक्तियों को कवि याद कर रहा है जिसमे भगत सिंह , सुखदेव, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद जैसे महान लोगो को कवि याद करके उनको प्रणाम कर रहे है।

कवि कुछ उन दृढ़ - प्रतिज्ञ लोगो को भी प्रणाम कर रहे है जिन्हें कठिन साधक के रूपो में जाना जाता था पर इनके जीवन का अंत दुखद हुआ । जिनकी जन्म पत्रिका में सिंह लग्न था और उन्हें चिरायु मना जाता था , उनका अल्पायु में ही देहांत हो गया।

फिर कवि कहता है कि ये लोग जो संकल्प और अदम्य साहस के उदाहण थे मगर बंदी भरा (गुलामी) जीवन गुजारना पड़ा और जेल में ही मृत्यु हो गयी। करावास के जीवन ने जिनके धुन का कर दिया अंत , जिन्होंने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कठिन साधना की अपने सुखों की चिंता नहीं कि मगर लक्ष्य प्राप्त न हो सका, कवि उन महान आत्माओं को प्रणाम करता है।

फिर कवि कहता है जिन्होंने देश के लिए अतुलनीय सेवाऐ दी , पर वे विज्ञापनों से दूर रहें। अपने महत्वपूर्ण कार्यों से उन्होंने देश की धारा बदलने का प्रयास किया था , उन्होंने यह नही चाहा कि देश की सेवा के बदले उन्हें कोई पुरुस्कार प्राप्त हो। उनकी एक ही इक्छा थी कि वे देश को स्वतंत्र देखना चाहते थे ,पर परिस्थितियों के विपरीत होने के कारण उनकी इच्छा पूर्ण नही हुई ।

काव्य-विशेष[सम्पादन]

१. सरल भाषा का प्रयोग।

२. कर्मशील होने का संदेश।

३. भाव पूर्ण और प्रेरणादायी काव्य।

४. महान व्यक्तियों का स्मरण।

५. तत्सम शब्दों का प्रयोग