हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/सिंदूर तिलकित भाल

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
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सिंदूर तिलकित भाल
नागार्जुन

सन्दर्भ[सम्पादन]

सिंधुर तिल्कित भाल कविता सुविख्यात प्रगतिशील कवि एवं कथाकार नागार्जुन द्वारा रचित है। जन-मन के सजग और सतर्क रचनाकार कवि नागार्जुन अपनी कविता में यथार्थ को खुलकर चित्रित करते है।

प्रसंग[सम्पादन]

प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री नागार्जुन द्वारा लिखित कविता 'सिंदूर तिलकित भाल' से ली गई है। इन पंक्तियों में कवि एक वियोगी प्रिय की हृदय-व्यथा का चित्रण कर रहा है। प्रवासी कवि परिस्थितिवश परदेश में रहने के लिए विवश है वह माथे पर सिंदूर की बिंदी लगाए हुए प्रियतमा को विस्मृत नहीं कर पाता। कवि कहता है कि-

व्याख्या[सम्पादन]

मुझे किन्हीं परिस्थितियों ने घोर निर्जन में (तुम से दूर) डाल दिया है। मुझे बार-बार तुम्हारा सिंदूर से तिलकित (सिंदर की बिंदी और भरी माँग वाला) मस्तक याद आता है। वास्तव में इस स्मृति का कारण है। आज संसार में कौन ऐसा व्यक्ति है जिसे समाज नहीं चाहिए अर्थात् जो समाज में रहना पसंद नही करता? ऐसा कौन व्यक्ति है जिसको दूसरों से काम नहीं पड़ता? कौन ऐसा व्यक्ति है जिसे समाज के अन्य व्यक्तियों का सहयोग नहीं चाहिए? कौन ऐसा व्यक्ति है जिसे अपने प्रिय शून्य में टकराए अर्थात् वह एकांत में बैठा-बैठा आहे भरता रहे?

संपूर्ण प्रश्नों का अर्थापत्ति अलंकार से एक ही उत्तर है कि ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो एकांत प्रांत में रहकर समाज में कटा रहे। याद में आहे भरता हूँ, वहाँ वह पत्थर यह काम नहीं कर सकता। कवि आगे कहता है कि प्रिये अचेतन पत्थर के साथ चेतन गूँगा-बहरा साधारण पशु भी नहीं हूँ। यहाँ मेरे हृदय में अनुभव करने की तथा मस्तिष्क में सोचने की शक्ति है तभी तो तेरे मेरे जीवन में हाँ ना, किंतु, परंतु, हर्ष, विषाद, चिंता, और क्रोध का स्थान है। अर्थात् मैं सोच-समझकर किसी काम के लिए हाँ या ना कर सकता हूँ। सोच-समझकर चल सकता है। सुख-दुःख का अनुभव कर सकता हूँ। यहाँ मेरे जीवन में प्रत्यक्ष और अनुमान प्रणाम है अर्थात् मैं इस संसार में जो कुछ देखता हूँ या जिसका अनुमान कर सकता हूँ उस सबका मेरे जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। यहाँ मेरे जीवन में मधुर की स्मृति और कटु की विस्मृति के लिए बहुत बड़ा स्थान है हे प्राण! तुम भी तो मुझे याद आती रहती हो। तुम इस बात को जान लो कि मैं किसी भी प्रकार से पत्थर नहीं बन गया हूँ। आज भी मेरे हृदय में तुम्हारे लिए बहुत बड़ा स्थान है भाव यह है कि प्रवासी विरही कवि संवेदनशील मानव है वह पत्थर की तरह निजी और भावनाशून्य नहीं है। वह साधारण पशु भी नहीं है। अत:वह सुख-दु:ख का अनुभव करने वाला है उसका अपनी प्रियतमा को स्मरण करना स्वाभाविक है रूप गुण अनुसार ही रक्खे गए वे नाम, याद आत वेणुवन वे नीलिमा के निलय अति अभिराम। सप्रसंग व्याख्या-प्रस्तुत पंक्तियाँ नागार्जुन द्वारा लिखित 'सिंदूर तिलकित भाल' नामक कविता से उन्त हैं। इसमें प्रवासी कवि की भावनाओं का अंकन किया गया है। वह किन्हीं परिस्थितियों के कारण अपनी जन्मभूमि से दूर रहने के लिए विवश है, पर उसे वहाँ की स्मृतियाँ बराबर ताजा रहती हैं। वह न तो सिंदूर तिलकित भाल वाली प्रियतमा को विस्मृत कर सका है और न ही गाँव की प्रकृति और स्वजनों को। तरउनी गांव तथा मिथिला के भूभाग का स्मरण करता हुआ कवि कहता है कि उसे अपने सगे-संबंधी याद आते हैं, जिनकी प्रेम से भीगी अमृत या दृष्टि (चितयन) उसके स्मृति रूपी पक्षी के पखों को भी धकने नहीं देती। अर्थात् उनकी प्रेम से भरी प्रेरणामयी आँखें उसे स्मरण आती है तथा उसका स्मृति रूपी पक्षी दूर-दूर तक उड़ने लगता है। कवि को अपने गाँव 'तरउनी' का स्मरण हो आता है, वहाँ के लीचियों और आम के वृक्ष याद आते हैं। वह मिथिला प्रदेश के सुंदर मू-भाग को यह भुला नहीं पाता। उसे तालमखाना (मखाना, एक मेवा) पौधे की याद भी आती है। इसी तरह वहाँ को धान्य संपल हरी-भरी (स्यामल) भूमि वाले जनपद भी कवि को याद आते हैं, जिनके नाम उनके रुप और गुण के अनुसार ही रखे गए हैं। वे जनपर अपने नाम से ही अपने याद आते हैं। गुणों को प्रकट करने वाले हैं। इसके अतिरिक्त उसे वहाँ के नीले रंग के बाँस के सुंदर जंगल भी याद आता है अपने प्रवासी रूप में अपनी हृदय-व्यथा की अभिव्यक्ति करते हुए कहता है कि मुझे अपनी जन्मभूमि, स्वजन और प्रिय का कभी विस्मरण नहीं हो सकता। व्याख्या-प्रिये । मैं यहाँ परदेश में भी असहाय नहीं हूँ। यहाँ भी व्यक्ति और समाज विद्यमान है। किंतु यहाँ एक बात अवश्य है। मैं यहाँ जीवन भर रहूँ पर फिर भी लोग मुझे प्रवासी ही तो कहेंगे। जब मेरी मृत्यु होगी तो ये लोग मरी चिता पर दो फूल भी डाल देंगे। समय अपनी चाल से चलता जाएगा। तुम जब मेरी मृत्यु की बात सुनोगी तो तुम्हारे हृदय में एक हूक सी निकलेगी। उस समय मैं तसवीर में तुम्हारे सामने रहूँगा लेकिन मैं तुमसे कुछ कह नहीं सकूगा। सन्ध्या काल में जय सूर्य पश्चिमांत होता है उसके समान जब वह छिपने से पूर्व लालिमा का कारुणिक आख्यान प्रस्तुत करता है उस समय है सुमुखि। मैं उसे सुनाता हूँ

विशेष[सम्पादन]

1.इसमें पत्नी के प्रति अनुराग का चित्रण हुआ है।

2.संस्कृतनिष्ठ सरल भाषा प्रयोग है।

3. लपात्मकता है।

4.बिचात्मकता है।

5.प्रसाद गुण का प्रयोग है।

6.मुक्त छंद प्रयोग है।

7. यहाँ प्रेम भावना का हृदयग्राही चित्रण हुआ

8. तत्सम शब्दों का पर्याप्त प्रयोग दिखाई देता।

9. काव्यांश में बिंबात्मकता एवं गेयता है।

10. आत्म विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग हैl