हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/स्वाधीन व्यक्ति

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
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स्वाधीन व्यक्ति
रघुवीर सहाय

प्रसंग - यह कविता रघुवीर सहाय द्वारा रचित 'आत्महत्या के विरुद्ध' कृति में संकलित 'स्वाधीन व्यक्ति' शीर्षक कविता से ली गई है। कवि का मानना है कि देश के स्वाधीन हो जाने के बावजूद जन-मानस स्वतंत्र नहीं हो पाया है।

व्याख्या - कवि का मानना है कि समाज में आज चारों ओर अंधकार व्याप्त है। अज्ञान व अचेतनता व्याप्त है। समाज में हुए हैं स्थिति नजर नहीं आती जो चेतना की सूचक हो। जनता नेता अधिकारी सभी जैसे अंधकारमय व्यवस्था का अंग बन गए हैं। कवि को लगता है कि जनहित को अभिव्यक्ति देने के महत्वपूर्ण कार्य को कहीं कोई कवि कर रहा है।जनहित के इस दिखावे की चकाचौंध में कहीं कोई एक अन्य कभी भी है जो इस संबंध में ईमानदारी के प्रयास करते हुए इस प्रकार के साहित्य की रचना करता है। कभी स्वयं को इस अभियान के साथ पाता है।इस प्रकार कभी को प्रतीत होता है कि वह कवि जिसकी उसने कविता पढ़ी है, चौंध में दिखाई देने वाला दूसरा और स्वयं कम से कम तीन ऐसे जो व्यवस्था के सामने झुकने को तैयार नहीं है और जनहित को सामने आने देने की बात करते हैं।

कवि कहता है कि आज कि परिस्थितियों में वे अपने कार्यों के संबंध में चर्चा कम करना चाहते हैं, कार्य अधिक करना चाहते है क्योंकि लाभ कार्य करने से हैं बाते करने से नहीं। कवि अभी और इसी समय परिस्थितियों का मुकाबला करना चाहते हैं। परिस्थितियों का सामना करते हुए टूट जाना इन्हे स्वीकार है लेकिन उनके सामने झुकना स्वीकार नहीं है।

समाज की इस व्यवस्था में इतने दृढ़ निश्चय के बाद भी कवि जब अपनी रचना की और जाता है तो पहले तो वह अपनी कर्तव्य भावना के कारण खुश होता है , परन्तु तुरंत ही उसकी ये खुशी निराशा में बदल जाती है। इसका कारण यह है कि कवि को लगता है कि उसकी रचना में वह जिस प्रकार के भावों को वह प्रदर्शित करेगा, समाज उसके कार्यों को उस रूप में नहीं लेगा। समाज की दृष्टि से कवि का व्यवहार सबके साथ एक जैसा नहीं हो पाएगा। समाज की व्यवस्था और अपनी सुविधा के अनुरूप वह कभी किसी के सामने रिरियाएगा या किसी डरे हुए व्यक्ति के सामने गरज कर अथवा उसे धमकाकर यदि वह अतिरिक्त लाभ प्राप्त कर सकता है तो उस प्रकार का प्रयास करेगा और किसी को डांट झपट कर काम निकालने का प्रयास करेगा। मूल्य तथा समाज को अग्रसर करने वाली मान्यताएं उसके चिंतन में तो आएंगी लेकिन समाज कभी को उस रूप में नहीं देखेगा।

वर्तमान में लोगों की स्थिति इस प्रकार हो गई है कि वह सच को समझने की चेष्टा करने को महत्व नहीं देते इसके स्थान पर वे चाहते हैं कि उनके मार्गदर्शन का कार्य करने वाले साहित्यकार वर्ग अपनी एक भूमिका निश्चित कर ले या तो वह व्यवस्था और मान्यताओं को निर्मित करें या फिर उनका एकतरफा विरोध करना शुरू कर दें। कवि व्यवस्था का आंख मूंदकर खंडन,मंडन समर्थन करने के बजाय उसकी अच्छाइयों,बुराइयों पर ज्यादा ध्यान देता है और उसे लोगों के सामने रखना चाहता है।लेकिन भौगोलिक रूप से स्वाधीन हो गए उस देश में लोगों की मानसिकता अभी पूरी स्वतंत्र नहीं हुई है। इसलिए इस प्रकार के स्वतंत्र चिंतन से वह चौक ते हैं और उसे सहज रूप से ग्रहण नहीं कर पाते।