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हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/अमीर खुसरो और विद्यापति का साहित्यिक महत्व

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अमीर खुसरो[सम्पादन]

अमीर खुसरो

पृथ्वीराज की मृत्यु (संवत् 1249) के 90 वर्ष पीछे अमीर खुसरो ने संवत् 1340 के आसपास रचना आरम्भ की। इन्होंने गयासुद्दीन बलबन से लेकर अलाउद्दीन और कुतुबुद्दीन मुबारक शाह तक कई पठान बादशाहों का जमाना देखा था। ये फ़ारसी के बहुत अच्छे ग्रंथकार और अपने समय के प्रसिद्ध कवि थे। इनकी मृत्यु संवत् 1389 में हुई। ये बड़े ही विनोदी, मिलनसार और सहृदय थे, इसी से जनता की सब बातों में पूरा योग देना चाहते थे। जिस ढंग के दोहे, तुकबंदियां और पहेलियां आदि साधारण जनता की बोलचाल में इन्हें प्रचलित मिली उसी ढंग से पद्य, पहेलियां आदि कहने की उत्कंठा इन्हें भी हुईं। इनकी पहेलियां और मुकरियां प्रसिद्ध है। इनमें उक्तिवैचित्र्य की प्रधानता थी। यद्यपि कुछ रसीले गीत और दोहे भी इन्होंने कहें हैं। खुसरो की हिन्दी रचनाओं में भी दो प्रकार की भाषा पायी जाती है। ठेठ खड़ी बोलचाल, पहेलियां, मुकरियां, और दो सूखने में ही मिलती है - यद्यपि उनमें भी कहीं - कहीं ब्रजभाषा की झलक है। पर गीतों और दोहों की भाषा ब्रज या शौरसेनी काव्यभाषा ही है। इनके द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या १०० बतायी जाती हैं, जिनमें अब २०-२१ ही उपलब्ध है। खालिकबारी , पहेलियां , मुकरियां , दो सुखने, ग़ज़ल आदि उनमें अधिक प्रसिद्ध हैं। कुछ ग्रंथों में मनोरंजन और जीवन पर गहरे व्यंग्य एक साथ देखने को मिलते हैं। उनकी भाषा के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए एक पहेली :-

तरवर से इक तिरिया उतरी, उनने बहुत रिझाया।

बाप का उसने नाम जो पूछा, आधा नाम बताया॥ आधा नाम पिता पर प्यारा, बुझ पहेली गोरी।

अमीर खुसरो यों कहे, अपने नाम न बोली-'निबोरी'॥

दोहे

(1)

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।

चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुं देस।।


(2)

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।

तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग॥


(3)

देख मैं अपने हाल को राऊ, ज़ार - ओ - ज़ार।

वै गुनवन्ता बहुत है, हम है औेगुन हार।।


(4)

चकवा चकवी दो जने उन मारे न कोय।

ओह मारे करतार के रैन बिछौही होय।।


(5)

सेज सूनी देख के रोऊँ दिन रैन।

पिया पिया कहती मैं पल भर सुख न चैन।।

चमत्कार और कौतूहल की प्रवृत्तियां भी खुसरो की प्रेरणा से हिन्दी काव्य में विशेष स्थान पाने लगीं। फलतः रीतिकाल में कुतूहल - काव्यों की एक लम्बी परम्परा चली थी।

विद्यापति[सम्पादन]

विद्यापति

विद्यापति को आदिकाल के फुटकल रचनाओं का कवि माना जाता है। फुटकल रचनाएं का अर्थ है, प्रकिर्ण साहित्य। पचास - साठ वर्ष पीछे विद्यापति संवत् 1460 में वर्तमान ने बीच - बीच में देशभाषा के भी कुछ पद्य रखकर अपभ्रंश में दो छोटी - छोटी पुस्तकें लिखी, पर उस समय तक अपभ्रंश का स्थान देवभाषा ले चुकी थी। उनके दो प्रमुख काव्य रचना कीर्तिलता और कीर्तिपताका है, जो जॉर्ज ग्रियर्सन जब विद्यापति के पदों का संग्रह कर रहे थे। इनकी पदावली के कारण ये मैथिलकोकिल , अभिनव जयदेव , नवकवि शेखर कहलाए जाते हैं। इन्होंने अपने समय की प्रचलित मैथिली भाषा का व्यवहार किया है।

विद्यापति के पद्य अधिकतर श्रृंगार काव्य के ही हैं, जिनमें नायिका और नायक राधा - कृष्ण हैं। इन पदों की रचना जयदेव के गीतकाव्य के परंपरा में रही है। इनका माधुर्य अद्भुत है। विद्यापति शैव थे। उन्होंने इन पदों की रचना श्रृंगार काव्य की दृष्टि से की है। विद्यापति को कृष्णभक्तों की परंपरा में नहीं समझना चाहिए।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार:- आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए है। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘ गीतगोविंद ’ के पदों को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।

सरस बसंत समय भूल पावली,

दछिन पवन बह धीरे।

सपनहु रुप वचन इक भाषिय,

मुख से दूरि करु चीरे॥

कीर्तिलता पुस्तक में तिरहुत के राजा कीर्तिसिंह की वीरता, उदारता गुणग्राहकता आदि का वर्णन बीच में कुछ देश भाषा के पद्य रखते हुए, अपभ्रंश भाषा के दोहे, चौपाई, छप्पय, छंद गाथा आदि छंदों में किया जाता है। इस अपभ्रंश की विशेषता यह है कि यह पूर्वी अपभ्रंश है।

रज्ज लुध्द असलान बुद्धि बिक्कम बले हारल।

पास बइसि बिसवासि राय गयनेसर मारल ॥

दूसरी विशेषता विद्यापति के अपभ्रंश की यह है कि प्रायः देश भाषा कुछ अधिक लिये हुए हैं और उसमें तत्सम, संस्कृत शब्दों का वैसा बहिष्कार नहीं हैं। तात्पर्य यह है कि वह प्राकृत रूढ़ियों से उतनी अधिक बंधी नहीं है।

पुरिसत्तेण पुरिसउ, नहिं पुरिसउ जम्म मत्तेन।

जलदानेन हु जलसो, न हु जलसों पुंजिओ धूमो॥

इस तरह विद्यापति आदिकाल के महत्वपूर्ण कवि थे।