हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/आदिकाल की परिस्थितियाँ

विकिपुस्तक से
Jump to navigation Jump to search

साहित्य मानव समाज के विविध भावों एवं सतत परिवर्तनशील रहने वाली चेतना की अभिव्यक्ति है। साहित्यिक रचनाओं के पीछे ऐतिहासिक शक्तियों और सामाजिक संस्थाओं का योगदान रहता है। किसी काल विशेष की साहित्यिक जानकारी से तद्‌युगीन मानव समाज को समग्रता में जाना जा सकता है। हमे चाहे किसी भी युग के साहित्य की चर्चा करें, उसके साहित्यिक मूल्य उसके अपने समाज की वास्तविकता से ही प्रमाणित होते हैं। इसीलिए साहित्य के सामाजिक मूल्य और उसकी कलात्मक व्याख्या के लिए समाज की जानकारी अनिवार्य हो जाती है।

राजनीतिक परिस्थितियाँ[सम्पादन]

राजनीतिक दृष्टि से यह युद्ध और अशांति का काल था। हर्षवर्धन ने सन् 606 ई० सिंहासन संभाला और अपनी योग्यता तथा प्रतिभा से अपने विरोधियों को वश में कर लिया। हर्षवर्धन के शाषन काल में ही चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था और उसने तत्कालीन भारत में धर्म और समाज के व्यवस्थित होने का उल्लेख किया था। सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात उत्तर भारत अनेक रियासतों में विभक्त हो गया। गहड़वाल, परमार, चौहान और चंदेल वंश के राजपूत राजाओं ने अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे। इन राजवंशों के पारस्परिक युद्ध, कलह तथा निरंतर बढ़ते हुए विघटन से सामंतवादी व्यवस्था को प्रोत्साहन मिला। निरंकुश शासन व्यवस्था के कारण राजनीतिक चेतना और विदेशी आक्रमणकारियों से मुकाबला करने की शक्ति क्षीण होकर नष्ट होने लगी।

इस युग में छोटे-छोटे शासकों के मध्य होने वाले ये युद्ध अधिकांशतः अकारण होते थे, केवल शौर्य प्रदर्शन और पराक्रम दिखाना ही शासकों का उद्देश्य होता था। तात्पर्य यह कि यह काल केंद्रीय सत्ता के अभाव में आपसी संघर्षों का काल था। युद्ध ने देश को खोखला और जर्जर बना दिया था।

इस युग की राजनीतिक व्यवस्था में दो मुख्य बातें मिलती हैं -–– केंद्रीय सत्ता का अभाव तथा छोटे-छोटे राज्यों का उदय। गुप्त युग और हर्ष युग की केंद्रीय सत्ता के अभाव के बाद संस्कृत भाषा की केंद्रीयता भी समाप्त होती दिखाई देती है। बोलचाल की भाषाओं में साहित्य की रचना होने लगी थी। राजदरबारों में पांडित्य प्रदर्शन संस्कृत साहित्य की मूलभूत विशेषता थी, जिसका ह्रास होने लगा था। साहित्य रचने के लिए अनुभव की प्रामाणिकता अनिवार्य हो गई थी। चारण युद्धक्षेत्र में अनुभव प्राप्त करते थे, इसीलिए उनमें अनुभूति की वास्तविकता होती थी। आदिकाल का रासो साहित्य इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

धार्मिक परिस्थितियाँ[सम्पादन]

इस काल में अनेक प्रकार के धार्मिक-सांप्रदायिक मत-मतांतरों का अस्तित्व था। भारतीय धर्म-साधना में उथल-पुथल मची हुई थी। सम्राट हर्षवर्धन के समय ब्राह्मण और बौद्ध धर्म का समान आदर था। इन धर्मों ने आपस में आदान-प्रदान करते हुए समन्वय का उदाहरण भी प्रस्तुत किया। किंतु राजनीति की तरह हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद धार्मिक स्थिति भी बदली। केन्द्रीय सत्ता के अभाव में धर्म के क्षेत्र में भी अराजकता फैल गई। वेद-शास्त्रों के विधि-विधान और कर्मकांड को लेकर चलने वाले सनातन मत और बौद्ध मत में संघर्ष होने लगे। परिणामतः साधारण जनता धर्म के वास्तविक आदर्श को भूलकर जादू-टोने और तंत्र-मंत्र में विश्वास करने लगी थी। बौद्ध धर्म की इन शाखाओं में तंत्र-मंत्र, हठयोग आदि के साथ पंचमकारों (मांस, मैथुन, मत्स्य, मद्य, मुद्रा) के बिना साधना अधूरी मानी जा रही थी। तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, तथा भोग-विलास को लेकर चलने वाले ये वाममार्गी ही बौद्ध सिद्ध कहलाए। दूसरी तरफ़ नियम, संयम और हठयोग के द्वारा साधना के कठिन मार्ग पर बढ़ने वाले नाथ के रुप में जाने गए।

पश्चिमी भारत में व्यापारियों के बीच जैन मत लोकप्रिय था। पश्चिमी भारत में जैन मत का प्रचार हो रहा था। हालांकि बौद्धों की विकृति का प्रभाव जैन मत पर भी पड़ रहा था जिसके कारण वो भी अपने आदर्शों से दूर हट रहा था।

सामाजिक परिस्थितियाँ[सम्पादन]

राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के कारण समाज में विशृंखलता आ गई थी। सामान्य जनता शिक्षा से वंचित थी। निर्धनता बढ़ती जा रही थी जिसने जनता की स्थिति को अत्यंत दयनीय बना दिया। वह शासन तथा धर्म दोनों ओर से निराश्रित होती जा रही थी। वास्तविकता यह थी कि दोनों ही जनता का शोषण कर रहे थे। राजपूतों के पास सत्ता होने के कारण समाज में उनका दबदबा बढ़ा जिससे ब्राह्मणों के वर्चस्व को खतरा महसूस हुआ। समाज विभिन्न जातियों, उप–जातियों में विभाजित था जिससे अनेक विकृतियाँ पनप रही थीं। समाज में नारी की दशा अत्यंत शोचनीय थी। राजाओं में बहुविवाह की प्रथा का प्रचलन था। वह मात्र भोग की वस्तु रह गई थी जिसका क्रय विक्रय तक किया जा सकता था। सती प्रथा एक भयंकर अभिशाप की तरह पनपी जो कि आगे चलकर राजपूतों के स्वाभिमान का प्रतीक बन गई। नारी के कारण अकसर युद्ध भी हुआ करते थे।

साहित्यिक परिस्थितियां[सम्पादन]

इस काल में साहित्यिक परिस्थितियों का विशेष महत्व था। अशांत वातावरण में भी इसने निरंतर विकास किया । इस काल में ज्योतिष , दर्शन , स्मृति आदि विषयों के अलावा हर्ष का नैषध चरित आदि जैसे कवियों की रचना हुई। संस्कृत में भी खूब रचनाएं हुई संस्कृत के अलावा प्राकृतिक एवं अपभ्रंश में भी प्रचुर मात्रा में श्रेष्ठ साहित्य रचा गया। जैन , सिद्धों का साहित्य इसका प्रमाण है। देशभाषा में भी साहित्य की रचना हुई साहित्य जनता की भावनाओं को मानसिक स्थितियों का व्यक्त करने का माध्यम बन गया था। संस्कृत के कवि रचनात्मक प्रतिभा के उद्घाटन में अपभ्रंश के कवि धर्म प्रचार में लीन थे , केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो साहित्य के माध्यम से तत्कालीन परिस्थितियों को किसी रूप में उद्घाटित कर रही थी।

सांस्कृतिक परिस्थितियां[सम्पादन]

हर्षवर्धन के समय तक भारतीय संस्कृति अपने चरमोत्कर्ष पर थी , उस समय तक स्वाधीनता तथा देश भक्ति के भाव दृढ़ थे। पारंपरिक संगीत , मूर्ति , चित्र , स्थापत्य आदि कलाओं ने खूब प्रगति की। उस समय मंदिरों का निर्माण भी भव्य रुप में हुआ भुवनेश्वर , सोमनाथ , पूरी , कांची , तंजौर , खुजराहो आदि। प्रायः सभी कलाओं में धार्मिक भावनाओं की छाप थी ‘ अलबरूनी ‘ ने हिंदुओं के मंदिर शैली की बड़ी प्रशंसा की है , किंतु मुसलमानों ने इस कला पर कुठाराघात किया और मंदिरों को नष्ट करते गए। यवनों के आक्रमण से भारतीय संस्कृति का विघटन होने लगा। हमारे त्यौहार , मेलों , खान – पान , वेशभूषा , विवाह आदि पर इस्लाम का गहरा प्रभाव पड़ता गया। कला के क्षेत्र में भी भारतीय परंपरा लुप्त हो गई। गायन , वादन , नृत्य आदि पर भी इस विदेशी संस्कृति का प्रभाव पड़ा। हिंदू राजाओं ने भी विदेशी कलाकारों को प्रश्रय प्रदान किया जिसके कारण धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति लुप्त होती गई। मुसलमान मूर्ति विरोधी थे अतः मूर्तिकला का भी विकास समाप्त हो गया।