हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/भक्तिकाल के विभिन्न संप्रदाय और उनके आचार्य

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भक्ति के अनेक संप्रदाय हैं। उनमें से चार प्रमुख संप्रदाय और उनके आचार्यों का परिचय संक्षेप में दिया जा रहा है। ये संप्रदाय हैं --- श्री संप्रदाय, ब्राह्म संप्रदाय, रुद्र संप्रदाय, सनकादि या निम्बार्क संप्रदाय।

श्री संप्रदाय[सम्पादन]

श्री संप्रदाय के आचार्य रामानुज हैं। कहा जाता है कि लक्ष्मी ने इन्हें जिस मत का उपदेश दिया, उसी के आधार पर इन्होंने अपने मत का प्रवर्तन किया। इसीलिए इनके संप्रदाय को श्री संप्रदाय कहते हैं। इन्हीं की परंपरा में रामानन्द हुए। रामानन्द प्रयाग में उत्पन्न हुए थे। इनके गुरु का नाम राघवानन्द था। इन्होंने अवर्ण - सवर्ण, स्त्री - पुरुष, राजा - रंग, सभी को शिष्य बनाया। रामानन्द के १२ शिष्य हुए -- रैदास, कबीर, धन्ना, सेना, पीपा, भावानंद, सुखानंद, अनंतानंत, सुरसुरानंद, पद्मावती, सुरसुरी। इस संप्रदाय का दार्शनिक आधार विशिष्टाद्वैत है, जो रामभक्ति का प्रतिपादन करता है। अर्थात् जब भक्ति विशेष रूप से होती है।

ब्राह्म संप्रदाय[सम्पादन]

ब्राह्म संप्रदाय के प्रवर्तक माध्वाचार्य थे। उनका जन्म गुजरात में हुआ था। चैतन्य महाप्रभु पहले इसी संप्रदाय में दीक्षित हुए थे। इस संप्रदाय का दार्शनिक आधार द्वैताद्वैत कहलाता है।

रुद्र संप्रदाय[सम्पादन]

इसके प्रवर्तक विष्णुस्वामी थे। वस्तुतः यह महाप्रभु वल्लभाचार्य के के पुष्टि संप्रदाय के रुप में ही हिन्दी में जीवित है। जिस प्रकार रामानन्द ने राम की उपासना पर बल दिया था। उसी प्रकार वल्लभाचार्य ने कृष्ण की उपासना को आगे बढ़ाया। इन्होंने प्रेमलक्षणा भक्ति ग्रहण की। भगवान के अनुग्रह के भरोसे नित्य लीला में प्रवेश करना जीव का लक्ष्य माना। सूरदास एवम् अष्टछाप के कवियों पर इसी संप्रदाय का प्रभाव है। इसका दार्शनिक आधार द्वैतमत था।

सनकादि संप्रदाय[सम्पादन]

इस संप्रदाय के प्रवर्तक निबार्काचार्य थे। हिन्दी भक्ति साहित्य को प्रभावित करने वाले राधावल्लभी संप्रदाय का संबंध इसी से जोड़ा जाता है। राधावल्लभी संप्रदाय के प्रवर्तक गोंसाई हित हरिवंश का जन्म सन् १५०२ में मथुरा में हुआ था।