हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/भक्ति का उदय

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हिन्दी साहित्य के संदर्भ में भक्तिकाल से तात्पर्य उस काल से है जिसमें मुख्यतः भागवत धर्म के प्रचार तथा प्रसार के परिणाम स्वरूप भक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ था और उसकी लोकोन्मुखी प्रवृति के कारण धीरे - धीरे लोक प्रचलित भाषाएं भक्ति - भावना की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती गई।

भारतीय धर्मसाधना के इतिहास में भक्तिमार्ग मा विशिष्ट स्थान है, यद्यपि संहिता भाग के रचनाकाल तक उसके अस्तित्व का कोई परिचय नहीं मिलता वैदिक युग में यज्ञ अथवा कर्मकांड के माध्यम से धर्मानुष्ठान करते थे। विनय अथवा प्रार्थना भी उनके दैनिक जीवन की उल्लासमयी अभिव्यक्ति थी। उनका ध्यान मुख्यतः ऐहित सुखों की प्राप्ति पर केंद्रित था और वे अंतःकरण की साधना की अपेक्षा बाह्य भक्त के लिए यह स्वाभाविक ही गया कि वह बिखरी हुई शक्तियों फलस्वरूप बहुदेवों की कल्पना सिमट कर धीरे - धीरे एक में ही सम्माहित होने लगी, और कहा जाने लगा कि विद्वान लोग उसी (सत्) को इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि के नाम से पुकारने लगे।