हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/संत काव्य

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कबीर

भक्तिकाल की संतकाव्य परंपरा में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाम कबीर का है। कबीर ने सभी धर्मों की आलोचना करते हुए धर्मेतर अध्यात्म को काव्य जगत में प्रतिष्ठित किया। कबीर निर्गुण ब्रह्म के उपासक होने के कारण ही स्वरूप भेद को विभिन्न स्तरों पर नकारते दिखते हैं।

निर्गुण का स्वरूप[सम्पादन]

कबीर के निर्गुण ब्रह्म पर भारतीय अद्वैतवाद और इस्लामी एकेश्वरवाद का प्रभाव माना जा सकता है। ब्रह्म एक ही है और भक्त से पृथक उसका अस्तित्व नहीं। कबीर स्पष्ट करते हैं - 'मुसलमान का एक खुदाई, कबीर का स्वामी रह्या समाई'। निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप का विवेचन कबीर इन शब्दों में करते हैं -

जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप सरूप।
पुहुप बास ते पातरा, ऐसा तत्त अनूप।।

निर्गुण ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वव्यापी एवं सर्वशक्तिमान है तथापि वह अगोचर एवं अकथनीय है। कबीर ने उसे अनंत सूर्य के तेज की भाँति माना है -

पारब्रह्म के तेज का कैसा है उनमान।
कहिबे कूँ सोभा नहीं देख्या ही परवान।।

कबीर ने अपने निर्गुण ब्रह्म को विभिन्न नामों से पुकारा है। कबीर तात्विक तौर पर निर्गुण और सगुण में कोई भेद नहीं करते है। वे तो कहते हैं कि 'निर्गुण की सेवा करो, सगुण का करो ध्यान'। उनका 'नाम स्मरण' भक्ति का आलंबन मात्र है। निर्गुण ब्रह्म 'सर्वनियन्ता' किन्तु 'अजन्मा' है। कबीर राम नाम का मरम समझने पर जोर देते हैं तथा अवतारवाद का खंडन करते हैं -

दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना,
रामनाम का मरम है आना।।

निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन धर्म के नाम पर अलगाव व घृणा का नीति का निषेध करने के निमित्त ही हुआ। कबीर के लिए भक्ति मानव जीवन को कर्म-प्रवृत्त कर सुखी, सहज व प्रेमसिक्त करने का उच्चतम मूल्य है। निर्गुण ब्रह्म का सत्व ईश्वर के साथ ही मानव-मात्र की एकता का प्रतिपादक है -

हमरे राम रहीम करीमा केसौ अलह राम सति सोई,
बिसमिल मेटि बिसंभर एकै और न दूजा कोई।।

कबीर की काव्य-कला (कविताई)[सम्पादन]

कविताई के संबंध में कबीर का कहना है -

तुम जिन जानहु गीत यह, यह निज ब्रह्म विचार।
केवल कहि समुझाइया आतम साधन सार रे।।

कबीर की कविताई 'अनभै साँचा' के साथ 'आतम साधन सार' के रूप में 'अनभै साँचा' को हमारे सामने रखती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर के कवित्व को 'घलुए की वस्तु' माना है। रामचंद्र शुक्ल को तो उनकी बातें चिढ़ाने वाली अधिक लगीं, हालांकि वे यह भी मानते हैं कि 'प्रतिभा उनमें प्रखर थी इसमें संदेह नहीं'। कबीर की कविताओं का भावोन्मेष अद्भुत है तभी तो वह सभी विभाजनकारी ताकतों पर समान चोट करती हैं। भक्तिकाल में जायसी को छोड़कर किसी भी भक्त ने स्वयं को प्राथमिक रूप से कवि नहीं स्वीकारा है। कबीर भी 'निज ब्रह्म विचार' को 'गीत' पर वरीयता देते हैं। बावजूद इसके कबीर के विचारों में अनुभूति की इतनी गहनता है कि उन्हें कवि के अलावा कहा भी जाय तो क्या? उनके कवित्व को 'घलुए की वस्तु' मानने वाले हजारी प्रसाद द्विवेदी भी स्पष्ट करते हैं कि - "कबीर की वाणी का अनुकरण नहीं हो सकता। अनुकरण करने की सभी चेष्टाएं व्यर्थ सिद्ध हुई हैं। इसी व्यक्तित्व के आकर्षण को सहृदय समालोचक संभाल नहीं पाता और रीझकर कबीर को कवि कहने में संतोष पाता है।"

कबीर अपने अनुभव जगत में 'सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय' के हिमायती हैं। कबीर की रचना-प्रक्रिया का केंद्रीय तत्व 'प्रेम' है, जो भाव और भाषा का सर्जनात्मक आधार भी है -

पिंजर प्रेम प्रकास्या अंतरि भया उजास।
मुख कस्तूरी महमही बानी फूटी बास।।

प्रेम तत्व ने ही 'घर फूंक तमाशा देखने' की मस्ती वाले अक्खड़ कबीर की वाणी में कोमलता, सरसता एवं ऐंद्रिकता को घोल दिया है। यदि छंद, रस, अलंकार, बिंब व प्रतीक विधान ही काव्य के नियामक तत्त्व हैं तब भी कबीर एक श्रेष्ठ गायक ही ठहरेंगे। उलटबाँसियों के माध्यम से कबीर अपनी अभिव्यक्ति के लिए नए मिथकों का निर्माण करते हैं, जहाँ ज्ञानियों को उन्हीं भाषा में जवाब दिया जा सके। ज्ञान और शास्त्र के वर्चस्व वाले समाज में भी कबीर को -

"ऐसा कोई न मिले जासूँ कहूँ निसंक।
जासूँ हिरदै की कहूँ सो फिरी मारै डंक।।"

कबीर की कविता अपने समय के सांस्कृतिक पूर्वग्रहों और वर्चस्व को जितने गहरे ढंग से, जितनी मानवीय आकुलता से प्रश्नबिद्ध करती है, वह वर्चस्वशील काव्यशास्त्र में उतनी ही तिरस्कृत किंतु कालांतर में उतनी ही स्वीकृत होती चली जाती है।

कबीर : गुरू महात्म्य[सम्पादन]

निर्गुण कवियों की भाँति कबीर भी गुरू महिमा का बखान करते हैं। कबीर मानते हैं कि - 'गुरु गोबिंद तो एक हैं, दूजा यहु आकार'। वे गुरू को तो ईश्वर से महत्तर स्थान देते हैं क्योंकि - 'हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर'। 'कागद लेखी' ज्ञान के इस संसार में सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा सच्चा गुरू ही दे सकता है। कबीर कहते हैं -

पीछे लागा जाइ था, लोक बेद के साथ।
आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि।।

कबीर के समय में वेद विदित कर्मकांडों से परिचित लोक-व्यवहार में अंधविश्वासों एवं पाखंड का बोलबाला था। ऐसे समय में ज्ञानियों एवं योगियों की लहर सी आ गयी थी जिसके ज्ञान का आधार मिथ्या वाह्याचार था। 'भेष रंगाए जोगी' और 'मूड़ मुड़ाए सन्यासी' कहीं भी चिमटा गाड़कर वेद-शास्त्र की धज्जियाँ उड़ाते तत्व ज्ञान का प्रसार कर रहे थे। कबीर ने ऐसे गुरुओं और उनके चेलों की बुरी गत बताई -

जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध।
अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत।।

कबीर सदैव 'सतगुरु' को याद करते दिखाई पड़ते हैं। 'सतगुरु सवाँ न को सगा' कहकर कबीर उसे ऐसे रूप में स्वीकार करते हैं, जो मनुष्य के समस्त सदगुणों को दीप्त कर उसे ईश्वरत्व तक उठा देता है -

बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौहाड़ी कै बार।
जिनि मानिष तै देवता, करत न लागी बार।।

संत कवियों ने प्रायः नाम लिए बिना ही गुरु का स्मरण किया है। हालांकि कबीर ने अपने गुरु के नाम का स्पष्ट उल्लेख किया है - 'रामानंद रामरस माते, यहि कबीर हम कहि कहि थाके।'

कबीर के राम और तुलसी के राम[सम्पादन]

भक्ति काव्य में ईश्वर के दो रूपों की उपासना में कबीर निर्गुण ब्रह्म को चुनते हैं तो तुलसी उसके सगुण साकार स्वरूप को। हालांकि दोनों कवियों ने 'राम' की महिमा का बखान किया है। जहाँ कबीर राम को निर्गुण, निराकार, अजन्मा तथा अगोचर मानते हैं :

जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप सरूप।
पुहुप बास ते पातरा, ऐसा तत्त अनूप।।

वहीं तुलसी ने उन्हें सगुण, साकार व लोकमंगल का नियामक माना है। कबीर के लिए राम नाम स्मरण के रूप में भक्ति का आलंबन मात्र हैं। 'दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना' कहकर वे राम नाम के मर्म पर जोर देते हैं।ऐसा वे अवतारवाद का खंडन करने के लिए बारंबार कहते हैं : 'ना दसरथ घरि औतरि आवा, ना लंका का राव सतावा।' हालांकि ऐसे भी प्रसंग हैं जब कबीर भी तुलसी की 'दास्य भाव' की भक्ति की स्वीकार करते हैं :

कबिरा कूता राम का मुतिया मेरा नाउँ।
गले राम की जेवड़ी जित खैंचे तित जाउँ।।

कबीर की अनूठी विशेषता यह है कि उनकी काव्य संवेदना में प्रेम सिर्फ निरीह आत्मसमर्पण का रूपक नहीं, प्रचंड प्रश्नाकुलता का आधार भी है। प्रेम की सघनता के क्षणों में भक्त और भगवान का अंतर मिटाकर कबीर अपने 'राम की बहुरिया' तक बन जाते हैं। वहीं तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तथा लोकमंगल एवं पालन हेतु अवतार ग्रहण किए हैं -

जब-जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हि असुर अधम अभिमानी।।
तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

यहाँ राम शक्ति, शील और सौंदर्य से युक्त हैं। विष्णु के अवतार के रूप में धर्म की स्थापना के निमित्त शरीर धारण किए हैं। तुलसी ने राम के उदार, भक्त वत्सल रूप की प्रशंसा बार-बार की है :

ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोउ नाहीं।।

तुलसी के राम नर रूप में नानाविध लीलाओं में प्रवृत्त दिखते हैं। कबीर की भाँति तुलसी के यहाँ भक्त एवं भगवान के बीच भेद नहीं मिटता। राम के 'कोटि मनोज लजावनहारे' रूप का वर्णन करते हुए भी तुलसी भक्त ही रहते हैं, कबीर की भाँति कांता भाव प्रदर्शित नहीं करते। इस प्रकार तात्विक अभेद के बावजूद कबीर और तुलसी के राम में स्वरूपगत भेद विद्यमान है।