हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/साहित्येतिहास एवं इतिहास दर्शन

विकिपुस्तक से
Jump to navigation Jump to search

इतिहास में अतीत की वास्तविक और यथार्थ घटनाओं और प्रवृत्ति का कालक्रमानुसार वर्णन, विवेचन और विश्लेषण होता है। इतिहास में इतिवृत्त होता है, घटनाएं होती हैं और तथ्य होते हैं किंतु यह सब मिलाकर भी इतिहास नहीं होता। इतिहास चाहे वह किसी साहित्य का हो या फिर किसी देश का, केवल तथ्यों से नहीं बनता बल्कि उसमें तथ्यों से अधिक महत्व व्याख्याओं का होता है। इतिहासकार एडवर्ड हॉलेट कार ने अपनी पुस्तक 'इतिहास क्या है' में इस संबंध में माना है कि कोई भी इतिहासकार अपने इतिहासबोध के आधार पर ही तथ्यों का चयन और विवेचन करता है। दार्शनिक मिशेल फूको ने इतिहासकार के दृष्टिकोण के अत्यधिक महत्व को ध्यान में रखते हुए इतिहास की वस्तुनिष्ठता पर प्रश्नचिह्न लगाया है। सामान्य अर्थों में इतिहास अतीत में घटित राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का विश्लेषण होता है। नलिन विलोचन शर्मा के अनुसार "घटनाओं के वास्तविक क्रम को द्योतित करने के लिए 'इतिहास' शब्द का प्रयोग होता है।"[१] इतिहास न केवल हमें अतीत से परिचित कराता है बल्कि वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में अतीत का मूल्यांकन भी करता है। इसीलिए नलिन विलोचन इतिहास के दूसरे प्रचलित अर्थ "संसार की घटनाओं या उनके कुछ अंशों के प्रभाव का आलेखन"[२] को अधिक उचित मानते हैं। इतिहास में अतीत की वास्तविक और यथार्थ घटनाओं और प्रवृत्तियों का वर्णन, विवेचन और विश्लेषण कालक्रम की दृष्टि से किया जाता है।

इतिहास दर्शन[सम्पादन]

इतिहासकार या किसी द्रष्टा की चेतना में इतिहास की घटनाएं जिस रूप में प्रतिबिंबित होती हैं, उसे इतिहास दर्शन कहते हैं। यह अनिवार्यतः चेतना के इतिहास रूपी प्रक्रिया की एक अवस्था है। दूसरे शब्दों में इतिहासकार अतीत की घटनाओं और तथ्यों का प्रयोग किस तरह से करता है, यह उसके इतिहासबोध पर निर्भर करता है। इतिहास दर्शन अतीत की मूल चेतना एवं उपलब्धियों पर बल देता है और वर्तमान के साथ संवाद स्थापित करता है। इसी संबंध में ई॰एच॰ कार ने कहा था कि, "इतिहास, इतिहासकार और उसके तथ्यों की क्रिया-प्रतिक्रिया की एक अनवरत प्रक्रिया है, अतीत और वर्तमान के बीच एक अंतहीन संवाद है।"[३] यह एक ओर विश्लेषणात्मक एवं तर्कपूर्ण विवेचन करता है तो दूसरी ओर संश्लिष्ट प्रभाव का भी सृजन करता है।

साहित्येतिहास दृष्टि[सम्पादन]

रामचंद्र शुक्ल ने साहित्येतिहास की परिभाषा देते हुए 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में लिखा है, "जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही 'साहित्य का इतिहास' कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है। अतः कारणस्वरूप इन परिस्थितियों का किंचित् दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है।"[४] इस रूप में देखें तो साहित्य का इतिहास अतीत में लिखे गए साहित्य या साहित्यकारों का ब्यौरा मात्र नहीं है। यह अतीत की किसी रचना को अपने युग के यथार्थ के प्रतिबिंबन का केवल साधन मात्र नहीं है। साहित्य के इतिहास का आधार है-साहित्य के विकासशील स्वरूप की धारणा। आशय यह कि साहित्य के इतिहास में साहित्य की विकासमान परंपरा, उसके उद्भव से आज तक की स्थिति का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। 'साहित्य और इतिहास दृष्टि' में मैनेजर पांडेय साहित्य और इतिहास के अंतःसंबंधों पर लिखते हैं, "साहित्यिक रचनाएं इतिहास के भीतर होती हैं और इतिहास का निर्माण भी करती हैं। रचना का अस्तित्व इतिहास के भीतर होता है, इतिहास के बाहर नहीं। कृतियों की उत्पत्ति में इतिहास की सक्रिय भूमिका होती है और पाठकों द्वारा उनके अनुभव तथा मूल्यांकन का इतिहास उनके जीवन का इतिहास होता है। कलाकृतियाँ अपने सामाजिक संदर्भ की उपज होती हैं, लेकिन महत्वपूर्ण कलाकृतियां अपने संदर्भ से परे भी सार्थक सिद्ध होती हैं।"[५] इसलिए किसी भी साहित्य के इतिहास को समझने के लिए उससे संबंधित जातीय परंपराओं, राष्ट्रीय और सामाजिक स्थितियों और परस्थितियों को समझना आवश्यक है।

विधेयवादी या प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण[सम्पादन]

आगस्त कॉम्त के विधेयवादी दर्शन का इतिहास लेखन में पहला प्रयोग इप्पोलाइत अडोल्फ तेन ने किया और उनके माध्यम से हिंदी साहित्येतिहास लेखन में यह दृष्टिकोण प्रविष्ट हुआ। इस दृष्टि की मूल मान्यता है कि 'साहित्य समाज का दर्पण' होता है। इसके अनुसार साहित्य का समाज पर प्रभाव पड़ता है। किसी भी साहित्य के इतिहास के लेखन के लिए उससे संबंधित जातीय परंपराओं, राष्ट्रीय और सामाजिक वातावरण और परिस्थितियों का विवेचन और विश्लेषण किया जाता है। विधेयवादी इतिहासकार साहित्य संबंधी तथ्य एकत्र करने के अलावा तत्कालीन सामाजिक जीवन का अध्ययन करता है, साथ ही समाज और साहित्य के बीच कार्य-कारण संबंध स्थापित करता है। वह वैज्ञानिकता के नाम पर प्राकृतिक विज्ञान की प्रणाली को साहित्य के इतिहास लेखन में लागू करता है। रामचंद्र शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में कुछ सीमा तक इसी दृष्टि से इतिहास लेखन हुआ है। हालांकि इस दृष्टिकोण से इतिहास लेखन में साहित्यिक परंपरा का समुचित मूल्यांकन संभव नहीं हो पाता है। साहित्य निर्माण में परंपरा का भी योगदान होता है। इस दृष्टि की दूसरी सीमा यह है कि रचनाकार के निजी व्यक्तित्व और क्रियाशीलता की उपेक्षा होती है। लेखक सामाजिक यथार्थ को रचना में प्रतिबिंबित ही नहीं करता है बल्कि उसकी पुनर्रचना भी करता है। रामचंद्र शुक्ल द्वारा 'कबीर' का मूल्यांकन इसी सीमा के चलते समुचित तौर पर नहीं हो पाया है। इस दृष्टिकोण की तीसरी सीमा यह है कि रचना के शिल्प के विकास का विवेचन नहीं हो पाता है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि[सम्पादन]

समाजशास्त्रीय दृष्टि की मूलभूत मान्यता यह है कि साहित्य एक सामाजिक निर्मिति है। इतिहासकार का कर्तव्य साहित्य में अंतर्निहित सामाजिक या लोक तत्वों का उद्घाटन कर उसकी मूल प्रेरणा का विश्लेषण एवं जनहित की कसौटी पर उसका मूल्यांकन करना है। रामचंद्र शुक्ल 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में साहित्यिक रचनाओं में निहित लोकमंगल या लोकहित का उद्घाटन करते हैं और उसकी मूल प्रेरणा का भी मूल्यांकन करते हैं। उनके इतिहास में 'लोकमंगल की चेतना' आदि से अंत तक विद्यमान है।

वैज्ञानिक दृष्टि[सम्पादन]

इसे इतिहासकार की निरपेक्ष दृष्टि भी कहा जाता है। इसमें इतिहासकार तथ्यों की वैज्ञानिक और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुति और व्याख्या करता है। तार्किकता के गुण के कारण कुछ विद्वानों ने मार्क्सवादी दृष्टि को भी वैज्ञानिक दृष्टि माना है। हालांकि मार्क्सवादी दृष्टि निरपेक्ष दृष्टि नहीं होती है। गणपति चंद्र गुप्त का 'हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' इसका उदाहरण माना जा सकता है।

मार्क्सवादी या यथार्थवादी दृष्टिकोण[सम्पादन]

मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत माना जाता है कि साहित्य किसी समाज की उत्पादन प्रणाली का ऊपरी ढाँचा है जिसकी व्याख्या बुनियादी ढाँचे अर्थात उत्पादन प्रणाली के माध्यम से ही की जा सकती है। इतिहास दर्शन में आम तौर पर समाजशास्त्रीय दृष्टि को मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर आधारित माना जाता है। मार्क्स ने समाज रचना और उसकी विकास प्रक्रिया में द्वंद्व की भूमिका को गहराई से विवेचित किया है। सामाजिक सृष्टि होने के नाते साहित्य पर इस सामाजिक द्वंद्व का असर पड़ना स्वाभाविक है। मार्क्सवाद साहित्य के वर्गीय स्वरूप, प्रयोजन और विचारधारात्मक रूप को पहचानते हुए साहित्य के इतिहास को समाज के वर्ग-संघर्ष के इतिहास से जोड़कर देखता है। हालांकि समाजशास्त्रीय दृष्टि को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दायरे से सीमित करना उचित नहीं है। समाजशास्त्रीय दृष्टि समाज और साहित्य के विकासशील संबंध को स्थापित करता है जिसे केवल भौतिकवादी विकास के दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता है। मार्क्सवादी दृष्टि इतिहासकार की अंतर-दृष्टि, विवेक और उसके इतिहासबोध को महत्व नहीं देती है जबकि इसके बिना इतिहास लेखन के मूर्त होने की कल्पना नहीं की जा सकती है। साहित्य के इतिहास में साहित्य और समाज का संबंध, परंपरा और रचनाकार के संबंध, इतिहासकार की अंतर्दृष्टि, विवेक और उसके इतिहासबोध की सम्यक जानकारी आवश्यक है।

अन्य दृष्टिकोण[सम्पादन]

दलित और स्त्री दृष्टिकोण के आगमन के पश्चात इतिहास लेखन में भी परिवर्तन आया। सुमन राजे ने 'हिंदी साहित्य का आधा इतिहास' लिखकर बताया कि अब तक का इतिहास लेखन पुरुषवादी दृष्टिकोण से लिखा गया है। आदिकाल के अंतर्गत थेरीगाथाओं को स्थान देकर उन्होंने अपने इतिहासबोध में स्त्री दृष्टिकोण का समावेश किया। इसी दृष्टिकोण के कारण उन्होंने रीतिकाल को अपने इतिहासबोध का हिस्सा ही नहीं बनाया। दलित दृष्टिकोण के अंतर्गत धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिषराय तथा जयप्रकाश कर्दम इत्यादि लेखकों ने भी इतिहास के कुछ प्रसंगों को उठाया है। इनका तर्क है दलित ही दलितों की समस्या को समझ सकता है क्योंकि 'स्वयं वेदना' और 'संवेदना' में अंतराल समाप्त नहीं किया जा सकता। इसी दृष्टिकोण से इन्होंने प्रेमचंद की रचनाओं जैसे 'कफन' और 'रंगभूमि' पर प्रश्नचिह्न भी लगाए हैं।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. नलिन विलोचन शर्मा रचना संचयन, चयन एवं संपादन-गोपेश्वर सिंह, साहित्य अकादमी, २०१६, पृष्ठ-२३८
  2. नलिन विलोचन शर्मा रचना संचयन, चयन एवं संपादन-गोपेश्वर सिंह, साहित्य अकादमी, २०१६, पृष्ठ-२३८
  3. ई॰एच॰ कार, इतिहास क्या है, मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, २००६, पृष्ठ-२१
  4. रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, २००५, पृष्ठ-२१
  5. मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, वाणी प्रकाशन, २०००, भूमिक उद्धृत, पृष्ठ-vii-