हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा

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हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा पर विचार करें तो हम पाते हैं कि १९वीं शताब्दी से पूर्व भक्तमाल, कालिदास हजारा, कविमाला, चौरासी वैष्णवन की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता इत्यादि जिन रचनाओं में इतिहास लेखन की आरंभिक झलक दिखायी पड़ती है, वे सभी रचनाएँ इतिहासबोध के स्तर पर प्रभावशून्य हैं। १९वीं सदी में जब इतिहास लेखन की औपचारिक शुरुआत हुई, तो भी पहले कुछ प्रयास जैसे 'गार्सां द तासी' का 'इस्तवार द ला लित्रेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी', शिवसिंह सेंगर का 'शिवसिंह सरोज' आदि किसी निश्चित इतिहासबोध से युक्त नहीं है। जॉर्ज ग्रियर्सन (मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान) और मिश्रबंधु (मिश्रबंधु विनोद) के इतिहास लेखन को आरंभिक प्रयास माना जा सकता है, जिनमें इतिहासबोध के प्रति सजगता दिखाई पड़ती है। हालांकि उन्होंने भी कभी अपने इतिहासबोध की निश्चयात्मक व्याख्या प्रस्तुत नहीं की।

रामचंद्र शुक्ल[सम्पादन]

रामचंद्र शुक्ल का 'हिंदी साहित्य का इतिहास' इतिहासबोध की दृष्टि से हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा में एक सक्रिय परिवर्तन है। उन्होंने अपने इतिहास लेखन में विधेयवादी या प्रत्यक्षवादी इतिहास-दर्शन प्रस्तुत किया जिसके अंतर्गत 'देश, काल और वातावरण' को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया जाता है। देश, काल और वातावरण के प्रभाव को साहित्य में स्वीकार करते हुए रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं, "जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही 'साहित्य का इतिहास' कहलाता है।"[१] इस दृष्टिकोण की विशेषता यह है कि इसमें युगीन परिस्थितियाँ, वैज्ञानिक विश्लेषण-वर्गीकरण को अत्यधिक महत्व दिया गया है। साहित्य का न केवल वर्णन बल्कि काव्यशास्त्रीय व समाजशास्त्रीय मूल्यांकन भी किया गया है। हालांकि रामचंद्र शुक्ल के इतिहासबोध की सीमा यह है कि वे परंपरा और व्यक्तित्व को अपेक्षित महत्व नहीं दे सके और प्रतीकवाद, रहस्यवाद, मुक्तक काव्य, धार्मिक साहित्य इत्यादि के प्रति उदार दृष्टिकोण नहीं रख पाए।

हजारी प्रसाद द्विवेदी[सम्पादन]

हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा को रामचंद्र शुक्ल के उपरांत हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आगे बढ़ाया। 'हिंदी साहित्य का आदिकाल', 'हिंदी साहित्य की भूमिका' तथा 'हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास' आदि रचनाओं में एक नवीन इतिहासबोध प्रस्तुत किया। द्विवेदी जी परंपरावादी दृष्टिकोण के समर्थक हैं, जिसके अंतर्गत किसी भी रचना या रचनाकार का मूल्यांकन इस दृष्टि से होता है कि वह अपनी परंपरा से किस प्रकार प्रभावित हुआ। वे हिंदी साहित्य की भूमिका के तहत उसे "भारतीय चिंता का स्वाभाविक विकास"[२] मानते हैं। इस स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया में ही कबीर का रहस्यवाद नाथों के हठयोग का अगला चरण है, जबकि सूर का शृंगार जयदेव और विद्यापति की परंपरा का अगला चरण। द्विवेदी जी ने साहित्य का मूल्यांकन मानवतावादी प्रतिमानों पर किया। वैज्ञानिक विश्लेषण और वर्गीकरण पर संश्लेषण और समग्रता को वरीयता प्रदान की। इनकी सीमा यह रही कि इन्होंने युगीन परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और कहीं-कहीं रचनाकार का व्यक्तित्व भी पर्याप्त महत्व नहीं पा सका।

राम स्वरूप चतुर्वेदी[सम्पादन]

साहित्येतिहास लेखन की परंपरा में अगले महत्वपूर्ण इतिहासकार रामस्वरूप चतुर्वेदी हैं, जिन्होंने 'हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास' में एक 'समग्रतावादी दृष्टिकोण' प्रस्तुत किया। इनके इतिहासबोध में भाषा और साहित्य के गहरे संबंधों की पड़ताल, साहित्य व अन्य कलाओं के सूक्ष्म संबंधों का विश्लेषण मिलता है। आधुनिक काल के आरंभ में 'पुनर्जागरण' के प्रसंग में वे लिखते हैं कि, "पुनर्जागरण का एक चिह्न यदि दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट है तो दूसरा चिह्न यह भी कहा जाएगा कि वह मनुष्य के संपूर्ण तथा संश्लिष्ट रूप की खोज, और उसका परिष्कार करना चाहता है।"[३] विभिन्न विधाओं के सूक्ष्म अंतरों की व्याख्या भी इनके इतिहास लेखन की विशेषता है। भारतीय संस्कृति और यूरोपीय संस्कृति की टकराहट से पुनर्जागरण या नवजागरण की व्याख्या इनके इतिहासबोध की परिपक्वता को प्रदर्शित करने वाला सबसे मार्मिक प्रसंग है।

रामविलास शर्मा[सम्पादन]

रामविलास शर्मा का इतिहासबोध मार्क्सवादी है। इसके अंतर्गत माना जाता है कि साहित्य किसी समाज की उत्पादन प्रणाली का ऊपरी ढाँचा है जिसकी व्याख्या बुनियादी ढाँचे अर्थात उत्पादन प्रणाली के माध्यम से ही की जा सकती है। इसी दृष्टिकोण के आधार पर वे प्रेमचंद, भारतेंदु और निराला के साथ-साथ महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचंद्र शुक्ल के कृतित्व का मूल्यांकन करते हैं।

अन्य इतिहास लेखन[सम्पादन]

गणपतिचंद्र गुप्त का 'हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' अतिवैज्ञानिकता से युक्त है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक घटना की व्याख्या पूर्ण तार्किक वर्गीकरण एवं विश्लेषण से करने का प्रयास किया जाता है। हालांकि अतिवैज्ञानिकता कहीं-कहीं साहित्य से न्याय नहीं कर पाती। हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री दृष्टिकोण के आगमन के पश्चात इतिहास लेखन में भी परिवर्तन आया। सुमन राजे ने 'हिंदी साहित्य का आधा इतिहास' लिखकर बताया कि अब तक का इतिहास लेखन पुरुषवादी दृष्टिकोण से लिखा गया है। आदिकाल के अंतर्गत थेरीगाथाओं को स्थान देकर उन्होंने अपने इतिहासबोध में स्त्री दृष्टिकोण का समावेश किया। इसी दृष्टिकोण के कारण उन्होंने रीतिकाल को अपने इतिहासबोध का हिस्सा ही नहीं बनाया। दलित दृष्टिकोण के अंतर्गत धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिषराय तथा जयप्रकाश कर्दम इत्यादि लेखकों ने भी इतिहास के कुछ प्रसंगों को उठाया है। इनका तर्क है दलित ही दलितों की समस्या को समझ सकता है क्योंकि 'स्वयं वेदना' और 'संवेदना' में अंतराल समाप्त नहीं किया जा सकता। इसी दृष्टिकोण से इन्होंने प्रेमचंद की रचनाओं जैसे 'कफन' और 'रंगभूमि' पर प्रश्नचिह्न भी लगाए हैं।

निष्कर्ष[सम्पादन]

उपर्युक्त संपूर्ण विवेचन को ध्यान में रखें तो हिंदी साहित्येतिहास लेखन परंपरा में इतिहास दर्शन का विकास रामचंद्र शुक्ल के बाद से कई दिशाओं में हुआ है। समाज और स्थितियों के परिवर्तन के साथ इतिहासबोध का बदलना स्वाभाविक है। यह दावा कभी नहीं किया जा सकता कि कोई एक इतिहास दर्शन अपने आप में संपूर्ण है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें अभी भी अपार संभावनाएं हैं।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. शुक्ल, रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, २०१५, पृष्ठ-१३
  2. द्विवेदी, हजारी प्रसाद, हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल प्रकाशन, २०१६, पृष्ठ-१५
  3. चतुर्वेदी, रामस्वरूप, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ-८०