हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल तक)/हिन्दी का विकास

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आदिकाल[सम्पादन]

हिन्दी भाषा अपने आदिकाल में सभी बातों में अपभ्रंश के बहुत निकट है, क्योंंकि उसी से हिन्दी का उद्भव हुआ है। आदिकालिन हिन्दी का व्याकरण (1000 या 1100) ई० के आस - पास तक अपभ्रंश के बहुत निकट था। भाषा में काफ़ी रुप ऐसे थे जो अपभ्रंश के थे। किंतु धीरे - धीरे अपभ्रंश के व्याकरणिक रुप कम होते गए और हिन्दी के अपने रुप विकसित होते गए। धीरे - धीरे 1500 ई० तक आते - आते हिन्दी अपने पैरों पर खड़ी हो गई और अपभ्रंश प्रायः प्रयोग से निकल गए।

आदिकालीन हिन्दी का शब्द भंडार अपने प्रारंभिक चरण में अपभ्रंश का ही था। किंतु धीरे धीरे उसमें कुछ परिवर्तन आते गए जिनमें उल्लेख दो - तीन हैं: --

(१) भक्ति आन्दोलन का प्रारंभ हो गया था। अतः तत्सम शब्दावली आदिकालीन हिन्दी में अपभ्रंश की तुलना में कुछ लगी थी।

(२) भक्ति आन्दोलन तथा मुसलमानी शासन का प्रभाव समाज पर भी पड़ा जिसके परिणाम स्वरूप कुछ ऐसे पुराने शब्द जो अपभ्रंश में प्रचलित थे इस काल में अनावश्यक अथवा अल्पावश्यक होने के कारण या तो हिन्दी शब्द भंडार से निकल गए या तो उनका हिन्दी का प्रयोग बहुत कम ही गया।

इस काल का हिन्दी साहित्य मिश्रित और प्रारंभिक डिंगल, ब्रज, अवधि, मैथली तथा खड़ी बोली में मिलता है। मुख्य साहित्यकार चन्द्र नरपति नाल्ह, मुल्लग दाउद, विद्यापति, गोरखनाथ आदि हैं।

आदीकालीन हिन्दी की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है:-

(१) आदीकालीन हिन्दी में मुख्यतः उन्हीं ध्वनियों का प्रयोग मिलता है जो अपभ्रंश में प्रयुक्त होती थी किन्तु अपभ्रंश में केवल 8 स्वर थे - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ, किंतु आदिकालीन हिन्दी दो नए स्वर ऐ, औ, विकसित हो गए।

(२) अपभ्रंश में ढ़, ड़, व्यंजन नहीं थे। आदिकालीन हिन्दी में इसका विकास हुआ।

(३) न्ह, म्ह, ल्ह, पहले संयुक्त व्यंजन थे अब वे क्रमशः न, म, ल, महाप्राण रुप है। अर्थात् व्यंजन न रहकर मूल व्यंजन हो गए।

मध्यकाल[सम्पादन]

(1500 ई० - 1800 ई०) इस काल में धर्म की प्रधानता के कारण राम स्थान की भाषा अवधि और कृष्ण स्थान की भाषा ब्रज में ही विशेष रूप से साहित्य रचा गया। यों तो हिन्दी दक्खिनी, डिंगल, मैथिली और खड़ी बोली तथा उसकी उर्दू शैली में भी साहित्य की रचना हुई। इस काल के प्रमुख साहित्यकार जायसी, सुर, तुलसी, मीरा, केशव, बिहारी, भुषण आदि हैं। शब्द भंडार की दृष्टि से ये दो - तीन बातें मुख्य है -- भक्ति आन्दोलन के चरम बिन्दु पर पहुंचने के कारण भाषा में और भी तत्सम बढ़ गया। यूरोप से संपर्क होने के कुछ पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी तथा अंग्रेजी शब्द भी इस काल के परवर्ती चरण में हिन्दी में आ गए।

इस काल में आकर ध्वनि के क्षेत्र में मुुख्यतः निम्न परिवर्तन देखे गए :-

(१) शब्दांत का 'अ' कम से कम मूल व्यंजन के बाद आने पर लुप्त हो गया। अर्थात् राम का उच्चारण राम् होने लगा।

(२) फ़ारसी की शिक्षा की कुछ व्यवस्था तथा नौकरी के कारण उच्च वर्ग के लोगों की हिन्दी में तुर्की, अरबी, फ़ारसी, के शब्द काफ़ी प्रचलित हो गए और उन शब्दों के माध्यम से क़, ख़, ग़, ज़, फ़, -- ये पांच नए व्यंजन हिन्दी में आएं।

आधुनिक काल[सम्पादन]

(1800 ई० से अब तक) -- आधुनिक काल राजनीति का काल है। अतः भारतीय राजनीति का केंद्र दिल्ली की भाषा खड़ी बोली, आदि को पीछे छोड़ प्रायः एकमात्र हिन्दी भाषा की प्रतिनिधि रूप बन गई है। शब्द भंडार की दृष्टि से 1800 से अब तक के आधुनिक काल को मोटे रूप से 5-6 उपकालों में विभाजित किया जा सकता है:--

(१) 1800 - 1850 तक का हिन्दी शब्द भंडार मोटे रूप में वहीं था जो मध्यकाल के अंतिम चरण में था। केवल अंग्रेजी भाषा अधिकाधिक विकसित होने लगी थी।

(२) 1850 - 1900 तक अंग्रेज़ी के और भी शब्दों के आने के अतिरिक्त आर्य समाज के प्रचार - प्रसार कारण तत्सम परिनिष्ठित हिन्दी से निकल गए।

(३) 1900 के बाद द्विवेदी काल तथा छायावादी काल में अनेक कारणों से तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ना आरम्भ हो गया। प्रसाद - पंत - महादेवी वर्मा का पूरा साहित्य इस दृष्टि से दर्शनीय है। 1947 तक लगभग यही स्थिति रही।

(४) 1947 के बाद शब्द भंडार में अनेक पुराने शब्द नए अर्थों में प्रचलित हो गए हैं। उसमें अरबी, फ़ारसी, तथा अंग्रेजी के जनप्रचलित शब्दों का प्रयोग हो रहा है। किंतु आलोचना की भाषा अब भी एक सीमा तक तत्सम शब्दों से लदी हुई है।

(५) इधर हिन्दी को पारिभाषिक शब्दों की बहुत आश्यकता पड़ी है क्योंकि अब हिन्दी विज्ञान वाणिज्य हिन्दी आदि की भाषा है।

हिन्दी शब्द भंडार अनेक प्रभावों को ग्रहण करते हुए तथा नए शब्दों से समृद्ध होते हुए दिनोदिन अधिक समृद्ध होते जा रहे है। जिसके परिणाम स्वरूप हिन्दी अपनी अभी व्यंजन में अधिक, सटीक, निश्चित, गहरी तथा समृद्ध होती जा रही है।