हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )/उत्तर-आधुनिक परिदृश्य और वर्तमान साहित्यिक रूझान

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हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )
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उत्तर-आधुनिक परिदृश्य और वर्तमान साहित्यिक रूझान[सम्पादन]

उत्तर-आधुनिकता कोई एक सिद्धांत नहीं, बल्कि अनेक सिद्धांतों का एक नाम है। इसकी कोई बंधी-बंधाई परिभाषा नहीं। उत्तर-आधुनिकता परिवर्तित होते लक्षणों को कहा गया है। ‘‘यह एक ऐसा वाद है जो एक स्थिति या दशा की तरह है जो लगातार अस्थिर है, चंचल है, विखंडशील है।’’ उत्तर आधुनिकता बहुलतावाद, विकेन्द्रीयता, स्थानीयता, अन्तर्विषयी चिंतन, अन्तर्पाठीयता, अर्थ की अनिश्चितता, युगल विपरीतता आदि को अपनाती है, वहीं सर्वसत्तावाद, कला की शुद्धता-पवित्रता, समग्रता, नैतिकता, स्वायत्तता, पूर्णतावाद एवं महाख्यानों को नकारती है।

आधुनिकता की मान्यताओं को प्रश्नांकित करते हुए हाशिए की आवाज से उत्तर-आधुनिकता की शुरुआत होती है। उत्तर-आधुनिकता बहुकेंद्रीयता की संकल्पना को लेकर चलती है और यह बहुकेंद्रीयता व्यक्ति की अपेक्षा समूहों की केंद्रीयता है। भारत में विविधतापूर्ण समाज विद्यमान है जहाँ पर किसी एक विमर्श को संबोधित करना संभव ही नहीं है। इन सबके बावजूद भी हमारा समाज अभी भी स्त्री, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्तियों और उनकी सामूहिक अस्मिता के प्रति अत्यंत अनुदार और असहिष्णु है जबकि उत्तर-आधुनिक समाज में इन समूहों की आवाज को सहज भाव से स्वीकार किया जाना अपेक्षित है। इसीलिए उत्तर-आधुनिकता पर सोचने की जरूरत है। समाज में शुरू हुए इन विमर्शों ने साहित्य, राजनीति, कला, फिल्म आदि कई चीजों को प्रभावित किया।

सुधीश पचौरी ने उत्तर-आधुनिकता विमर्श को बड़े ही सहज ढंग से झटकों के रूप में इस तरह निरूपित किया हैं-

  1. पहला झटका यह कि बचत गई है, बाजार आया है। संयम गया है। इच्छाओं कामनाओं का साम्राज्य खुला है, पूँजी बढ़ी है।
  2. दूसरा झटका यह है कि एक ही साथ स्थानीयता और भूमंडलीकरण जगे हैं। शीत-युद्ध गया है। गर्म शांति आई है। देशकाल गड़बड़ाया है। मृदु मंथर गति तेज हुई है।
  3. तीसरा झटका है मीडिया मार्केट की मित्रता। हर अनुभव सूचना बन रहा है और अर्थ की स्थिरता नहीं बच रही, महानता का वृत्तांत नहीं बन रहा, महान लेखक नहीं हो रहे।

‘मुझे चाँद चाहिए’ सुरेन्द्र वर्मा कृत उपन्यास उत्तर-आधुनिक बोध को व्यक्त करता है। इसमें सिलबिल के वर्षा वशिष्ठ बनने और वर्षा वशिष्ठ द्वारा चाँद पाने अर्थात यश पाने की कथा है। अभिनय की उँचाइयों से वह अपने चाँद को पा जाती है। इस उपन्यास में कला बनाम व्यवसाय को लेकर बहस उठती रही है।‘‘कुरु-कुरु स्वाहा’’ में मनोहर श्याम जोशी ने उत्तर आधुनिक गद्य प्रस्तुत किया है। आधुनिक युगीन अस्तित्ववाद का इसमें अन्त है।

श्री लाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ उत्तर आधुनिकतावादी विशेषताओं से युक्त है। यह उपन्यास व्यंग्यात्मक शैली में वर्णित है। कथा का केन्द्र शिवपालगंज है। लेकिन यह कथा भारत के किसी गांव की हो सकती है। इस उपन्यास में मूल्यहीनता, स्वार्थ, अवसरवादिता, अमानवीयता, नैतिक गिरावट, कुत्सित राजनीति जैसे आधुनिकतावादी लक्षणों के साथ ऐसी स्थितियाँ चित्रित हुई हैं जो उपन्यास को उत्तर आधुनिक बनाती है। लेखक पाठक को उत्तेजित नहीं करता। समस्याओं को हटाने के लिए लेखक कोई समाधान प्रस्तुत नहीं करता। यही उत्तर आधुनिक संदर्भ है कि लेखक कोई सुधारक नहीं है। राग दरबारी पुराने पाठों के बजाय अनेक नये पाठों की मांग करता है। इसकी पठन पद्धति यथार्थवादी नहीं है, इसमें अन्तर्पाठीयता है। जैसे थाने के वर्णन में लेखक कहता है- ‘‘हथियारों में कुछ प्राचीन राइफलें थी जो लगता था गदर के दिनों में इस्तेमाल हुई होंगी। वैसे सिपाहियों के साधारण प्रयोग के लिए बांस की लाठी थी, जिसके बारे में एक कवि ने बताया है कि वह नदी नाले पार करने और झपट कर कुत्ते को मारने में उपयोगी साबित होती है।’’

इन उपन्यासों के अलावा विनोद कुमार शुक्ल के ‘खिलेगा तो देखेंगे’, मैत्रेयी पुष्पा का ‘इदन्नमम’, दूधनाथ सिंह का ‘नमो अंधकार’, भीमसेन त्यागी के ‘सुरंग’, जयप्रकाष कर्दम के ‘छप्पर’, रामदरश मिश्र के ‘बीस बरस’, मिथलेश्वर के ‘यह अंत नहीं’ एवं वीरेन्द्र सक्सेना के ‘खराब मौसम के बावजूद’ आदि में भी उत्तर आधुनिक युग की आहट सुनाई देती है। ‘खिलेगा तो देखेंगे’ में एक खुला अंत या निष्कर्षहीनता प्रकट हुई हैं अन्तर्पाठीयता संभव होती है। ‘इदन्नमम’ मे कई्र केन्द्र टूटे हैं। स्त्री, जाति आदि कई नये केन्द्र बने हैं। यही स्त्री अस्मिता ‘सुरंग’ में भी वर्णित है। ‘छप्पर’ और ‘बीस बरस’ में दलित और स्त्री केन्द्र में आए हैं। ‘खराब मौसम के बावजूद’ में आधुनिकतावादी मूल्यों को नकारा गया है। इसमें विवाह संस्था पर ही प्रश्नचिह्न लगाया है।