आर्थिक भूगोल/आर्थिक क्रियाएं

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आर्थिक भूगोल
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मानव के वह कार्यक्रम जिन से आय प्राप्त होती है उसे आर्थिक क्रिया कहते हैं। आर्थिक क्रियाओं को मुख्यतः चार वर्गों[१] में विभाजित किया जाता है:-

क्लर्क सेक्टर मॉडल

प्राथमिक क्रियाएं
द्वितीयक क्रियाएं
तृतीय क्रियाएं
चतुर्थ क्रियाएं
पंचम क्रियाएं

प्राथमिक क्रियाएं[सम्पादन]

प्राथमिक क्रियाएं प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर निर्भर है क्योंकि यह पृथ्वी के संसाधनों जैसे भूमि, जल, वनस्पति, भवन निर्माण सामग्री एवं खनिजों के उपयोग के विषय में बदलाती है। इस प्रकार इसके अंतर्गत आंखेट, भोजन संग्रह, पशुचारण, मछली पकड़ना, वनों से लकड़ी काटना, कृषि एवं खनन कार्य सम्मिलित किए जाते हैं। =

द्वितीयक क्रियाएं[सम्पादन]

जिस सेक्टर में विनिर्माण प्रणाली के द्वारा उत्पादों को अन्य रूपों में बदला जाता है उसे द्वितीयक क्रियाएं कहते हैं। उदाहरण: लोहा इस्पात उद्योग, ऑटोमोबाइल, आदि।इस क्षेत्रक के अंतर्गत मुख्यतः अर्थव्यवस्था की विनिर्मित वस्तुओं के उत्पादन का लेखांकन किया जाता है – निर्माण- जहां किसी स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण किया जाए। जैसे-भवन
विनिर्माण - जहां किसी वस्तु का उत्पादन हो। जैसे- कपड़ा, ब्रेड इत्यादि।
विद्युत गैस एवं जल आपूर्ति इत्यादि से संबंधित कार्य भी द्वितीयक क्रियाएं में सम्मिलित किए जाते हैं।
1. प्रसंस्करण :- इसमें खेत से गेहूं लाकर उन्हें पिस कर उसे आटे की रोटी बनाने की प्रक्रिया को प्रसंस्करण कहते है।
2. विनिर्माण :- विनिर्माण उद्योगों का वर्गीकरण उनके आकार , कच्चे माल , उत्पाद व स्वामित्व के आधार पर किये जाते है।
3. उद्योग :- उद्योगों की स्थापना केवल उन्ही स्थानों पर हो सकती है जहाँ उनके विकास के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएं उपलब्ध है।
4. ऊर्जा उत्पादन :- शक्ति के साधन का सुचारू एवं सुगम रूप में मिलना उद्योगों के केन्द्रीयकरण एवं विकास के लिए आवश्यक है।

विनिर्माण उद्योगों का वर्गीकरण[सम्पादन]

परिवार की आय एवं जीव उत्पादन के लिए जो व्यवसाय किया जाता है उसे ही उद्योग कहते है। उद्योगों का वर्गीकरण :-

  1. आकार के आधार पर
  2. कच्चे माल के आधार पर
  3. उत्पाद के आधार पर
  4. स्वामित्व के आधार पर

आकार के आधार पर[सम्पादन]

किसी उद्योग का आकार उसमे निवेशित पूंजी , कार्यरत श्रमिको की संख्या एवं उत्पादन की मात्रा पर निर्भर करता है। आकार के आधार पर उद्योगों को तीन भागो में बांटा जा सकता है –
अ.कुटीर उद्योग
ब. छोटा उद्योग
स. बड़े पैमाने के उद्योग
कुटीर उद्योग :- यह निर्माण की सबसे छोटी इकाई है,इसमें दस्तकार स्थानीय कच्चे माल का उपयोग करते है,वह कम पूंजी तथा दक्षता से साधारण औजारों के द्वारा परिवार के साथ मिलकर घरो में ही अपने दैनिक जीवन के उपयोग की वस्तुओ का उत्पादन करते है। निजी उपभोग के बाद शेष बचे तैयार माल को स्थानीय बाजार में विक्रय कर देते है। कभी यह अपने उत्पादों की अदला बदली भी करते हैं। पूंजी एवं परिवहन इन उद्योगों को अधिक प्रभावित नहीं करते हैं, क्योंकि इनके द्वारा निर्मित वस्तुओं का व्यापारिक महत्व कम होता है एवं अधिकतर उपकरण स्थानीय लोगों द्वारा निर्मित होते हैं। इस उद्योग में दैनिक जीवन के उपयोग में आने वाली वस्तुएं जैसे खाद्य पदार्थ, कपड़ा, बर्तन, औजार, जूते, लघु मूर्तियां उत्पादित की जाती है।
छोटा उद्योग :- इन्हें छोटे पैमाने के उद्योग कहते है , इनमे स्थानीय कच्चे माल का उपयोग होता है , इसमें अर्द्ध कुटीर श्रमिको व शक्ति के साधनों से चलने वाले यंत्रो का प्रयोग किया जाता है। यह कुटीर उद्योग से भिन्न है। इसके उत्पादन की तकनीक एवं निर्माण स्थल दोनों कुटीर उद्योग से भिन्न होते हैं।रोजगार के अवसर इस उद्योग में अधिक होते हैं जिससे स्थानीय निवासियों की क्रय शक्ति बढ़ती है। भारत, चीन, इंडोनेशिया, ब्राजील जैसे देशों ने अपने जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए इस प्रकार के श्रम सघन छोटे पैमाने के उद्योग प्रारंभ किए हैं।
बड़े पैमाने के उद्योग :- बड़े पैमाने के उद्योगों के लिए विभिन्न प्रकार का कच्चा माल, शक्ति के साधन विशाल बाजार, कुशल श्रमिक, उच्च प्रोद्योगिको व अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है। पिछले 200 वर्षों में इसका विकास हुआ है। पहले यह उद्योग ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी भाग एवं यूरोप में लगाए गए थे परंतु वर्तमान में इसका विस्तार विश्व के सभी भागों में हो गया है।विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों को उनके वृहत पैमाने पर किए गए निर्माण के आधार पर दो बड़े समूहों में बांटा जा सकता है:-

  1. परंपरागत वृहत औद्योगिक प्रदेश जिनके समूह कुछ अधिक विकसित देशों में है।
  2. उच्च प्रौद्योगिकी वाले वृहत औद्योगिक प्रदेश जिनका विस्तार कम विकसित देशों में हुआ है।

कच्चे माल पर आधारित उद्योग[सम्पादन]

कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का वर्गीकरण पाँच भागों में किया जाता है।
क. कृषि आधारित
ख. खनिज आधारित
ग. रसायन आधारित
घ. वन आधारित
ड़. पशु आधारित
कृषि आधारित उद्योग :- कृषि उपजो को विभिन्न प्रक्रियाओ द्वारा तैयार माल की ग्रामीण व नगरीय बाजरो में विक्रय हेतु भेजा जाता है। वस्त्र (सूती , रेशमी , जुट) पेय पदार्थ (चाय , कहवा , कोको) , भोजन प्रसंस्करण , वनस्पति घी , रबड़ आदि उद्योग इसके उदाहरण है।
खनिज आधारित उद्योग :- इन उद्योगों में खनिजो का कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है , कुछ उद्योग लोह अंश वाले धात्विक खनिजो का उपयोग करते है , लोह-इस्पात उद्योग , मशीन व औजार , रेल इंजन , कृषि औजार इसके प्रमुख उदाहरण है , कुछ उद्योग अलोह धात्विक खनिजो का उपयोग करते है जैसे एल्युमिनियम या ताम्बा उद्योग।
रसायन आधारित उद्योग :- इस प्रकार के उद्योगों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रासायनिक खनिजो का उपयोग होता है , पेट्रो-रसायन उद्योग में खनिज तेल का उद्योग होता है , रासायनिक उर्वरक पेंट , वर्निश , प्लास्टिक , औषधि आदि पेट्रो-केमिकल उद्योग के प्रमुख उदाहरण है।
वनों पर आधारित उद्योग :- इन उद्योगों में वनों से प्राप्त उत्पादों का प्रयोग होता है , कागज व लुग्दी उद्योग , फर्नीचर उद्योग व दिलाई सलाई उद्योग लाख उद्योग इसके उदाहरण है , कागज उद्योग के लिए लकड़ी , बांस एव घास , फर्नीचर उद्योग के लिए , इमारती लकड़ी तथा लाख उद्योग के लिए लाख वनों से ही प्राप्त होती है।
पशु आधारित उद्योग :- चमड़ा व ऊन पशुओ से प्राप्त प्रमुख कच्चा माल है। चमडा उद्योग के लिए चमडा व ऊनी वस्त्र उद्योग के लिए ऊन पशुओ से ही प्राप्त होती है। हाथी दांत उद्योग के लिए दांत भी हाथीं से मिलते हैं।

उत्पादन/उत्पाद आधारित उद्योग[सम्पादन]

वे उद्योग जिनके उत्पाद को अन्य वस्तुएं बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में। प्रयोग में लाया जाता हैं उन्हें आधारभूत उद्योग कहते हैं। उपभोक्ता वस्तु उद्योग के ऐसे सामान का उत्पादन करते हैं जो प्रत्यक्ष रूप में उपभोक्ता द्वारा उपयोग कर लिया जाता हैं। जैसे- ब्रेड एवं बिस्कुट, चाय, साबुन, टेलीविजन एवं श्रृंगार सामग्री इत्यादि का उत्पादन को उपभोक्ता माल बनाने वाले अथवा गैर आधारभूत उद्योग कहते हैं।

स्वामित्व के आधार पर उद्योग[सम्पादन]

(क) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग सरकार के अधीन होते हैं। भारत में बहुत सारे उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र के अधीन हैं।स सामाजवादी देशों में भी अनेक उद्योग सरकारी स्वामित्व वाले होते हैं। मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी एवं सार्वजनिक दोनों प्रकार के उद्यम पाए जाते हैं।
(ख) निजी क्षेत्रों के उद्योगों का स्वामित्व व्यक्तिगत निवेशकों के पास होता है। ये निजी संगठनों द्वारा संचालित होते हैं। पूंजीवादी देशों में अधिकतर उद्योग निजी क्षेत्रों में हैं।
(ग) संयुक्त क्षेत्र के उद्योग का संचालन संयुक्त कंपनी के द्वारा या किसी निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कंपनी के संयुक्त प्रयासों द्वारा किया जाता है।

तृत्तीय क्रियाएं[सम्पादन]

अर्थव्यवस्था के तृतीयक क्षेत्र को 'सेवा क्षेत्र' भी कहते हैं। तृतीयक क्षेत्र का विकास २०वीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू हुआ। इसके अन्तर्गत व्यापार, यातायात, संप्रेषण, वित्त, पर्यटन, संस्कृति, मनोरंजन, लोक प्रशासन एवं लोक सेवा, सूचना, न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि आते हैं। इसमें ऐसी गतिविधियाँ शामिल हैं जहाँ लोग उत्पादकता, प्रदर्शन, क्षमता और स्थिरता में सुधार के लिए अपने ज्ञान और समय की पेशकश करते हैं। इस क्षेत्र की मूल विशेषता उत्पादों के बजाय सेवाओं का उत्पादन है। सेवाओं में ध्यान, सलाह, पहुंच, अनुभव और चर्चा शामिल हैं‌। सेवाओं में उत्पादक से उपभोक्ता तक माल का परिवहन, वितरण और बिक्री भी शामिल हो सकती है, जैसा कि विपणन के मामले में। इसमें उदाहरण के लिए, मनोरंजन या कीट नियंत्रण जैसी सेवाओं का प्रावधान भी शामिल है। ये सामान रेस्तरां उद्योग की तरह, सेवा प्रदान करने की प्रक्रिया में रूपांतरित हो सकते हैं। इस प्रकार व्यापार, परिवहन, संचार और सेवाएं कुछ तृतीयक क्रियाकलाप हैं ।

व्यापार और वाणिज्य[सम्पादन]

व्यापार वस्तुत: अन्यत्र उत्पादक मदों का क्रय और विक्रय है। फुटकर और थोक व्यापार अथवा वाणिज्य की सभी सेवाओं का विशिष्ट उद्देश्य लाभ कमाना है। यह सारा काम कस्बों और नगरों में होता है जिसे व्यापारिक केंद्र कहा जाता है। स्थानीय स्तर पर वस्तु विनिमय से लेकर अंतरराष्ट्रीय सोपान पर मुद्रा विनिमय तक व्यापार के उत्थान ने अनेक केंद्रों और संस्थाओं को जन्म दिया है जैसे कि व्यापारिक केंद्र अथवा संग्रहण और वितरण बिंदु। व्यापारिक केंद्रों को ग्रामीण नगरीय विपणन केंद्रों में विभक्त किया जा सकता है।

थोक व्यापार[सम्पादन]

इसका गठन अनेक बिचौलियों सौदागरों और पूर्तिघरों द्वारा होता है ना की फुटकर भंडारों द्वारा। श्रृंखला भंडारो सहित कुछ बड़े भंडार विनिर्माताओं से सीधी खरीद करते हैं। फिर भी बहुसंख्यक फुटकर भंडार बिचौलिए स्रोत से पूर्ति लेते हैं।

फुटकर व्यापार[सम्पादन]

यहां वे व्यापारी क्रियाकलाप हैं जो उपभोक्ताओं को वस्तुओं के प्रत्यक्ष विक्रय से संबंधित है। अधिकांश फुटकर व्यापार केवल विक्रय से नियत प्रतिष्ठानों और भंडारों में संपन्न होता है। फेरी, रेहडी़, ट्रक,डाक आदेश, द्वार से द्वार, दूरभाष, स्वचालित बिक्री मशीनें तथा इंटरनेट फुटकर बिक्री के भंडार रहित उदाहरण है।

परिवहन[सम्पादन]

परिवहन एक ऐसी सेवा अथवा सुविधा है जिससे व्यक्तियों, विनिर्मित माल तथा संपत्ति को भौतिक रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। यह मनुष्य की गतिशीलता की मूलभूत आवश्यकता को पूरा करने हेतु निर्मित एक संगठित उद्योग है। आधुनिक समाज वस्तुओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग में सहायता देने के लिए तीव्र और सक्षम परिवहन व्यवस्था चाहते हैं।

Mountains tourism trail transport.jpg

परिवहन को प्रभावित करने वाले कारक[सम्पादन]

परिवहन की मांग जनसंख्या के आकार से प्रभावित होती है। जनसंख्या का आकार कितना बड़ा होगा परिवहन की मांग उतनी ही अधिक होगी। नगरो, कस्बा, गांवों, औद्योगिक केंद्रों और कच्चे माल, उनके मध्य व्यापार के प्रारूप, उनके मध्य भू दृश्य की प्रकृति, जलवायु के प्रकार और मार्ग की लंबाई पर आने वाले व्यवधानों को दूर करने के लिए उपलब्ध निधियों पर मार्ग निर्भर करते हैं।

संचार[सम्पादन]

संचार सेवाओं में शब्दों और संदेशों, तथ्यों और विचारों का प्रेशन सम्मिलित है। लेखन के आविष्कार ने संदेशों को संरक्षित किया और संचार को परिवहन के साधनों पर निर्भर करने में सहायता की। यह वास्तव में हाथ, पशुओं, नाव, सड़क, रेल तथा वायु द्वारा प्रवाहित होते थे। यही कारण है कि परिवहन के सभी रूपों को संचार पथ कहा जाता है। जहां परिवहन जाल तंत्र सक्षम होता है वहां संचार का फैलाव सरल होता है।

दूरसंचार[सम्पादन]

दूरसंचार का प्रयोग विद्युतीय प्रौद्योगिकी के विकास से जुड़ा हुआ है। संदेशों के भेजे जाने की गति के कारण इसने संचार में क्रांति ला दी है।

टेलीविजन 1955

रेडियो और दूरदर्शन भी समाचारों, चित्रों व दूरभाष कालो का पूरे विश्व में विस्तृत श्रोताओं को प्रसारण करते हैं और इसीलिए इन्हें जनसंचार माध्यम कहा जाता है। वे विज्ञापन एवं मनोरंजन के लिए महत्वपूर्ण है। उपग्रह संचार पृथ्वी और अंतरिक्ष से सूचना का प्रसारण करता है। इंटरनेट ने वैश्विक संचार तंत्र में वास्तव में क्रांति ला दी है।

सेवाएं[सम्पादन]

सेवाएं विभिन्न स्तरों पर पाई जाती है। कुछ सेवाएं उद्योगों को चलाती है कुछ लोगों को और कुछ उद्योगों और लोगों दोनों को जैसे परिवहन तंत्र। निम्न स्तरीय सेवाएं जैसे पंसारी की दुकान, उच्च स्तरीय सेवाओं अथवा लेखाकार, परामर्शदाता और कई चिकित्सक जैसी अधिक विशिष्टकृत सेवाओं की अपेक्षा अधिक सामान्य और विस्तृत है। सेवाएं भुगतान कर सकने वाले व्यक्तिगत उपभोक्ताओं को उपलब्ध होती है। माली, धोबी और नाई मुख्य रूप से शारीरिक श्रम करते हैं। अध्यापक, वकील, चिकित्सक, संगीतकार और अन्य मानसिक श्रम करते हैं।

तृतीय क्रियाकलापों में संलग्न लोग[सम्पादन]

अधिकांश लोग सेवा कर्मी हैं। सेवाएं सभी समाजों में उपलब्ध होती है। अधिक विकसित देशों में कर्मियों का अधिकतर प्रतिशत इन सेवाओं में लगा है जबकि अल्पविकसित देशों में 10% से भी कम लोग इस सेवा क्षेत्र में लगे हैं। कुछ चयनित उदाहरण जैसे:-

पर्यटन[सम्पादन]

पर्यटन एक यात्रा है जो व्यापार की बजाए मनोरंजन के उद्देश्यों के लिए की जाती है। कुल पंजीकृत रोजगारो तथा कुल राजस्व की दृष्टि से यह विश्व का अकेला सबसे बड़ा तृतीयक क्रियाकलाप बन गया है। इसके अतिरिक्त पर्यटकों के आवास, भोजन, परिवहन, मनोरंजन तथा विशेष दुकानों जैसी सेवा उपलब्ध कराने के लिए अनेक स्थानीय व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है।

पर्यटन मनमोहक दृश्य

कुछ प्रदेशों में पर्यटन श्रृतुनिष्ठ होता हैं क्योंकि अवकाश की अवधि अनुकूल मौसमी दशाओं पर निर्भर करती है किंतु कई प्रदेश वर्षपर्यंत पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

पर्यटन को प्रभावित करने वाले कारक
(क) मांग-विगत शताब्दी से अवकाश के लिए मांग तीव्रता से बड़ी है। जीवन स्तर में सुधार तथा बड़े हुए फुर्सत के समय के कारण अधिक लोग विश्राम के लिए अवकाश पर जाते हैं।
(ख) परिवहन- परिवहन सुविधाओं में सुधार के साथ पर्यटन क्षेत्रों का आरंभ हुआ है। बेहतर सड़क प्रणालियों में कार द्वारा यात्रा सुगम होती है। हाल के वर्षों में वायु परिवहन का विस्तार अधिक महत्वपूर्ण रहा है।

चतुर्थ क्रियाएं[सम्पादन]

इसमें सभी लोग सेवा सेक्टर के उस प्रभाव में कार्य करते हैं जो ज्ञानोन्मुखी है। चतुर्थ क्रियाकलापों में कुछ निम्नलिखित कार्य है:- सूचना का संग्रहण, उत्पादन और प्रकीर्णन अथवा सूचना का उत्पादन। चतुर्थ क्रियाकलाप अनुसंधान और विकास पर केंद्रित होते हैं और विशिष्टक्रित ज्ञान प्रौद्योगिक कुशलता और प्रशासकीय सामर्थ्य से संबंधित सेवाओं के उन्नत नमूने के रूप में देखे जाते हैं।

पंचम क्रियाकलाप[सम्पादन]

उच्चतम स्तर के निर्णय लेने तथा नीतियों का निर्माण करने वाले पंचम क्रियाकलापों को निभाते हैं। इनमें और ज्ञान आधारित उद्योग जो सामान्यतः चतुर्थ सेक्टर से जुड़ी होती है, चतुर्थ क्रियाकलाप और पंचम क्रियाकलाप में सूक्ष्म अंतर होता है। यह वे सेवाएं हैं जो नवीन एवं वर्तमान विचारों की रचना उनके पुनर्गठन और व्याख्या, आंकड़ों की व्याख्या और प्रयोग तथा नई प्रौद्योगिकी के मूल्यांकन पर केंद्रित होती है। इस कार्यकलाप में संलग्न लोगों को स्वर्ण काॅलर कहते हैं। इस कार्यकलाप के लोग जो वरिष्ठ व्यवसाई कार्यकारियों, सरकारी अधिकारियों, अनुसंधान वैज्ञानिको, वित्त एवं विधि परामर्शदाता इत्यादि की विशेष और उच्च वेतन वाले कुशलताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

संबंधित प्रश्न[सम्पादन]

इस अध्याय से संबंधित प्रश्न कुछ इस प्रकार हैं:-

  1. आर्थिक गतिविधियों के प्रकारों की व्याख्या करें।
  2. आर्थिक गतिविधियों को परिभाषित करें।
  3. गतिविधियों के किस वर्ग को सफेद रंग का कार्यकर्ता कहा जाता है।
  4. प्राथमिक और द्वितीयक आर्थिक गतिविधियों को परिभाषित करें?

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. Kjeldsen-Kragh, Søren (2007). The Role of Agriculture in Economic Development: The Lessons of History. Copenhagen Business School Press DK. पृ. 73. आइएसबीएन 978-87-630-0194-6.