आर्थिक भूगोल/उद्योग अवस्थिति सिद्धांत

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आर्थिक भूगोल
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उद्योगों का वर्गीकरण[सम्पादन]

किसी भी व्यवस्थित तथा क्रमबद्ध कार्य को उद्योग कहा जाता है। इसके अंतर्गत प्राथमिक आर्थिक क्रियाएं जैसे कृषि मत्स्य आदि से लेकर आधुनिक वस्त्र निर्माण उद्योग एवं व्यापार कार्य भी सम्मिलित किए जाते हैं। उद्योगों के विविध पक्षों के आधार पर इन्हें 4 वर्गों में बांटा जा सकता है।

  1. निष्कर्षण उद्योग
  2. पुनरुत्पाद उद्योग
  3. वास्तु निर्माण उद्योग
  4. सहायक उद्योग

पैमाने के आधार पर उद्योगों को 3 वर्गों में बांटा गया है।

  1. कुटीर उद्योग
  2. लघु उद्योग
  3. वृहत उद्योग

कच्चे माल की प्रकृति तथा स्थानीयकरण के आधार पर उद्योगों को निम्न वर्गों में विभाजित करते हैं।

  1. आभार हृासी उद्योग:- ऐसे माल जिनमें कच्चा माल शुद्ध होने अर्थात निर्माण प्रक्रिया में भाग हृास ना होने के कारण तैयार माल का भार कच्चे माल के बराबर ही होता है। ऐसे उद्योग कच्चे माल के क्षेत्र से बाहर के मध्य कहीं भी स्थापित हो सकते हैं जैसे-सूती वस्त्र उद्योग‌।
  2. भार हृासी उद्योग:- ऐसे माल जिनमें निर्माण प्रक्रिया में भार हृास होने के कारण तैयार माल का भार कच्चे माल से कम होता है। उनका स्थायीकरण कच्चे माल के क्षेत्रों के समीप होता है जैसे-कागज, चीनी, उद्योगों, लोहा-इस्पात उद्योग।
  3. फूट लूज उद्योग:- ऐसे उद्योग जो मांग के आधार पर कहीं भी स्थापित हो सकते हैं जैसे- हौजरी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग।

वेबर का उद्योग अवस्थिति सिद्धांत[सम्पादन]

alfred Weber

अवस्थिति सिद्धांतों का मूल उद्देश्य उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूलतम स्थान की खोज है।[१] अनुकूलतम स्थान वह है जो अधिकतम मुनाफा दे। यह दो स्थितियों में हो सकता है-जब उत्पादन लागत कम हो या जब राजस्व उच्च हो। वेबर ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन 1929 में अपनी पुस्तक थ्योरी ऑफ लोकेशन ऑफ द इंडस्ट्रीज में प्रतिपादित किया था। यह सिद्धांत एक निश्चयवादी सिद्धांत है। वेबर एक जर्मन अर्थशास्त्री थें।[२] इन्होंने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन औद्योगिक स्थानीयकरण के विभिन्न कारकों का पूर्ण अन्वेषण करके उनके आधार पर किया। उनके द्वारा लिया ज्ञात किया गया कि लागत में कुछ मूल तत्व अलग-अलग स्थानों पर सामान नहीं होते हैं जैसे श्रमिकों की मजदूरी, यातायात की लागत, आदि। दूसरी ओर लागत के कुछ ऐसे तत्व होते हैं, जो सभी स्थानों पर लगभग समान होते हैं जैसे पूंजी पर ब्याज तथा मशीनों का ह्रास। प्रथम वर्ग के लागत तत्वों का ही उद्योग के स्थानीयकरण पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार लागत विश्लेषण के आधार पर उन्होंने स्थानीयकरण के कारकों को दो वर्गों में विभक्त किया है।

  1. प्रादेशिक कारक
  2. स्थानीय कारक

वेबर के उद्योग स्थानीयकरण सिद्धांत को समझाने के लिए कुछ मुख्य शब्द का प्रयोग किए गए हैं जो महत्वपूर्ण है-

क्षेत्रीय लागत कारक- इन कारकों में दो मुख्य यातायात लागतो का उल्लेख किया गया है।

यातायात लागत- कारखानों तक कच्चे माल एवं अन्य आवश्यक सामान को लाने तथा निर्मित माल को बाजार तक पहुंचाने में यातायात लागत उत्पन्न होती है इस लागत के दो तत्व हैं-

1. यातायात किया जाने वाला भार- समस्त कच्चे माल एवं पदार्थ जो कारखाने तक लाए जाते हैं सामान भार अथवा वजन के नहीं होते हैं। वेबर ने इन्हें दो वर्गों में विभक्त किया है-

  • साधारण अथवा सर्वत्र प्राप्त माल-इन पदार्थों की सभी स्थानों पर प्रचुरता होती है। प्राय: ये सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।
  • स्थानीयकृत पदार्थ- यह पदार्थ कुछ विशिष्ट स्थानों पर उपलब्ध होते हैं। अतः स्थानीयकरण में इनका निश्चित एवं निर्धारित प्रभाव पड़ता है इन्हें भी दो भागों में विभाजित किया गया है-

(क) शुद्ध पदार्थ , (ख) समग्र पदार्थ

2. यातायात की दूरी- यदि कच्चे माल की प्राप्ति के क्षेत्र तथा बाजार या विक्रय केंद्र एक सीधी रेखा के दो सिरों‌ पर स्थित है तो शुद्ध पदार्थों की दशा में परिवहन की दूरी का अधिक महत्व नहीं होगा, क्योंकि ऐसे पदार्थों की प्रवृत्ति भरना खोने वाली होती है किंतु यदि मिश्रित पदार्थों का प्रश्न है तो परिवहन दूरी का निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा क्योंकि ऐसे पदार्थों की प्रकृति भार होने वाली होती है। ऐसी दशा में औद्योगिक इकाईयों की स्थापना कच्चे माल की प्राप्ति के केंद्रों के निकट ही की जाएगी ताकि परिवहन की लागत को न्यूनतम किया जा सके।

सिद्धांत की मान्यताएं[सम्पादन]

  1. एकरूप क्षेत्र[३]
  2. परिवहन व्यय, भार एवं दूरी का प्रतिफल
  3. कच्चे माल की स्थिति के स्रोत का स्थान निश्चित है। इनकी स्थिति के बारे में पूर्ण जानकारी।
  4. एक केंद्रीय बिंदु बाजार है जहां पर फार्म द्वारा उत्पादित माल विक्रय होते हैं।
  5. श्रम भौगोलिक रूप से नियमित स्थानों पर विद्यमान है।
  6. प्रत्येक उत्पादन को असीमित बाजार की सुविधा उपलब्ध है।
  7. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति विद्यमान है।
  8. मनुष्य विवेकी प्राणी हैं।
  9. परिवहन जाल सभी संदर्भों में समान है।

वेबर ने इन पूर्व अनुमानों के आधार पर विभिन्न उद्योगों की स्थापना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त अवस्थिति के बारे में बताया जिसके तीन प्रक्रियाएं हैं-

(क) न्यूनतम परिवहन लागत अवस्थिति।

(ख) श्रम लागत के कारण न्यूनतम परिवहन लागत स्थिति से विचलन।

(ग) समूहन के कारण न्यूनतम परिवहन लागत स्थिति से विचलन।


उद्योगों की प्रकृति एवं उनमें होने वाले उत्पादन के अनुसार उनकी आवश्यकता अलग-अलग प्रकार की होती है उद्योग में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल की संख्या एक या एक से अधिक हो सकती है। जिसका प्रभाव उद्योगों की अवस्थित पर पड़ता है। अतः विभिन्न स्थितियों में उद्योग अवस्थिति पर विचार किया गया है :[४]

एक बाजार व एक कच्चा माल प्राप्ति स्थान

  1. यदि कच्ची सामग्री सर्वत्र सुलभ है तो उद्योग बाजार में स्थापित होगा जैसे-बर्फ का कारखाना।
  2. यदि कच्ची सामग्री शुद्ध तथा स्थानीय है तो कच्ची सामग्री के स्रोत या बाजार बिंदु अथवा इन दोनों के बीच किसी बिंदु पर भी स्थापना हो सकती है जैसे-वस्त्र उद्योग।
  3. फरियादी शुद्ध पदार्थ एवं सर्वत्र सुलभ पदार्थ दोनों का उपयोग होता है तो उद्योग बाजार बिंदु पर होगा।
  4. यदि मिश्रित पदार्थ का उपयोग होता है तो उद्योग की स्थापना कच्ची सामग्री के स्रोत पर होगी। जैसे-चीनी के मील, लुगदी उद्योग।

दो कच्ची सामग्री स्रोत तथा एक बाजार बिंदु

वेबर ने दूसरी कल्पना उस दशा से की है जिसमें दो कच्ची सामग्री की आवश्यकता पड़ती है और वह दो स्रोतों से प्राप्त होती है, किंतु इस स्थिति के लिए बाजार बिंदु एक ही है।

  1. ऐसी स्थिति में कारखाने की स्थापना अधिकतम मिश्रित भार वाले कच्ची सामग्री के स्रोत पर होगी।
  2. यदि कच्ची सामग्री सर्वत्र सुलभ है तो कारखाना बाजार बिंदु पर स्थापित होगा।
  3. यदि कच्ची सामग्री सर्वत्र सुलभ है तो भी उद्योग की स्थापना बाजार बिंदु पर ही होगी।

दो से अधिक कच्चे माल प्राप्ति स्थान एवं एक बाजार

Webber theory

इस प्रकार की स्थिति में उद्योग की स्थापना इन सबके बीच में कहीं होगी।इस बहुभुज में यह दिखाया गया है कि जिस ओर भार अधिक होगा खिंचाव भी उसी ओर अधिक होगा। परिणाम स्वरूप उद्योग के स्थापना भी उसी ओर होगी अर्थात मिश्रित पदार्थ के प्राप्ति स्थान के निकट ही उद्योग स्थापित होगा।

वेबर के अनुसार कच्चे माल के प्रकार[सम्पादन]

  1. सार्वत्रिक पदार्थ- जो सभी जगह उपलब्ध हो जैसे-जल,मिट्टी,हवा।
  2. स्थान आबद्ध पदार्थ- जो किसी विशेष स्थानों पर ही पाए जाते हैं जैसे-खनिज।
  3. शुद्ध पदार्थ- जिनसे वस्तुएं बनाने पर उसके वजन में कमी नहीं होगी।
  4. सकल पदार्थ- जिनके भार एवं आयतन में निर्माण के क्रम में कमी होती है।

पदार्थ सूचकांक[सम्पादन]

स्थानीय कृत पदार्थों के भजन तथा निर्मित माल के भजन का अनुपात है। पदार्थ सूचकांक उत्पादित वस्तुओं व कच्ची सामग्री के भजन के अनुपात का घोतक है। वेबर ने पदार्थ सूचकांक की गणना करके यह प्रमाणित किया कि पदार्थ सूचकांक जितना कम होगा उस उद्योग विशेष के स्थानीयकरण की प्रवृत्ति ही उतनी ही अधिक बाजार केंद्रों की ओर आकर्षित होने की होगी।पदार्थ सूचकांक की गणना निम्नलिखित सूत्र के आधार पर की जा सकती है- पदार्थ सूचकांक=कच्चे माल का भार /निर्मित माल का भार

यदि MI>1 है तो उद्योग की स्थापना कच्चे माल के स्थान की ओर होगी। यदि MI<1 है तो उद्योग की बाजार की ओर आकर्षित होगा।

न्यूनतम परिवहन लागत बिंदु से विचलन[सम्पादन]

श्रम की भूमिका यदि श्रम की कीमत प्रति इकाई उत्पादन अनुकूलतम परिवहन बिंदु से कम है तो यहां पर उद्योगों का पुनः स्थानीयकरण हो जाएगा। वेबर के अनुसार जब किसी स्थान पर उद्योगों के स्थानीयकरण में यातायात व्यय की तुलना में श्रम व्यय अधिक होता है तो इस दशा में उद्योगों के स्थानीयकरण में परिवहन व्यय का महत्व समाप्त हो जाता है तथा श्रम व्यय ही स्थानीयकरण का निर्धारक हो जाता है।

स्थानीयकरण का श्रम आधार[सम्पादन]

श्रम का स्थानीयकरण निम्नलिखित दो तत्वों से प्रभावित होता है

श्रम लागत निर्देशांक- श्रम लागत तथा निर्मित माल के कुल भार के अनुपात को श्रम लागत निर्देशांक कहते हैं।

स्थानीयकरण भार- उत्पादन की संपूर्ण विधि में परिवहन पर किए जाने वाले कुल भार को स्थानीयकरण भार कहा जाता है। श्रम लागत का स्थानीयकरण भार से अनुपात श्रम गुणांक कहा जाता है। श्रम गुणांक के अनुपात के कारण ही उद्योग परिवहन लागत बिंदु से श्रम स्थानीयकरण की ओर विचलित होते हैं। उद्योग की अवस्थिति न्यूनतम परिवहन लागत बिंदु से हटकर कहां होगी इसके लिए वेबर ने आइसोडेपेन्स (Isodapens)का विचार प्रस्तुत किया।

आइसोडेपेन्स- वह रेखा जो सामान परिवहन व्यय वाले बिंदुपथ को मिलती है।

समूहन की भूमिका[सम्पादन]

वेबर के अनुसार समूहन के प्रवृति किसी उद्योग को न्यूनतम परिवहन लागत बिंदु से दो प्रकार से विचलित करती हैं।

(क) पैमाने का अर्थशास्त्र जिसमें बड़ा उत्पादन होने या एक ही स्थान पर अनेक कारखाने स्थापित होने से उत्पादन व्यय कम हो जाता है।

(ख) अनेक उद्योगों को स्थान पर एकत्रित होने से कई विशेषीकृत सेवाएं श्रम का अधिक विभाजन,वृहत बाजार आदि से उत्पादन व्यय कम हो जाता है।

स्थानीयकरण के कारक[सम्पादन]

एकत्रीकरण की प्रवृत्ति- किसी उद्योग के किसी स्थान या क्षेत्र विशेष में केंद्रीकृत हो जाने से उस क्षेत्र को उत्पादन के कुछ लाभ प्राप्त हो जाते हैं, जिससे उत्पादन लागत कम होती है। जिन उद्योगों का उत्पादन लागत में निर्माण व्यय का अनुपात अधिक होता है, उनमें केंद्रीकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है। यह दो कारकों पर निर्भर करती है।

  • उत्पादन निर्देशांक
  • स्थानीयकरण भार

उत्पादन निर्देशांक एवं स्थानीयकरण भार इन दोनों के सापेक्षिक संबंध के आधार पर वेबर ने निर्माण गुणांक ज्ञात किया। स्थानीयकरण भार में निर्माण लागत के अनुपात को निर्माण गुणक कहते हैं। निर्माण गुणक अधिक होने पर औद्योगिक केंद्रीयकरण अधिक होता है। वेबर ने जिस प्रकार कारखाने की स्थापना में श्रम का प्रभाव दर्शाया है उसी प्रकार एकत्रीकरण के प्रभाव को भी स्वीकार किया है, उनके अनुसार केंद्रीकरण तीन प्रकार के होते हैं-

  1. कारखाने के विस्तार से जिनके कारण बड़े पैमाने पर उत्पादन लाभ उपलब्ध हो।
  2. एक ही उद्योग के कई कारखाने एक स्थान पर स्थापित होने से जिसके कारण सामान्य तकनीक एवं उत्पादित वस्तुओं के विक्रय संबंधी सुविधाएं प्राप्त होती है।
  3. विभिन्न प्रकार के उद्योग एक स्थान पर स्थापित होने के कारण उद्योगों के लिए सामान्य सुविधाएं जैसे परिवहन के साधन उपलब्ध होते हैं।

विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति- जब विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति बहुत अधिक प्रबल हो जाती है तो स्थान विशेष पर केंद्रीकरण के कारण प्राप्त होने वाले लाभों मैं कमी होती चली जाती है, क्योंकि अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण अनेक प्रकार के स्थानीय करों में वृद्धि हो जाती है। भूमि मूल्य में वृद्धि हो जाती है, श्रम महंगा हो जाता है अतः नई इकाइयों की स्थापना केंद्रीकृत क्षेत्र से हटकर अन्य क्षेत्रों में होने लगती है। उद्योग स्थापना के उपर्युक्त विवेचन के बाद वेबर ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले हैं-

  1. किसी भी उद्योग के स्थानीयकरण में परिवहन खर्च के सामान्य स्तर का प्रभाव नहीं बल्कि विभिन्न स्थानों के सापेक्षिक परिवहन खर्च का ही प्रभाव पड़ता है।
  2. उद्योग उस कच्ची सामग्री की ओर आकर्षित होता है दो मिश्रित पदार्थ युक्त हैं। उद्योग की स्थापना में विभिन्न प्रकार के कच्चे माल के संदर्भ में उनकी विशेषता द्वारा ही स्थानीयकरण संभव है।
  3. किसी स्थानीय त्रिभुज के अंतर्गत उद्योग के स्थापना कच्ची सामग्री के सापेक्षिक भार पर निर्भर है, कारखाना उस कच्ची सामग्री के स्रोत के निकट स्थापित होगा,जिसका सापेक्षिक भार अधिक है।
  4. उद्योग की स्थापना उन लागत बिंदुओं से हटकर भी हो सकती है जहां कि श्रम लागत या केंद्रीकरण के कारण लाभ प्राप्त हो रहा हो या अन्य सुविधाएं प्राप्त हो रही हो।

आलोचना[सम्पादन]

  1. इस सिद्धांत ने उद्यमिता तथा प्रबंध के महत्व को नकारा है। स्थानीयकरण के अन्य कारणों जैसे-जलवायु की अनुकूलता, पूंजी एवं शक्ति के साधनों की उपलब्धि, आदि की अवहेलना की गई है।
  2. वेबर का विश्लेषण पूर्ण प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत हुआ है। अतः वे न्यूनतम लागत बिंदु को ही अधिकतम लाह बिंदु समझते हैं। जो उचित नहीं है, क्योंकि कई बार न्यूनतम लागत के बाद भी कई अन्य खर्च बढ़ जाते हैं।
  3. कच्चे माल एवं तैयार माल पर परिवहन लागत समान नहीं होती। वेबर ने परिवहन लागत पर ध्यान दिया है। लेकिन उत्पादन प्रक्रिया की लागत पर नहीं।
  4. परिवहन लागत की अपूर्ण विवेचना की है। यातायात के साधन, धरातल की संरचना, आदि को सम्मिलित नहीं किया गया है।परिवहन व्यय में सदैव दूरी के अनुपात में वृद्धि होती है। जबकि वास्तव में दूरी के अनुपात में परिवहन भाड़ा घटता है।
  5. वेबर द्वारा संभावित मांग व पूर्ति के स्थानिक परिवर्तनों के प्रभावों को कोई महत्व नहीं दिया गया है।
  6. वर्तमान उद्योगों की स्थापना में राजनैतिक,सामाजिक एवं भौगोलिक कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  7. परिवहन प्रणाली एवं तकनीकी में व्यापक सुधार के कारण परिवहन का मुख्य कारक के रूप में महत्व कम हुआ है गत दशकों में अनेक उद्योगों में बाजारोन्मुख प्रवृत्ति है।
  8. श्रम लागतो के संबंध में भी दोषपूर्ण मान्यताएं प्रतिपादित की है। कुछ संसाधनों के साथ वेबर के सिद्धांत को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।प्रथम यातायात लागतो में भार तथा दूध के स्थान पर परिवहन के विभिन्न साधनों की भाड़ा दर तालिका का प्रयोग अधिक उत्तम रहेगा। यह मानकर चलना होगा कि श्रम प्रवासी प्रवृत्ति का होता है। आता अस्थाई श्रम केंद्र नहीं हो सकते और ना ही सस्ते श्रम की असीमित पूर्ति किसी क्षेत्र में हो सकती है। उपभोग केंद्रों को विस्तृत अर्थों में मानना होगा।
  9. वेबर ने न्यूनतम लागत को ही सर्वाधिक लाभ का बिंदु बताया है परंतु वे यह भूल गए कि उपभोग केंद्र स्थित नहीं होते हैं।
  10. वेबर का संपूर्ण विश्लेषण कच्ची सामग्री स्रोत एवं बाजार केंद्र को मिश्रित बिंदु मानकर हुआ है जबकि कृषिगत्त एवं वन्य उत्पादन संबंधित कच्ची सामग्री तथा उत्पादित वस्तुओं का क्षेत्रीय विस्तार होता है।

उपरोक्त विश्लेषण के पश्चात हम कह सकते हैं कि वेबर का सिद्धांत उद्योग के स्थानीयकरण के क्रमबद्ध विश्लेषण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।

संबंधित प्रश्न[सम्पादन]

इस अध्याय से संबंधित प्रश्न कुछ इस प्रकार हैं:-

  1. वेबर अपने सिद्धांत के बारे में क्या धारणाए है?
  2. वेबर का न्यूनतम लागत सिद्धांत क्या था?
  3. वेबर के औद्योगिक स्थानीय सिद्धांत पर चर्चा करें?
  4. वेबर सिद्धांत की आलोचना करें।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. Weber, Alfred. 1929. (translated by Carl J. Friedrich from Weber's 1909 book). Theory of the Location of Industries. Chicago: The University of Chicago Press. For more details see David Fearon's Alfred Weber: Theory of the Location of Industries, 1909
  2. H. M. Saxena (2013). Economic Geography. Rawat Publications. आइएसबीएन 978-81-316-0556-1.
  3. Richards, H. A. (1962). Transportation Costs and Plant Location: A Review of Principal Theories. Transportation Journal, 2(2), 19–24.
  4. https://www.hindilibraryindia.com/essay/industries-essay/%E0%A4%94%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B5-importance-of/13822