पर्यावरणीय भूगोल/पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम

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पर्यावरणीय भूगोल
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पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण, संरक्षण एवं सतत विकास को बढ़ावा देने के लिये पर्यावरण की प्रगति आदि के नियंत्रण के लिए सरकार की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।

पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न विधियाँ

विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने के लिये संयुक्त राष्ट्र द्वारा राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर, राष्ट्रीय सरकारें द्वारा कई पर्यावरण संबंधी संस्थाएँ एवं संगठन स्थापित किए गए हैं। पर्यावरणीय संगठन एक ऐसा संगठन होता है जो पर्यावरण को किसी प्रकार के दुरुपयोग तथा अवक्रमण के खिलाफ सुरक्षित करता है साथ ही ये संगठन पर्यावरण की देखभाल तथा विश्लेषण भी करते हैं।

ये संगठन सरकारी हों या सरकार के बाहर के राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के संरक्षण तथा विकास के लिये कार्य करते हैं।

अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरणीय एजेंसियाँ[सम्पादन]

यूनाइटेड नेशन्स पर्यावरण प्रोग्राम (UNEP), वर्ल्ड स्वास्थ्य संगठन (WHO) खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO)आदि कुछ मुख्य महत्वपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियाँ हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)[सम्पादन]

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का गठन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संयुक्त राष्ट्र की स्टॉकहोम (स्वीडन में), उसी वर्ष मानव पर्यावरण पर हुई सम्मेलन के परिणामस्वरूप हुआ।

Ankeny National Wildlife Refuge.jpg

1992 में रियो-डी जेनेरियो में पर्यावरण एवं विकास पर हुई संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन तथा 2002 में जोहान्सबर्ग में सतत (दीर्घोपयोगी) विकास पर हुआ, विश्व शीर्ष सम्मेलन (इसे RIO + 10 भी कहा जाता है) भी इसकी संरचना को बदल नहीं पाए। इसका मुख्यालय नैरोबी (केन्या) में है। UNEP का मुख्य मत वैश्विक पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण नीति के विकास का संचालन करना तथा अन्तरराष्ट्रीय समुदाय एवं सरकारों का ध्यान ज्वलंत मुद्दों की तरफ आकर्षित करना जिससे उन पर कार्य हो सके। इसकी गतिविधियाँ बहुत से मुद्दों को समेटती हैं, जिसमें वायुमंडल, समुद्री एवं स्थलीय या पारितंत्र शामिल हैं। [१]

UNEP ने अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरणीय परंपराओं को विकसित करने में एक अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा UNEP ने पर्यावरणीय गैर सरकारी संगठनों (NGO) के साथ कार्य करने में, राष्ट्रीय सरकार तथा क्षेत्रीय संस्थानों के साथ नीतियों को विकसित करने तथा उन्हें क्रियान्वित करने में एवं पर्यावरणीय विज्ञान तथा सूचना को बढ़ावा देने के साथ उन्हें यह भी बताया कि वे नीतियों के अनुसार किस प्रकार कार्य करेंगे, आदि कार्यों में भी अहम भूमिका निभाई है। UNEP पर्यावरण के विकास के लिये, उचित पर्यावरणीय प्रयासों द्वारा, पर्यावरण से संबंधित योजनाओं के विकास एवं क्रियान्वयन तथा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने में भी सक्रिय रहा है।

UNEP के कार्य[सम्पादन]

  1. जल्द चेतावनी एवं उनका आकलन
  2. पर्यावरणीय नीति क्रियान्वयन
  3. तकनीक, उद्योग एवं अर्थशास्त्र
  4. क्षेत्रीय सहयोग
  5. पर्यावरणीय कानून एवं सम्मेलन
  6. वैश्विक पर्यावरण सुविधा सहयोग
  7. संचार एवं जन सूचना

UNEP के कई विशेष कार्यों में से ‘‘विश्व को स्वच्छ रखो’’ अभियान के द्वारा विश्व में इस बात की जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जाता है कि हमारी आधुनिक जीवनशैली के क्या दुष्प्रभाव हैं।

अन्तरराष्ट्रीय मार्गों का प्रदूषण, सीमा पार का वायु प्रदूषण तथा हानिकारक रसायनों का अन्तरराष्ट्रीय व्यापार जैसे मुद्दों पर दिशा-निर्देश तथा संधियों के विकास में UNEP की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

दीर्घोपयोगी विकास आयोग[सम्पादन]

इसकी स्थापना दिसंबर, 1992 में जनरल एसेंबली रिजॉल्यूशन A/RES/47/191 द्वारा की गई थी। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने आर्थिक एवं सामाजिक बैठक के कार्यकारी आयोग (ECOSOC) के रूप में स्थापित किया गया था। यह जून, 1992 में रियो डी जेनेरियो में हुए पृथ्वी सम्मेलन अथवा पर्यावरण तथा विकास पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सम्मेलन में एक ऐतिहासिक वैश्विक समझौता किया था जो एजेंडा 21 के चैप्टर 38 में दी एक संस्तुति को क्रियान्वित करता था।[२] सतत विकास के लिये बना डिवीजन (Division for sustainable development, DSD) नेतृत्व प्रदान करता है एवं यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास पर बने प्रणाली के भीतर कुशलता का एक अधिकृत स्रोत है। यह दीर्घोपयोगी विकास के संयुक्त राष्ट्र आयोग (CSD) के लिये वास्तविक सचिवालय के तौर पर सतत् विकास का प्रचार करता है एवं अन्तरराष्ट्रीय,क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी सहयोग तथा क्षमता निर्माण प्रदान करता है।

लक्ष्य[सम्पादन]

  1. अन्तरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्धारण में सतत् विकास के लिये सामाजिक, आर्थिक तथा पर्यावरणीय आयामों का समाकलन।
  2. सतत विकास के लिये एकीकृत एवं व्यापक रूप से भागीदारीपूर्ण प्रयास को बड़े पैमाने पर लागू करना।
  3. जोहान्सबर्ग की क्रियान्वयन योजना के लक्ष्य एवं लक्ष्य क्षेत्र के क्रियान्वयन में भारी प्रगति।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन[सम्पादन]

संयुक्त राष्ट्र के इस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन UNFCCC में अधिकांश देश एक अन्तरराष्ट्रीय संधि में सम्मिलित हुए एवं एकमत होकर वैश्विक ऊष्मण को कम करने के लिये सोचना व कार्य करना प्रारंभ किया। हाल ही में कई देशों ने इस संधि सम्मेलन में कुछ अतिरिक्त बातों को भी मान्यता प्रदान की और उसका नाम ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ है जिसमें अधिक तरीके हैं जो कानूनी रूप से बाध्य होंगे। संधि में‘‘क्योटो प्रोटोकॉल’’ के रूप में 1997 में स्वीकृत की गई थी।

क्योटो प्रोटोकॉल[सम्पादन]

यह एक अन्तरराष्ट्रीय तथा कानूनी रूप से बाध्य करने वाला समझौता है जिसके द्वारा विश्वभर में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। यह 16 फरवरी 2005 से लागू किया गया है।

कार्य[सम्पादन]

  1. सम्मेलन औद्योगीकरण वाले देशों पर जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिये काफी दबाव डालता है क्योंकि ये देश ही भूत और वर्तमान के ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं। इन देशों को यह कहा गया है कि इस प्रकार के उत्सर्जनन को कम करने का वे हर संभव प्रयास करें। इन विकसित देशों को एनेक्स 1 देश कहा जाता है।
  2. ये प्रगतिशील देश एवं 12 परिवर्तनकारी अर्थव्यवस्थाएँ (केंद्रीय एवं पूर्वी यूरोप के कुछ देश, जिनमें कुछ देश पहले सोवियत यूनियन के अंतर्गत आते थे) से आशा की गई थी कि सन 2000 तक ये अपने देशों में उत्सर्जन का स्तर कम करके 1990 के स्तर तक ले आएंगे।
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  3. औद्योगिक देश सम्मेलन के अंतर्गत विकासशील देशों में होने वाली जलवायु परिवर्तन की गतिविधियों को आर्थिक समर्थन देने पर सहमत हो गए हैं।
  4. सम्मेलन के द्वारा ऋण एवं दान की एक प्रणाली भी बनायी गयी है और इसे वैश्विक पर्यावरण सुविधा द्वारा प्रबंधित किया जाता है। अतः सम्मेलन यह स्वीकार करता है कि आने वाले वर्षों में विकासशील देशों द्वारा उत्पन्न ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की भागीदारी बढ़ेगी। इसलिये इन देशों को उत्सर्जन कम करने की दिशा में इस प्रकार से मदद करनी चाहिए ताकि उनकी आर्थिक प्रगति में कोई रुकावट न पहुँचे।

अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ[सम्पादन]

प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए समर्पित एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। संगठन का घोषित लक्ष्य, विश्व की सबसे विकट पर्यावरण और विकास संबंधी चुनौतियों के लिए व्यावहारिक समाधान खोजने में सहायता करना है। संघ विश्व के विभिन्न संरक्षण संगठनों के नेटवर्क से प्राप्त जानकारी के आधार पर "लाल सूची" प्रकाशित करता है, जो विश्व में सबसे अधिक संकटग्रस्त प्रजातियों को दर्शाती है।विश्व का सबसे पुराना और सबसे बड़ा वैश्विक पर्यावरण नेटवर्क है। यह एक गणतांत्रिक सदस्य सभा है जिसमें 1000 से अधिक सरकारी और गैर सरकारी सदस्य संगठन हैं, और लगभग 11,000 स्वयंसेवी वैज्ञानिक हैं जो 160 से अधिक देशों में रहते हैं। IUCN का कार्य, विश्व में चारों ओर फैले सैकड़ों सार्वजनिक, गैर सरकारी संगठनों और प्राथमिक क्षेत्रों के पार्टनरों और 60 ऑफिसों के लगभग सौ से अधिक पेशेवर कर्मचारियों की मदद से चलता है। इसका मुख्यालय जेनेवा के करीब, ग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया में स्थित है।

कार्य[सम्पादन]

  1. यह विश्व में लोगों को जागरूक करने का कार्य करता है। जिससे लोग विभिन्नता एवं अखंडता का संरक्षण कर सकें तथा यह सुनिश्चित करे कि किसी भी प्राकृतिक संसाधन का इस्तेमाल पूर्णतः न्याय संगत हो एवं पारिस्थितिकी के अनुसार चलने वाला भी हो।
  2. प्रकृति हमें जीवन की सभी मूलभूत आवश्यकताएँ जैसे जल, खाद्य, स्वच्छ हवा, ऊर्जा एवं आवास प्रदान करती है। इसलिये हमें प्रकृति का बुद्धिमानी से इस्तेमाल करना चाहिए एवं इसकी सुरक्षा करनी चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ लोगों के जीवन को सुधारने एवं गरीबी घटाने के लिये सामाजिक एवं आर्थिक विकास भी लगातार होते रहना चाहिए।
  3. पृथ्वी पर स्थित समस्त जीवन का आधार है जैव विविधता- जिसमें विभिन्न पशु-पक्षी, एवं उनके रहने के स्थान का जटिल जाल शामिल है। जैव विविधता का संरक्षण-पौधों एवं पशुओं की प्रजातियों को लुप्त होने से रोकना एवं प्राकृतिक क्षेत्रों को नष्ट होने से बचाना ही IUCN का मुख्य कार्य है।[३]
  4. जैव विविधता से संबंधित मानव जाति के सामने आज चार चुनौतियाँ हैं: जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, आजीविका एवं अर्थशास्त्र। IUCN इसीलिये इन चारों क्षेत्रों पर कार्य करता है जबकि इसका मुख्य कार्य जैव विविधता पर ही है।

रामसर सम्मेलन[सम्पादन]

रामसर सम्मेलन नमी भूमि के संरक्षण के लिए विश्व स्तरीय प्रयास है।

नमी भूमि

भविष्य के लिए झीलों एवं नमी भूमि का संरक्षण विषय पर आधारित इस सम्मेलन का आयोजन भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा राजस्थान सरकार एवं अन्तर्राष्ट्रीय झील पर्यावरण सदस्य, जापान के सहयोग से किया गया है। बढते शहरीकरण एवं औद्योगीकरण के कारण विश्व भर में झीलों को अनेक प्रकार से क्षति पहुंची है। इसी कारण से सभी देशों में झीलों के पुनरूद्धार एवं उनकी जल की गुणवत्ता को सुधारने के लिए सघन प्रयास किये गये हैं । इसमें जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए व्यापक कानून बनाया गया है। विश्व स्तर पर संरक्षण प्रयासों के तहत 1971 में नमी भूमि पर आयोजित रामसर कन्वेंशन में भी सक्रिय रूप से भागीदारी की थी। भारत में अनेक झीलों के संरक्षण के प्रयासों को विश्व स्तर पर सराहा गया है। चिल्का झील के पुनरुद्धार के लिए देश को रामसर संरक्षण अवार्ड दिया गया है। इसी प्रकार भोपाल झील के संरक्षण कार्य की भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई है।

झीलों तथा नमी भूमि के संरक्षण के लिए सर्वप्रथम 1985 में इस प्रकार का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया था तथा इसके बाद दो वर्षों के अंतराल में विश्व के विभिन्न भागों में इसके सम्मेलन निरन्तर हो रहे हैं जो वैज्ञानिक सोच के साथ विकासशील देशों को झीलों तथा नमी भूमि के रखरखाव के उपाय सुझाते हैं।

प्रकृति संरक्षण हेतु विश्वव्यापी कोष[सम्पादन]

प्रकृति संरक्षण हेतु विश्वव्यापी कोष (Worldwide Fund for Nature-WWF) का गठन वर्ष 1961 में हुआ था। इसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड में है। यह पर्यावरण के संरक्षण, अनुसंधान एवं रख-रखाव संबंधी मामलों पर कार्य करता है। पूर्व में इसका नाम विश्व वन्यजीव कोष (World Wildlife fund) था।प्रकृति संरक्षण हेतु विश्वव्यापी कोष विश्व का सबसे बड़ा और अनुभवी स्वतंत्र पर्यावरण संरक्षण संगठन है। राष्ट्रीय संगठनों और कार्यक्रम कार्यालयों के वैश्विक जाल के साथ इसके 5 मिलियन से अधिक समर्थक हैं। राष्ट्रीय संगठन पर्यावरण कार्यक्रमों को संचालित करते हैं तथा प्रकृति संरक्षण हेतु विश्वव्यापी कोष के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण कार्यक्रम को वित्तीय सहायता तथा तकनीकी सुविज्ञता प्रदान करते हैं। कार्यक्रम कार्यालय डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के क्षेत्रीय कार्यों को प्रभावित करते हैं तथा राष्ट्रीय एवं स्थानीय सरकारों को परामर्श देते हैं ताकि भावी पीढ़ी प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके रह सके।

उद्देश्य[सम्पादन]

प्रकृति संरक्षण हेतु विश्वव्यापी कोष के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं:-

  1. आनुवंशिक जीवों और पारिस्थितिक विभिन्नताओं का संरक्षण करना।
  2. यह सुनिश्चित करता है कि नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग पृथ्वी के सभी जीवों के वर्तमान और भावी हितों के अनुरूप हो रहा है।
  3. प्रदूषण, संसाधनों और उर्जा के अपव्ययीय दोहन और खपत को न्यूनतम स्तर पर लाना।
  4. हमारे ग्रह के प्राकृतिक पर्यावरण के बढ़ते अवक्रमण को रोकना।
  5. एक ऐसे भविष्य के निर्माण में सहायता करना, जिसमें मानव प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके रहता है।

संबंधित प्रश्न[सम्पादन]

  1. दीर्घोपयोगी विकास आयोग क्या है और इसके मुख्य कार्य क्या हैं?
  2. रियो + 10 क्या है एवं यह कहाँ हुआ था?
  3. पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए कदमों की विवेचना कीजिए।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. H. M. Saxena (2017). Environmental Geography. Rawat Publications. आइएसबीएन 978-81-316-0848-7.
  2. AniSa Bhasina (1 January 2011). Janiye Manav Adhikaron Ko. Grantha Akādamī. पृप. 241–. आइएसबीएन 978-93-81063-16-3.
  3. Shukdeo Prasad (1 January 2009). Paryavaran Aur Hum. Prabhat Prakashan. पृप. 242–. आइएसबीएन 978-81-7315-079-1.