पर्यावरणीय भूगोल/पारिस्थितिकी तंत्र

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पर्यावरणीय भूगोल
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नाइट्रोजन चक्र

पारिस्थितिकी तन्त्र का अर्थ[सम्पादन]

पारितंत्र (ecosystem) या पारिस्थितिक तंत्र एक प्राकृतिक इकाई है जिसमें एक क्षेत्र विशेष के सभी जीवधारी, पौधे, जानवर और अणुजीव शामिल हैं जो कि अपने अजैव पर्यावरण के साथ अंतर्क्रिया करके एक सम्पूर्ण जैविक इकाई बनाते हैं, उसे पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं। इस प्रकार पारितंत्र अन्योन्याश्रित अवयवों की एक इकाई है जो एक ही आवास को बांटते हैं। पारितंत्र में आमतौर पर जीव-जंतुओं मिलकर अनेक खाद्य जाल बनाते हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर इन जीवों के अन्योन्याश्रय और ऊर्जा के प्रवाह को दिखाते हैं। [१]

जिसमें वे अपने आवास भोजन व अन्य जैविक क्रियाओं के लिए एक दूसरे पर आश्रित होते हैं।पारिस्थितिकी तंत्र शब्द को 1930 में रोय क्लाफाम द्वारा एक पर्यावरण के संयुक्त शारीरिक और जैविक घटकों को निरूपित करने के लिए बनाया गया था। ब्रिटिश परिस्थिति विज्ञानशास्री आर्थर टान्सले ने बाद में, इस शब्द को परिष्कृत करते हुए यह वर्णन किया यह पूरी प्रणाली न केवल जीव-परिसर है, लेकिन वह सभी भौतिक कारकों का पूरा परिसर भी शामिल हैं जिसे हम पर्यावरण कहते हैं।टान्सले पारितंत्रों को न केवल प्राकृतिक इकाइयाँ के रूप में, बल्कि "मानसिक आइसोलेट्स" के रूप में भी मानते थे। टान्सले ने बाद में "ईकोटोप" शब्द के प्रयोग द्वारा पारितंत्रों के स्थानिक हद को परिभाषित किया।

पारिस्थितिकी तंत्र

ओडीम के अनुसार:- ”किसी भी समुदाय के जीवित जीव तथा उनके अजीवित पर्यावरण (अजैविक पर्यावरण) परस्पर एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से सम्बन्धित हैं, तथा यह दोनों एक-दूसरे के साथ प्रतिक्रिया करते हैं । इस प्रक्रिया में ऊर्जा प्रवाह और खनिज पदार्थ चक्र को पूरा करने के लिए निरन्तर रचनात्मक और कार्यात्मक पारस्परिक अनुक्रियायें होती रहती है इन्हीं अनुक्रियाओं के सम्पूर्ण तन्त्र को पारिस्थितिकी तन्त्र कहते।” फ्यूरले एवं न्यूए ने (1983) में बताया है कि पारिस्थितिकी तन्त्र आपस में एक-दूसरे से अपने पर्यावरण से सम्बद्ध जीवों [२]की समाकलित एकता या सम्मेल होते हैं ।

पारिस्थितिकी तन्त्र की विशेषताएं[सम्पादन]

  1. पारिस्थितिकी तन्त्र किसी स्थान विशेष के समस्त जीवधारियों एवं उसके भौतिक पर्यावरण के सकल योग का प्रतिनिधित्व करता है ।
  2. प्रत्येक तन्त्र धरातल पर अपना एक निश्चित क्षेत्र रखता है ।
  3. प्रत्येक तन्त्र के तीन संघटक (Components) होते हैं:- ऊर्जा,जैविक (Biome)अजैविक (Abiotic)अर्थात् भौतिक पर्यावरण
  4. पारिस्थितिकी तन्त्र को निश्चित समय के संदर्भ में देखा जाता है।
  5. तीनों संघटकों के मध्य अन्तर्क्रियाएँ होती हैं, साथ ही साथ विभिन्न जीवों के मध्य भी पारस्परिक क्रियाएँ होती हैं ।
  6. पारितन्त्र को गतिशील रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा, सौर ऊर्जा (Solar Energy) होती है। यद्यपि यह तन्त्र अन्य विभिन्न प्रकार की ऊर्जा द्वारा भी संचालित होता है ।
  7. यह तन्त्र प्रमुखत: प्राकृतिक संसाधनों से सम्बन्धित होता है।
  8. इसके संघटक परस्पर संगठित होते हैं ।
  9. यह तन्त्र एक कार्यशील इकाई है। जिसके अन्तर्गत जैविक संघटक (पौधे, सूक्ष्म जीव व मानव सहित सभी जन्तु) तथा भौतिक या अजैविक संघटक (ऊर्जा प्रवाह,जलीय चक्र खनिज चक्र, अवसाद चक्र, जैव-भू-रसायनिक चक्र) परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित तथा आबद्ध होते है ।
  10. पारिस्थितिकी तन्त्र अपने आप में स्थिर रहता है, बशर्ते उसको नियन्त्रित करने वाले कारकों में से कोई एक कारक में कमी या अधिकता न हो जाए ।
  11. इस तन्त्र की अपनी निजी उत्पादकता होती है। वास्तव में पारिस्थितिकी तन्त्र की उत्पादकता उसमें ऊर्जा की मात्रा की सुलभता पर निर्भर करती है । उत्पादकता का तात्पर्य किसी क्षेत्र में प्रति समय इकाई में जैविक पदार्थों की वृद्धि दर से होता है ।
  12. जैविक संघटकों या अजैविक संघटकों के भीतर किसी भी एक संघटक की कमी या अधिकता पूरे तन्त्र को प्रभावित करती है ।
  13. पारिस्थितिकी तन्त्र क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से भिन्नता वाला होता है इसके संघटक सूक्ष्म आकार से लेकर वृहद आकार वाले होते हैं । एक लघु कीड़ा भी उसका घटक है, तो विशाल हाथी भी ।
  14. इस तन्त्र के विभिन्न संघटकों को अनेक स्तरों पर कई वर्गों में रखा जा सकता है ।
  15. यह एक एकल संकल्पना (Monistic Concept) है, क्योंकि भौतिक पर्यावरण तथा जैविक पर्यावरण एक ही ढाँचे में साथ-साथ होते हैं । अत: इनमें आपसी अन्तर्क्रियाओं के प्रारूप का अध्ययन आसान हो जाता है ।
  16. इनके एक ही प्रकार के पर्यावरण में परस्पर ऐसे सम्बन्ध होते है, जिनको आसानी से देखा नहीं जा सकता । यह सम्बन्ध सुसंगठित व्यवस्था के रूप में होते है ।
  17. यह जीवों और उनके पर्यावरण के बीच पदार्थों के निरन्तर आदान-प्रदान से सम्बन्धित रहता है ।

वर्तमान समय में पारिस्थितिकी तन्त्र शब्द की अवधारणा का व्यापक विकास हुआ है । इसके लिए जियोबायोसिनोसिस या बायोजियोसिनोसिस शब्दों के प्रयोग किये जाते हैं । यह तन्त्र गतिशीलता के सिद्धान्त पर आधारित है । यह घटक को गति प्रदान करता है । एक ओर जीव, पदार्थों को ग्रहण कर अपनी शरीर रचना में वृद्धि करते हैं तथा कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं तो दूसरी ओर प्रकृति में कार्बनिक पदार्थ का विखण्डन भी करते है । इस सम्पूर्ण क्रिया को पदार्थों का चक्रीकरण कहते हैं । इसके अतिरिक्त समस्त जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है । यह ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है । हरे पौधे ऊर्जा को सीधे ग्रहण करते हैं और उसे रसायनिक ऊर्जा में बदलकर संचित करते हैं । यह पौधे जीव-जन्तुओं के लिए ऊर्जा के स्रोत के रूप में काम करते हैं ।

विभिन्न जीव एक-दूसरे को ऊर्जा प्रदान करते रहते हैं । उदाहरण के लिए, सूर्य से ऊर्जा हरे पौधों से शाकाहारी और शाकाहारी से विभिन्न स्तर के माँसाहारी जीवों में प्रवाहित होती है । इस तरह इकोसिस्टम एक गतिमान तन्त्र है, जो वस्तुत: समय के साथ-साथ बढ़ता है ।

परिस्थितिकी तन्त्र के प्रकार[सम्पादन]

विश्व में प्रमुख रूप से दो प्रकार के परिस्थितिकी तन्त्र पाये जाते हैं:-

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  1. जलीय पारिस्थितिकी तंत्र
  2. स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र
  3. वनीय पारिस्थितिकी तंत्र
  4. मरूस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र[सम्पादन]

जल जीवधारियों के लिए आवश्यक यौगिक है,

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जो कि समुद्र, झीलों, नदियों तथा तालाबों में मिलता है । जल में लवणता, ताप, लहरें, ज्वारभाटा तथा आक्सीजन आवश्यक पारिस्थितिकी कारक हैं, जो जलीय जीवन को नियन्त्रित करते हैं ।

स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र[सम्पादन]

वह पारिस्थितिकी तंत्र जो थल अथवा स्थल में पाये जाते है वे स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र कहलाते है जैसे वन पारिस्थितिकी तंत्र, मरूस्थलीय एवं घास के मैदान का पारिस्थितिकी तंत्र।

वनीय पारिस्थितिकी तंत्र[सम्पादन]

पृथ्वी सौर मण्डल का ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन सम्भव है। इसके विस्तृत क्षेत्रों में वनों का विस्तार है। एक ओर सदाबहार उष्ण कटिबन्धीय वन तो दूसरे ओर शीतोष्ण के पतझड़ वाले एवं शीतोष्ण के सीमावर्ती प्रदेशों के कोणधारी वन हैं। वन या प्राकृतिक वनस्पति जहाँ एक ओर पर्यावरण के विभिन्न तत्वों जैसे ताप दाब वर्षा, आद्रता, मृदा आदि को नियंत्रित करते हैं वही उनका अपना पारिस्थितिकी तंत्र भी होता है। वनीय क्षेत्रों की मृदा में मिश्रित कई खनिज लवण व वायु मण्डल के तत्व इस प्रदेश के अजैविक तत्वों उत्पादक, उपभोक्ता व अपघटक के रूप में विभिन्न पौधे और जीव शामिल होते हैं। उत्पादक के रूप में वनीय प्रदेशों में विभिन्न प्रकार के वृक्ष होते हैं जो उष्ण शीतोष्ण व शीत दशाओं के साथ-साथ परिवर्तित होते हैं। इन सबके साथ-साथ विषुवतीय प्रदेशों में झाड़ियाँ, लताऐं आदि अधिक संख्या में पाई जाती हैं।

मरूस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र[सम्पादन]

पृथ्वी के लगभग 17% भाग पर उष्ण मरूस्थलीय है। यहाँ का पर्यावरण अल्प वर्षा व उच्च ताप के कारण अलग प्रकार का होता है। यहाँ जल की कमी होती है जिससे यहाँ की वनस्पति भी विशेष प्रकार की होती है तथा यहां बालू के स्तूपों का सर्वत्र विस्तार रहता है।

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मरूस्थल क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति कंटीली झाड़ियाँ,छोटी घास व कुछ शुण्कता सहन करने वाले वृक्ष होते हैं। मरूस्थलीय क्षेत्र में रेंगने वाले व अन्य जीवों के साथ ऊँट, भेड़, बकरी की संख्या अधिकाधिक होती है जो कम वर्षा तथा अल्प भोजन पर जीवन व्यतीत कर सकें।

इन क्षेत्रों में अपघटक क्रिया अपेक्षाकृत कम होती है। इन प्रदेशों में पशु पालन के साथ जहाँ जल उपलब्ध हो जाता है मोटे अनाज की खेती भी की जाती है। ऐसा अनुमान है कि मरूस्थलीय क्षेत्र में जल उपलब्ध हो जाए तो वहाँ भी उत्तम कृषि हो सकती है जैसा कि नील नदी की घाटी में थार के इन्दिरा गाँधी नगर क्षेत्र में आदि। इन क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र में फिर परिवर्तन आ जाता है और खेती भी आसानी से की जा सकती है।

परिस्थितिकी तन्त्र के घटक[सम्पादन]

पारिस्थितिकी तन्त्र की संरचना में जैविक और अजैविक पर्यावरण के घटकों को सम्मिलित किया जाता है । भौतिक पर्यावरण और उसमें रहने वाले जीव ही पारिस्थितिकी तन्त्र का निर्माण करते है। पारिस्थितिकी तन्त्र को दो प्रमुख घटकों में विभाजित किया जाता है:-

  1. जैवीय घटक (Biotic Components)
  2. अजैवीय घटक (Abiotic Components)

जैवीय घटक[सम्पादन]

सभी जीवों को अपनी वृद्धि व पुन: वृद्धि के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है । यह ऊर्जा उनको अपने भोजन से प्राप्त होती है। उनकी भोजन आदतों (Feeding Habits) के आधार पर उन्हें तीन भागों में विभाजित किया जाता है:-

जैवीय घटक
  1. उत्पादक
  2. उपभोक्ता
  3. अपघटक

उत्पादक[सम्पादन]

पेड़-पौधे पारिस्थितिकी तन्त्र के मुख्य उत्पादक होते हैं । यह पौधे क्लोरोप्लास्ट द्वारा ऊर्जा को ग्रहण कर सरल अकार्बनिक पदार्थों जैसे जल तथा कार्बन डाइआक्साइड द्वारा अधिक ऊर्जा युक्त कार्बनिक पदार्थ के रूप में अपना भोजन बनाते हैं । सूर्य ऊर्जा के प्रकाश से संश्लेषण द्वारा भोजन के रूप में रासायनिक ऊर्जा में बदलते है । सभी प्रकार की घास, वृक्ष, शैवाल [३](Blue Green Algae) व कुछ बैक्टीरिया इस वर्ग में शामिल हैं । वास्तव में यह सभी अपनी वृद्धि के लिए स्वयं भोजन की उत्पत्ति करते हैं, इसी से इन्हें उत्पादक कहा जाता है। इनको स्वयंपोषी जीव भी कहते हैं ।

उपभोक्ता[सम्पादन]

ये जीव-जंतुओं भोजन के लिए उत्पादकों पर निर्भर रहते है । इसके अन्तर्गत सभी जन्तु आते हैं। यह पौधों द्वारा बनाये गये भोजन पर निर्भर रहते हैं । इसलिए इन्हें उपभोक्ता कहते है । कार्बोहाइहेट, प्रोटीन, विटामिन तथा खनिज तत्व हमारे भोजन के अवयव हैं, जो अनाज, फल, साग-सब्जी तथा विभिन्न पौधों से प्राप्त होते है, यह सभी उत्पादक घटक पर निर्भर करते हैं । यह वास्तव में परपोषी जीव हैं, इनको निम्न तीन वर्गों में बांटा गया है:-

प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumer):-इन्हें शाकाहारी प्राणी भी कहते है,

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यह वनस्पतियों पर अपने भोजन के लिए निर्भर रहते है। इनमें गाय, बकरी, हिरन, खरगोश, गिलहरी, बन्दर इत्यादि को मुख्य रूप से शामिल करते है । यह प्राथमिक चरण के उपभोक्ता (Consumer of the First Order) है,क्योंकि यह सीधे ही उत्पादकों पर निर्भर करते हैं।

द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumer):-इन्हें माँसाहारी प्राणी भी कहते है यह अपनी ऊर्जा शाकाहारी जन्तुओं से प्राप्त करते है। इन्हें दूसरे चरण के उपभोक्ता भी कहते है । सांप, लोमड़ी, बिल्ली, भेड़िए, शेर इसी वर्ग के अन्तर्गत आते हैं।
तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumer):-इसके अंतर्गत वे उपभोक्ता आते हैं जो प्राथमिक व द्वितीयक श्रेणी के उपभोक्ता को अपना भोजन बनाते है,जैसे मानव, भालू इत्यादि। मानव एक ऐसा प्राणी है, जो सीधे उत्पादकों पर निर्भर करता है, तथा उसमें कुछ वर्ग द्वितीयक व प्राथमिक उपभोक्ताओं को अपना भोजन बनाता है। इसीलिए इसे शाकाहारी व माँसाहारी प्राणी माना गया है। इसे तृतीयक उपभोक्ता भी कहते हैं ।

अपघटक[सम्पादन]

प्राथमिक एवं द्वितीयक उत्पादक जीवों के मरने पर मृत शरीर अनेक प्रकार के बड़े जीवाणु, कवक इत्यादि द्वारा अपघटित (Decompose) किए जाते है, जिससे मृत कार्बनिक पदार्थ पुन: सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल जाता है और इस प्रक्रम में जीवाणु ऊर्जा प्राप्त करते है। अपघटन करने वाले जीवों को अपघटक (Decomposer) कहते हैं । [४]अपघटकों को स्कैवेन्वर्स के नाम से पुकारा जाता है ।कैंचुँआ (Earthworm) कवक (Fungi) बैक्टिरिया आदि अपघटक के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं, जो वनस्पति एवं जीव जगत् के अवशिष्ट व मृत शरीर पर जीवित रहते हैं व उसे जैविक अवशिष्ट को पुन: अजैविक पदार्थ जैसे मृदा में बदल देते हैं । इस प्रकार जैविक पदार्थ परिस्थितिकी संतुलन बनाये रखने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं ।

वास्तव में अपघटक जैविक पदार्थों को अजैविक खनिजीय तत्वों में बदल देते है, जो मृदा को पोषक तत्व (Nutrients) प्रदान करते हैं, जिससे उनकी उत्पादक शक्ति में वृद्धि होती है और पौधों व घास की उत्पत्ति में सहायक होते हैं । इस प्रकार अपघटक अपनी इस कार्यशैली द्वारा पारिस्थितिकी तन्त्र के चक्र को पूरा करने में मददगार साबित भी होते हैं ।

अजैविक घटक[सम्पादन]

इसके अर्न्तगत वातावरण के निर्जीव तत्व सम्मिलित हैं।[५] इन घटकों को निम्नलिखित तीन अपघटकों में विभाजित किया जाता है:-

अकार्बनिक घटक[सम्पादन]

इसके अन्तर्गत जल, कैल्शियम, पौटेशियम, लौहा, सलफर आदि लवण निहित होते हैं । इसके साथ-साथ आक्सीजन, कार्बन डाइआक्साइड, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन व फास्फोरस भी शामिल होते हैं ।

कार्बनिक घटक[सम्पादन]

इसके अन्तर्गत कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, जीवांश (Humus) आदि सम्मिलित होते हैं। यह तत्व पौधे तथा मृतक जन्तुओं से प्राप्त होते हैं ।

भौतिक घटक[सम्पादन]

इसके अन्तर्गत वायु, जल आदि शामिल हैं। इसमें सूर्य-ऊर्जा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कारक है ।

पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह[सम्पादन]

  1. पारिस्थितिक तंत्र में प्रविष्ट होने वाली ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य होता है जिसे सौर ऊर्जा कहते हैं। पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह केवल एक ही दिशा में होता है।
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  2. पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा सौर ऊर्जा का रूपान्तरण रासायनिक ऊर्जा में कर देते हैं जो कि भोजन के रूप में पौधों के उत्तकों में संचित हो जाती है।
  3. जब प्राथमिक उपभोक्ता इन पौधों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं तो पौधों में संचित ऊर्जा का गमन प्राथमिक उपभोक्ताओं में हो जाता है। प्राथमिक उपभोक्ताओं द्वारा प्राप्त ऊर्जा का कुछ भाग श्वसन क्रिया द्वारा नष्ट हो जाता है और शेष उनकी वृद्धि तथा विकास में काम आता है।
  4. प्राथमिक उपभोक्ताओं से भोजन प्राप्त करने के पश्चात् उसमें संचित ऊर्जा द्वितीयक उपभोक्ताओं और द्वितीयक से तृतीयक उपभोक्ताओं में पहुँच जाती है।
  5. पौधों एवं जन्तुओं के मरने से उनमें संचित ऊर्जा का स्थानान्तरण अपघटकों (कवक, जीवाणु) में हो जाता है। इन जीवों के श्वसन से ऊर्जा का कुछ भाग वायुमण्डल में लौट जाता है। इस प्रकार कोई भी जीव भोजन द्वारा प्राप्त पूर्ण ऊर्जा को अपने में एकत्रित नहीं कर सकता है। सामान्यत: जब एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में ऊर्जा जाती है तो उसका अधिकांश भाग वायुमण्डल में चला जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा का प्रवाह एक क्रम में तथा एक ही दिशा में चलता रहता है।

संबंधित प्रश्न[सम्पादन]

  1. पारिस्थितिकी तंत्र की व्याख्या करें।
  2. पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख घटकों की चर्चा करें।
  3. पारिस्थितिकी तंत्र की संकल्पना किसने दी।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. क्रिस्टोफरसन, आरडब्ल्यू (1996)
  2. Savindra Singh (1991). Environmental Geography. Prayag Pustak Bhawan.
  3. H. M. Saxena (2017). Environmental Geography. Rawat Publications. आइएसबीएन 978-81-316-0848-7.
  4. सविन्द्र सिंह, पर्यावरण भूगोल, प्रयाग पुस्तक भवन, इलाहाबाद, प॰ iii
  5. Dr. Dina Nath Tewari. Paryavaran : Satat Vikas Evam Jeevan. Prabhat Prakashan. पृप. 5–. आइएसबीएन 978-93-86870-69-8.