पर्यावरणीय भूगोल/मानव पर्यावरण संबंध

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पर्यावरणीय भूगोल
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प्रकृति में वायु, जल, मृदा, पेड़-पौधे तथा जीव-जन्तु सभी सम्मिलित रूप में पर्यावरण की रचना करते हैं। सामान्यतः किसी स्थान विशेष में मानव के चारों तरफ (स्थल, जल, वायु, मृदा आदि) का वह आवरण जिससे वह घिरा है, वह पर्यावरण (Environment) कहलाता है। अर्थात् पर्यावरण से अभिप्राय आसपास या पासपड़ोस अर्थात् हमारे चारों ओर फैले हुए मानव, जन्तुओं या पौधों के उस वातावरण एवं परिवेश से है, जिससे हम घिरे हुए हैं।

पर्यावरण के प्रकार[सम्पादन]

भूगोल में पर्यावरण के अध्ययन के अनुसार इसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. प्राकृतिक या भौतिक पर्यावरण
  2. मानवीय या सांस्कृतिक पर्यावरण

प्राकृतिक या भौतिक पर्यावरण[सम्पादन]

प्राकृतिक पर्यावरण को भौतिक पर्यावरण भी कहते हैं। भौतिक पर्यावरण जैविक और अजैविक तत्वों का दृश्य और अदृश्य समूह है जो जीवमण्डल को परिवृत किए हुए है। प्राकृतिक पर्यावरण प्राकृतिक उपादानों, जैव एवं अजैव घटकों का समुच्चय होता है जो धरातल से लेकर आकाश तक व्याप्त रहता है। [१]प्राकृतिक पर्यावरण में तीन तत्व समूह सम्मिलित होते हैं भौतिक तत्व समूह – धरातल, जलवायु, मृदा, जल, वायु, खनिज आदि,ऊर्जा तत्व समूहताप एवं प्रकाश,जैव तत्व समूह वनस्पतियां एवं जीव-जन्तु। इन तीनों तत्त्वों के समूहों से प्राकृतिक पर्यावरण का निर्माण होता है। ये तत्व लाखों करोड़ों वर्षों से अन्तप्रक्रिया करते चले आ रहे हैं। इनके परिवर्तित स्वरूप का पर्यावरण एवं अन्य जीवधारियों पर प्रभाव परिलक्षित होता है। यह परिवर्तन प्राकृतिक नियमों के अनुसार ही होता है। भौतिक पर्यावरण से तात्पर्य उन सम्पूर्ण भौतिक प्रक्रियाओं और तत्वों से लिया जाता है जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव मानव पर पड़ता है।
भौतिक पर्यावरण की शक्तियां :- इन शक्तियों के अन्तर्गत सौर ताप, पृथ्वी की दैनिक एवं वार्षिक परिभ्रमण की गतियां, गुरुत्वाकर्षण शक्ति, ज्वालामुखी क्रियाएं, भूपटल की गति तथा जीवन सम्बन्धी दृश्य सम्मिलित किए गए हैं। इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर अनेक प्रकार की क्रियाएं, प्रक्रियाएं एवं प्रतिक्रियाएं होती हैं, जिनसे वातावरण के तत्व उत्पन्न होते हैं और इन सबका प्रभाव मानव की क्रियाओं पर पड़ता है। भौतिक पर्यावरण की प्रक्रियाएं :- प्रक्रियाओं में भूमि का अपक्षय, अपरदन अवसादीकरण, तापविकिरण एवं चालन, ताप वाहन, वायु एवं जल में गतियों का पैदा करना, जीव की जातियों का जन्म, मरण और विकास, आदि सम्मिलित किए जाते हैं। इन प्रक्रियाओं द्वारा भौतिक पर्यावरण में अनेक क्रियाएं उत्पन्न होती हैं जो मानव के क्रियाकलापों पर अपना प्रभाव डालती हैं।

सांस्कृतिक अथवा मानवीय[सम्पादन]

प्राथमिक पर्यावरण में मनुष्य स्वविकसित तकनीकी की सहायता से संशोधन तथा परिवर्तन करता रहता है और उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप बना लेता है। उदाहरण के लिए, वह भूमि को जोतकर खेती करता है, जंगलों को साफ करता है, सड़कें, नहरें, रेलमार्ग, आदि बनाता है, पर्वतों को काट कर सुरंगें, आदि निकालता है, नयी बस्तियां बसाता है तथा भूगर्भ से खनिज सम्पति निकालकर अनेक उपकरण एवं अस्त्रशस्त्र, आदि बनाता है और प्राकृतिक संसाधनों का विभिन्न प्रकार से शोषण कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इन सबके फलस्वरूप वह एक नए पर्यावरण को जन्म देता है। इसे मानवीय,मानव निर्मित अथवा प्राविधिक पर्यावरण कहा जाता है। यह सांस्कृतिक पर्यावरण भी कहलाता है। इसके अन्तर्गत औजार, गहने, अधिवास, मानवीय क्रियाओं के सृजित रूप जैसे खेत, कृत्रिम चरागाह व उद्यान, पालतू पशु सम्पदा, उद्योग एवं विविध उद्यम, परिवहन और संचार के साधन प्रेस आदि सम्मिलित किए जाते हैं। मानव को जिस प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता होगी वह उन्हीं पर शोध कर उन्हें खोजने की कोशिश करता है। शारीरिक एवं मानसिक योग्यता का ज्ञान, इनके निर्माण का विज्ञान, ये भी मानव संस्कृति के ही भाग हैं। ये मानव की सांस्कृतिक विरासत हैं।

मानव प्रर्यावरण सम्बन्ध[सम्पादन]

मानव प्रत्येक प्रकार के क्रियाकलापों के लिए पर्यावरण पर निर्भर है। कहीं पर्यावरण उसे प्रभावित करता है तो कहीं वह उसके साथ अनुकूलन तथा परिवर्तन करना पड़ता है। [२]इसे पर्यावरण समायोजन भी कहते हैं।

पर्यावरण से सामंजस्य[सम्पादन]

भौतिक पर्यावरण के साथ मानव का सामंजस्य अत्यन्त प्राचीनकाल से रहा है। जब वह पत्थर युग में था। इस युग में मनुष्य ने अपनी सुरक्षा के लिए घर बनाने, प्रकृति की वस्तुओं का भोजन के रूप में उपयोग करने, पत्थर को काट-छांट, घिसकर औजार बनाने, जंगली पशुओं को पालतू बनाने और सामूहिक रूप से सुरक्षा आदि करने के रूप में मनुष्य ने अपने सांस्कृतिक पर्यावरण को जन्म दिया है ,तभी से मनुष्य भौतिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाने में सफल रहा है, मनुष्य ने विज्ञान, तकनीकी ज्ञान और आर्थिक क्रियाओं में बड़ा महत्वपूर्ण परिवर्तन करके भौतिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य करने की रीतियों में बड़ा प्रसार किया है। इस प्रकार सामंजस्यों को मुख्यत: तीन श्रेणियों में रखा जाता है:-

  1. आर्थिक
  2. सामाजिक
  3. सांस्कृतिक
  4. राजनीतिक

आर्थिक सामंजस्य[सम्पादन]

इस प्रकार का अनुकूलन समाज द्वारा कार्यप्रतिमानों के रूप में किया जाता है। मनुष्य कौन-सा कार्य करना चाहता है यह उसकी इच्छाओं, विचारों और उसकी कुशलता पर निर्भर करता हैं। भौतिक पर्यावरण में मिलने वाली सम्पदा द्वारा प्रभावित होती है। आर्थिक सामंजस्य मुख्यतः चार श्रेणियों में बाँटे जा सकते हैं:-
उद्यम:- इसमें मछली पकड़ना, लकड़ी काटना, जाल बिछाकर पशुओं को पकड़ना तथा खानें खोदना सम्मिलित किया जाता है। इन कार्यों में प्रकृति से सीधे ही वस्तुएं प्राप्त की जाती हैं। इस प्रकार मनुष्य वस्तु उपयोगिता उत्पन्न करता है।
उत्पादक उद्योग:- इसमें मनुष्य भूमि से उन वस्तुओं को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त करने का प्रयास करता है जो पहले से ही मौजदू हैं जैसे कृषि, पशुपालन तथा रेशम के कीड़े पालकर उनका उत्पादन प्राप्त करना।
निर्माण उद्योग:- इनके अन्तर्गत खदानों अथवा कृषि से प्राप्त वस्तुओं को पिघलाकर, साफ-सुथरा कर उनसे वस्तुएँ निर्मित की जाती हैं। इस प्रकार के उद्योग से स्वरूप उपयोगिता प्राप्त की जाती है।
वाणिज्यक क्रियाकलाप:- इनमें यातायात एकत्रीकरण, विनिमय एवं अर्थ प्रबन्धन की क्रियाएँ सम्मिलित की जाती हैं।इसके द्वारा स्थान और समय उपयोगिता प्राप्त की जाती है। इसके साथ साथ मनुष्य की अन्य व्यावसायिक सेवाएँ (शिक्षा, कानून, डाक्टरी, आदि, व्यक्तिगत सेवाएँ (घरेलू कार्य, सफाई का कार्य) भी सम्मिलित किए जाते हैं।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक सामंजस्य[सम्पादन]

मानव समाज अपने भौतिक पर्यावरण के साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक सामंजस्य भी स्थापित करता है। इसके अन्तर्गत जनसंख्या का घनत्व, भूमि पर स्वामित्व, सामाजिक वर्ग,परिवार, समाज-सम्बन्ध, आदि बातें सम्मिलित किया जाता हैं। इसी प्रकार के सामंजस्य में मनुष्य के व्यवहार एवं आदतें, उनका स्थायी जमाव व घुमक्कड़ जीवन, उसके वस्त्र, भोजन, घर, आचार-विचार, धार्मिक विश्वास एवं आस्थाएं,कला,आदि बातों का भी समावेश किया जाता है।

राजनीतिक समंजन[सम्पादन]

मानव समाज अपने भौतिक पर्यावरण से नागरिक तथा राजनीतिक सामंजस्य स्थापित करता है। इस क्रिया के अन्तर्गत स्थानीय, प्रान्तीय या राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, सैन्य नीतियां तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून आदि की व्यवस्था सम्मिलित होती हैं।

पर्यावरण से अनुकूलन[सम्पादन]

पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन से या दूसरे पर्यावरण में उसके अनुसार बदल लेना उपयोजन या अनुकूलन कहलाता है। दूसरे शब्दों में पर्यावरण के परिवर्तनों का सामना करने के लिए शरीर में जो प्राकृतिक संशोधन होता है उसे ही समायोजन कहा जाता है। उदाहरण के लिए, अधिक गर्मी का सामना करने के लिए शरीर से पसीना छूटता है उससे शरीर ताप सहन करने की स्थिति में हो जाता है। मानव बाह्य पर्यावरण की उन परिस्थितियों से,जो उसके कार्यों में बाधा डालती हैं, उपयोजन करने का प्रयास करता है। और यदि इस कार्य में उसे आशातीत सफलता नहीं मिलती तो वह उसके परिवर्तन करने में लग जाता है। यदि किसी क्षेत्र विशेष में कुछ समय के लिए कृषि कार्य न किया जाए तो अनुकूल परिस्थितियों में वहाँ घास या वनों की उत्पत्ति होना स्वाभाविक होगा। इसलिए मानव को अपने पर्यावरण से उपयोजन करने के लिए निरन्तर क्रियाशील रहना पड़ता है।

डॉ. टेलर के मतानुसार प्रकृति मानव के लिए एक प्रकार की योजना प्रस्तुत करती है। मानव उस योजना को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। [३]यह योजनाएँ एक प्रकार से सुअवसरों के समान हैं जिन्हें मानव चाहे स्वीकार करे या ठुकरा दे, किन्तु मानव का हित इसी में है कि वह इन सुअवसरों से लाभ उठाए और अपने आपको पर्यावरण से उपयोजित कर ले”। साधारणतः अनुकूलन के निम्न भेद किए जा सकते हैं:-

  1. भौतिक या शारीरिक अनुकूलन
  2. साम्प्रदायिक (सामाजिक) अनुकूलन

भौतिक या शारीरिक अनुकूलन[सम्पादन]

इस प्रकार का उपयोजन पूरी तरह प्राकृतिक नियमों के अधीन या अनिवार्य रूप से हुआ करता है, मानव की इच्छा-अनिच्छा अथवा प्रयत्नों का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्राकृतिक दशाएं और शक्तियां मानव पर स्पष्ट रूप से अपना प्रभाव डालती हैं। भूमध्यरेखीय वन प्रदेशों में तेज धूप के कारण मानव का रंग एकदम काला हो जाता है जबकि शीतप्रधान प्रदेशों में पीला या सफेद क्योंकि वहां सूर्य के प्रकाश की कमी रहती है। इसी प्रकार ताजी हवा से मनुष्य को उद्दीपन (stimulation) मिलता है। पहाड़ी भागों के निवासी इसी स्वच्छ वायु के कारण कभी भी फेफड़ों सम्बन्धी बीमारियों से ग्रसित नहीं रहते।

साम्प्रदायिक (सामाजिक) अनुकूलन[सम्पादन]

जब मानव अपने अन्य साथियों की सहायता से पर्यावरण की प्रतिकूल अवस्थाओं को परिवर्तित करने का प्रयास करता है तो उसे साम्प्रदायिक (मानव समाज द्वारा) अनुकूलन कहा जाता है। इस अनुकूलन के फलस्वरूप प्रत्येक जीवधारी अपने निवासस्थान पर रह सकता है और उससे सम्बन्ध स्थापित कर लेता है।

संबंधित प्रश्न[सम्पादन]

  1. मानव पर्यावरण के साथ अपने अनुकूल सम्बन्ध कैसे स्थापित करता है चर्चा करें।
  2. पर्यावरण के साथ सामंजस्य पर टिप्पणी लिखें।
  3. मानव प्रर्यावरण संबंध पर टिप्पणी लिखें।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. रेणु त्रिपाठी; अपर्णा त्रिपाठी (1 January 2006). पर्यावरण भूगोल. ओमेगा पब्लिकेशन्स. आइएसबीएन 978-81-89612-33-7.
  2. H. M. Saxena (2017). Environmental Geography. Rawat Publications. आइएसबीएन 978-81-316-0848-7.
  3. Shukdeo Prasad (1 January 2009). Paryavaran Aur Hum. Prabhat Prakashan. पृप. 242–. आइएसबीएन 978-81-7315-079-1.