भारतीय काव्यशास्त्र/काव्य गुण

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भारतीय काव्यशास्त्र
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काव्य गुण[सम्पादन]

शब्दकोश में गुण का अर्थ उन्नतत: विशेषता, आकर्षण अथवा शोभाकारी धर्म दोषाभाव आदि। काव्य क्षेत्र में इनका उपयोग दोषाभाव एवं काव्य के शोभावर्धक धर्म दो अर्थों में किया जाता है। काव्य के दो गुण है- १) विधायक तत्व २) विधातक। ऐसे तत्व जो काव्य के विधान में उसके परिपोषक में सहायक होते हैं उसे काव्य गुण कहते हैं गुणों का वर्णन सभी आचार्यों ने किया है। इसकी परम्परा भी काव्य शास्त्र के इतिहास से ही संबंधित है। आचार्य भरतमुनि ने दोष विर्पय को गुण कहकर अभिहित किया है। विषर्यस्तो: गुणा: काव्येषु कीर्तिता:। इन्होंने १० गुण माने है। आचार्य वामन गुणों को काव्य के शोभाकारक धर्म के रूप में स्वीकार किया है इनके अनुसार गुणों की संख्या २० है। उनका मत भेदवादी है। और वे गुण और अलंकार में भेद मानते हैं- काव्य शोभाया: कर्त्रारों धर्मा: गुणा:।भरतमुनि ने गुणों को अभवत्मक तत्व के रूप में स्वीकार किया और दण्डी ने स्पष्टत: उन्हें भावात्मक रूप में ,वामन भी ऐसा ही स्वीकार करते हैं, वे गुणों को काव्य का शोभाकारी धर्म मानते हैं गुण को प्रथमता: प्रतिष्ठा प्रदान करने वाले आचार्य वामन ही है। गुणों की संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। आनन्दवर्धन ने गुणों के स्वरूप में नितान्त परिवर्तन कर दिया, तथा गुणों की संख्या भी दस के स्थान पर तीन मानी- १) माधुर्य २) ओज ३) प्रसाद।

माधुर्य गुण[सम्पादन]

चित्त का द्रुति-रूप आह्लाद, जिसमें अन्त:करण द्रवित हो जाए ऐसा आनन्द-विशेष, माधुर्य गुण कहलाता है। यह गुण संयोग, श्रृंगार, करूण, विप्रलम्भ श्रृंगार और शांत रसों में क्रम से बढ़ा हुआ रहता है। इस गुण के व्यजंक वर्ण ट, ठ, ड को छोड़कर क से म एक वर्णों की प्रधानता होती है। इस गुण में समास का सर्वथा अभाव होता है, या छोटा समास होता है। रचना मधुर होती है। उदाहरण-

निरख सखी ये खंजन आये।
फेरे उन मेरे रंजन ने इधर नयन मन भाये।।

प्रसाद गुण[सम्पादन]

प्रसाद गुण के व्यंजक ऐसे सरल और सुबोध पद होते हैं जिनके सुनते ही इनके अर्थ की प्रतिति हो जाए। अर्थात् वह रचना प्रसाद गुण सम्पन्न कहाती हैं जो सामाजिक के हृदय में ठीक उसी प्रकार तुरन्त व्याप्त हो जाती है जैसे सूखे ईंधन में अग्नि झट व्याप्त हो जाती है, अथवा जैसे जल स्वच्छ वस्त्र में तुरन्त व्याप्त हो जाता हैं। प्रसाद गुण के व्यंजक ऐसे सरल और सुबोध पद होते है। जिनके सुनते ही इनके अर्थ की प्रतीति हो जाए। यह गुण सभी रसों में और सभी प्रकार के रचनाओं में रह सकता है।

उदाहरण-

वह आता।
दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता।

ओज गुण[सम्पादन]

चित्त का विस्तार-स्वरूप दीप्तत्व ओज कहलाता है। वीर, बीभत्स और रौद्र रसों में क्रम से इस गुण की अधिकता रहती है। इसमें विशेषकर ट, ठ, ड, ढ़ व्यजंन वर्णों की प्रधानता होती हैं। इस गुण में लम्बे-लम्बे समास होते हैं और रचना उध्दात होती है। उदाहरण-

मुण्ड कटत कहूं रूण्ड नटत कहूं सुण्ड पटत घन।
गिध्द लसत कहुं सिध्द हसत सुख वृध्दि रसत मन।।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र---डाँ. सत्यदेव चौधरी, डाँ. शन्तिस्वरूप गुप्त। अशोक प्रकाशन, नवीन संस्करण-२०१८, पृष्ठ--१२२,१२३