भारतीय काव्यशास्त्र/काव्य लक्षण

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भारतीय काव्यशास्त्र
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काव्य की उत्पत्ति के समय से ही उसके लक्षणों पर विचार होने लगा। पाठक सहृदय के लिए 'काव्य किसे कहेंगे' या 'कविता क्या है' वह मूलभूत प्रश्न है जिसकी विभिन्न आचार्यों ने विभिन्न दृष्टिकोण से व्याख्या की है। कवि के द्वारा जो कार्य संपन्न हो, उसे 'काव्य' कहते हैं - 'कवेरिदं कार्यं भावो वा'। कवि को 'सर्वज्ञ' और द्रष्टा भी माना गया है।

भरतमुनि[सम्पादन]

काव्य के लक्षणों पर विचार करने वाले पहले आचार्य भरतमुनि माने जाते हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित 'नाट्यशास्त्र' में नाट्य को ही साहित्य या काव्य भी माना गया है। राजशेखर ने नाट्यशास्त्र को 'पंचम वेद' की संज्ञा दी है। हालांकि भरत ने स्पष्टतः किसी काव्य-लक्षण का उल्लेख नहीं किया है। भरत ने काव्य की शोभा बढ़ाने वाले ३६ लक्षणों का वर्णन किया है और काव्य कला की प्रशस्ति इस प्रकार की है --

"मृदुललित पदाढ्यं गूढ़ं शब्दार्थहीनं,
जनपदसुखबोध्यं युक्तिमन्नृत्ययोज्यं।
बहुकृतरसमार्गं संधिसंधानयुक्तं,
स भवति शुभकाव्यं नाटकप्रेक्षकाणाम्॥"

यहाँ क्रमशः सात विशेषताएँ वर्णित हैं — मृदुललित पदावली, गूढ़शब्दार्थहीनता, सर्वसुगमता, युक्तिमत्ता, नृत्योपयोगयोग्यता, बहुकृतरसमार्गता तथा संधियुक्तता। इसमें पाँचवाँ तथा सातवाँ नाटक की दृष्टि से वर्णित हैं, शेष में गुण, रीति, रस एवं अलंकार का वर्णन है।

भामह[सम्पादन]

काव्य-लक्षण का वास्तविक विकास भामह से होता है। उनके अनुसार शब्द एवं अर्थ का सहभाव ही काव्य है — "शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्"। वे कहते हैं कि जहां शब्द और अर्थ परस्पर सहित भाव या प्रतिस्पर्धा करते हुए सामने आते हैं, वहाँ शब्दार्थ सन्निधि में काव्यत्व होता है। भामह के अनुसार शब्दालंकार और अर्थालंकार, दोनों का सहभाव ही काव्य-सौंदर्य का द्योतक है। वे शब्द और अर्थ को समान महत्व देते हुए दोनों के प्रतिस्पर्धा और सामंजस्य की उपयोगिता सिद्ध करते हैं। शब्द और अर्थ के इसी प्रतिस्पर्धा और सामंजस्य से चारूत्व अर्थात् सौन्दर्य की निष्पत्ति होती है, जिसे बाद में पण्डितराज जगन्नाथ ने रमणीयता कहा है।

दंडी[सम्पादन]

दंडी ने काव्य का लक्षण बताते हुए माना कि 'शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्नापदावली', अर्थात काव्य का शरीर वांछित अर्थ को उद्घाटित करने वाली पदावली होती है। डॉ॰ नगेंद्र ने भामह के काव्य लक्षण से दंडी के काव्य लक्षण की समता का विश्लेषण किया है। नगेंद्र के अनुसार इष्टार्थ को अभिव्यक्त करने वाला शब्द और शब्दार्थ का साहित्य, सहभाव या सामंजस्य एक ही बात है, क्योंकि कोई शब्द इष्ट अर्थ की अभिव्यक्ति तभी कर सकता है जब शब्द और अर्थ में पूर्ण सहभाव या सामंजस्य हो।

वामन[सम्पादन]

'रीतिरात्मा काव्यस्य' रीति को काव्य की आत्मा मानने वाले वामन ने काव्य का कोई स्वतंत्र लक्षण नहीं दिया है, किंतु रीति वर्णन में उनके विचार उपलब्ध होते हैं। उनके अनुसार सौंदर्य के कारण काव्य ग्राह्य होते हैं और अलंकार को ही सौंदर्य कहते हैं। "काव्यं ग्राह्यमलंकारात्। सौंदर्यमलंकाराः।" काव्य में सौंदर्य दोषों के त्याग और गुणों के ग्रहण के कारण उत्पन्न होता है। वे गुण और अलंकार से युक्त शब्दार्थ को ही काव्य कहते हैं। वामन अलंकारों की अपेक्षा गुण को अधिक महत्व देकर काव्य-चिंतन को एक नई दिशा प्रदान करते हैं, साथ ही भामह और दंडी के विचार-परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

रुद्रट[सम्पादन]

काव्य-लक्षण के विवेचन के क्रम में रुद्रट की कोई महत्वपूर्ण देन नहीं है। वे शब्द और अर्थ दोनों को ही काव्य मानते हैं — 'शब्दार्थौ काव्यम्'।

आनंदवर्धन[सम्पादन]

आनंदवर्धन ने काव्य लक्षण पर विचार करते हुए ऐसे शब्दार्थ को काव्य माना है जो सहृदय के हृदय को आह्लादित (आनंदित) कर दे। उन्होंने ध्वनि को काव्य की आत्मा माना है।

"काव्यस्यात्मा ध्वनि:। सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम्।" ('ध्वन्यालोक' — प्रथम उद्योत)

कुंतक[सम्पादन]

कुंतक के अनुसार अलंकार से युक्त शब्द और अर्थ काव्य है। वे अलंकार को काव्य के बाह्य सौंदर्य का विधायक न मानकर उसका मूल आधार स्वीकार करते हैं। वे काव्य का व्यवस्थित लक्षण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि काव्यमर्मज्ञों को आह्लादित करने वाली वक्रतामय, कविकौशल-युक्त रचना में स्थित शब्द और अर्थ ही काव्य है। वे शब्द और अर्थ, दोनों के सहभाव को काव्य मानते हैं —

"शब्दार्थौ सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनी। बंधे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणी॥" (वक्रोक्तिजीवितम्, १/७)

मम्मट[सम्पादन]

आचार्य मम्मट का लक्षण प्रौढ़ एवं सुदीर्घ चिंतन का परिणाम है। उनके अनुसार दोषरहित, गुणसहित तथा यथासंभव अलंकारयुक्त शब्दार्थ ही काव्य है। उन्होंने काव्य में अलंकार की स्थिति वैकल्पिक मानकर उसे गौण बना दिया है — "तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि"। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'काव्य प्रकाश' में मम्मट ने काव्य को परिभाषित करते हुए कहा है कि वहाँ (काव्य में) शब्द और अर्थ का सहभाव दोष रहित, गुण सहित और कहीं पर बिना अलंकृति के भी होता है। अदोष का तात्पर्य है काव्य को दोषों जैसे — क्लिष्टत्व, श्रुतिकटुत्व, ग्राम्यत्व, अश्लीलत्व आदि से रहित होना चाहिए। गुण का तात्पर्य है भरतमुनि द्वारा निर्दिष्ट काव्य गुणों जैसे — माधुर्य, ओज, समता, समाधि, श्लेष आदि गुणों से युक्त होना चाहिए। ऐसे शब्दार्थ के संयोजन में कहीं-कहीं बिना अलंकार के भी काम चल सकता है। काव्य दोषों से रहित गुणों के सहित कही कही पर अलंकार से युक्त जो शस्त्र होता है वह काव्य शास्त्र कहलाता है

विश्वनाथ[सम्पादन]

विश्वनाथ के अनुसार "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" अर्थात् रसात्मक वाक्य ही काव्य होता है। यहाँ आचार्य विश्वनाथ ने पहली बार शब्दार्थ की जगह वाक्य में काव्यत्व की स्थिति मानी है। उनका कहना है कि केवल सुन्दर शब्दों को एक साथ रख देने से काव्य नहीं हो जाता। काव्यत्व तो तब होगा जब वे सब एक वाक्य का रूप लेकर आएं और वाक्य भी रसात्मक होना चाहिए। रसात्मक के भीतर चारूत्व, दोषराहित्य, गुणों का समावेश और समुचित अलंकार विधान भी आ जाता है। दरअसल यहाँ पर आचार्य ने अपने से पूर्ववर्ती आचार्यों के मन्तव्यों का समावेश कर उसे रस से जोड़ कर काव्य तत्व के रूप में रसात्मकता को मान्यता दी, जो कि उचित ही था।

पंडितराज जगन्नाथ[सम्पादन]

"रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्" अर्थात् रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है। रमणीय का अर्थ वही पूर्ववर्ती रसात्मकता है। यहाँ जगन्नाथ की मौलिक स्थापना यह है कि काव्यत्व शब्द में निहित होता है न कि सम्पूर्ण वाक्य में। रमणीयता या चारूत्व की स्थिति शब्द में मानने के पीछे वेदांत दर्शन और व्याकरण को आधार बनाया गया है।

निष्कर्ष[सम्पादन]

उपर्युक्त सभी आचार्यों में मम्मट, विश्वनाथ तथा जगन्नाथ के लक्षण अधिक व्यवस्थित तथा भारतीय काव्य-लक्षण-अवधारणा के तीन चरण हैं। अदोषता, रसवत्ता एवं रमणीयता — इन तीन विशिष्टताओं से युक्त लक्षण प्रस्तुत कर संस्कृत-आचार्यों ने काव्य में भाव, कला एवं बुद्धि का समाहार किया है। हिंदी में रामचंद्र शुक्ल ने काव्य को परिभाषित करते हुए लिखा — "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं।" शुक्ल जी की यह परिभाषा बताती है कि भारतीय साहित्यशास्त्र व्यावहारिक एवं संतुलित है। रस से उसका अभिप्राय आनंदबोध अथवा सौंदर्यबोध से है। रमणीयता जीवन के उस तत्व का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें अलौलिक भावना का सौंदर्य निहित होता है जो लोकजीवन को प्रभावित करता है। जीवन का राग झंकृत करने वाले काव्य-लक्षण की प्रस्तुति भारतीय काव्यशास्त्र की उपलब्धि है, जिसमें उसके बाह्य एवं आंतरिक पक्षों का समन्वय हुआ है।