भारतीय काव्यशास्त्र/काव्य हेतु

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भारतीय काव्यशास्त्र
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काव्य हेतु किसी कवि की वह शक्ति है जिससे वह काव्य रचना में समर्थ होता है। इसके अंतर्गत काव्य-सृजन की विविध प्रक्रियाओं का विवेचन किया जाता है। काव्य हेतु में 'हेतु' का अर्थ 'कारण' होता है, अतः इसे काव्य रचना का कारण भी कह सकते हैं। काव्य हेतु को 'काव्य कारण' कहने की भी परंपरा रही है। आचार्य वामन ने काव्य हेतु की जगह 'काव्यांग' शब्द का प्रयोग किया है। मुख्यतः काव्य के तीन हेतु माने गए हैं - प्रतिभा, व्युत्पत्ति (निपुणता) और अभ्यास। भट्टतौत कवि की नवोन्मेषशालिनी बुद्धि (innovative mind) को प्रतिभा कहते हैं — 'प्रज्ञा नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता'।[१] अभिनवगुप्त के अनुसार अपूर्व वस्तु के निर्माण में सक्षम बुद्धि ही प्रतिभा है — 'प्रतिभा अपूर्व वस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा'।[२] इसके कारण कवि नवीन अर्थ से युक्त प्रसन्न पदावली की रचना करता है। व्युत्पत्ति बहुज्ञता अथवा निपुणता को कहते हैं। शास्त्र तथा काव्य के साथ लोकव्यवहार का गहन पर्यालोचन करने के पश्चात कवि में यह गुण समाहित होता है। काव्य रचना की बारंबार आवृत्ति ही अभ्यास है। इसके कारण कवि की रचना परिपक्व और ऊर्जस्वित होती जाती है।

भामह[सम्पादन]

काव्य रचना का मूल कारण या हेतु बताते हुए आचार्य भामह कहते हैं-

"गुरूपदेशादध्येतुं शास्त्रं जडधियोऽप्यलम्।
काव्यं तु जायते जातुं कस्यचित् प्रतिभावतः॥" (काव्यालंकार-१-१४)

अर्थात् गुरू के उपदेश से जड़ बुद्धि वाले के लिए भी शास्त्र अध्ययन करने के लिए सुलभ हो जाता है या उतना ही पर्याप्त होता है। लेकिन काव्य सृजन तो किसी प्रतिभावान की प्रतिभा से ही उत्पन्न होता है। बिना प्रतिभा के कोई भी काव्य रचना में समर्थ नहीं हो सकता है। आगे भामह ने प्रतिभा के परिष्कार और पोषण के लिए काव्य रचना के पहले कवि को यह निर्देश दिया है कि विधिवत् शब्द और अर्थ का निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। इसके लिए उसे शास्त्र ज्ञान, कोशगत अर्थ की जानकारी, छंदशास्त्र, व्याकरण और अपने से पहले के श्रेष्ठ कवियों की रचनाओं का भली भाँति अनुशीलन करना चाहिए, जिससे उसके द्वारा रचित काव्य न केवल सरसता व निर्दोषता से युक्त हो बल्कि उसकी रचना में नवीनता और अपूर्वता के गुण भी समाहित होते हैं।

दंडी[सम्पादन]

दंडी के अनुसार काव्यहेतु -

"नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतं च बहुनिर्मलम्।
अमन्दश्चाभियोगोऽस्याः कारणं काव्यसंपदः॥"(काव्यादर्श-१/१०३)

अर्थात् यहाँ पर दण्डी काव्य के प्रमुख हेतुओं पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि काव्य सम्पदा के कारणों में नैसर्गिक प्रतिभा, बहुत सारे शास्त्रों को सुनने से प्राप्त निर्मल बुद्धि और निरन्तर तीव्र अभ्यास आते हैं। काव्य रचना के लिए केवल प्रतिभा से कार्य नहीं होता बल्कि उसके साथ साथ अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं व शास्त्रों के सुनने-पढ़ने से उत्पन्न निर्मल बुद्धि की भी जरूरत होती है। काव्य सृजन के विविध प्रकारों और पद्धतियों की जानकारी के बिना उचित रूप में अभ्यास करने में कवि की प्रतिभा सफल नहीं हो सकती है। प्रतिभा के साथ निर्मल बुद्धि की आवश्यकता पर बल देने का कारण यह है कि यदि कवि की बुद्धि शुद्ध नहीं है तो वह अपनी प्रतिभा का दुरूपयोग भी कर सकता है या उसके भटकाव की भी संभावना हो सकती है। प्रतिभा का सही ढंग से उपयोग निर्मल बुद्धि ही कर सकती है। उदात्त और श्रेष्ठ कवि का अन्तःकरण अत्यधिक मात्रा में सत्व सम्पन्न या शुद्ध होता है। जिसके कारण वह अभ्यास में तीव्रगामी होता है और शीघ्र ही उत्तम कोटि के काव्य सृजन का सामर्थ्य हासिल कर लेता है।

वामन[सम्पादन]

वामन ने अपने ग्रन्थ 'काव्यालंकारसूत्रवृति' में काव्य-हेतु के लिए 'काव्यांग' शब्द का प्रयोग किया है। उनके अनुसार लोक, विद्या तथा प्रकीर्ण — ये तीन काव्य निर्माण की क्षमता प्राप्त करने के अंग हैं।

"लोको विद्या प्रकीर्णंच काव्यांगानि।" — काव्यालंकारसूत्रवृत्ति, १/३/१

प्रतिभा को जन्मजात गुण मानते हुए इसे प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया गया है — "कवित्त बीजम् प्रतिभानम्" प्रतिभा के अतिरिक्त वे लोकव्यवहार, शास्त्रज्ञान, शब्दकोश आदि की जानकारी को भी काव्य हेतुओं में स्थान देते हैं। ध्यातव्य है कि काव्यांग में वामन ने लोक तथा विद्या के पश्चात ही प्रतिभा को महत्व दिया है।

रुद्रट[सम्पादन]

इनके अनुसार काव्य के तीन कारण हैं — शक्ति (प्रतिभा), व्युत्पत्ति एवं अभ्यास। इन्होंने प्रतिभा के भी दो भेद किए हैं — सहजा तथा उत्पाद्या। सहजा कवियों में जन्मजात होती है एवं वही काव्य का मूल तत्व है। उत्पाद्या लोक-व्यवहार, शास्त्र अध्ययन एवं अभ्यास से उत्पन्न होती है।

आनंदवर्धन[सम्पादन]

काव्य का प्रमुख हेतु प्रतिभा (शक्ति) को मानते हुए आनंदवर्द्धन ने बताया कि प्रतिभारहित व्यक्ति कोई रचना नहीं कर सकता। प्रतिभा और व्युत्पत्ति में से वे प्रतिभा को ही श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं।

"न काव्यार्थ विरामोऽस्ति यदि स्यात् प्रतिभा गुणः।
सत्स्वपि पुरातन कविप्रबंधेषु यदि स्यात् प्रतिभागुण॥" — ध्वन्यालोक, ४/६

उनके अनुसार प्रतिभाशाली व्यक्ति में वर्ण्य-विषयों का अभाव नहीं होता, वह प्राचीन वर्णित विषयों में भी नए भाव भर देता है।

राजशेखर[सम्पादन]

इन्होंने माना कि "प्रतिभा व्युत्पत्ति मिश्रः समवेते श्रेयस्यौ इति" अर्थात् प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों समवेत रूप में काव्य के श्रेयस्कार हेतु हैं। राजशेखर प्रतिभा के दो भेद स्वीकारते है — कारयित्री एवं भावयित्री। कारयित्री प्रतिभा जन्मजात होती है तथा इसका सम्बन्ध कवि या रचनाकार से है। भावयित्री प्रतिभा का सम्बन्ध सहृदय पाठक या आलोचक से है। कारयित्री प्रतिभा भी तीन प्रकार की होती है — सहजा, आहार्या तथा औपदेशिकी। सहजा अर्थात् जो पूर्व जन्म के संस्कार से उत्पन्न होती है तथा इसमें जन्मांतर संस्कार की अपेक्षा होती है। आहार्या का उदय इसी जन्म के संस्कारों से होता है जबकि औपदेशिकी की उत्पत्ति मंत्र, तंत्र, देवता तथा गुरु आदि के उपदेश से होती है।

मम्मट[सम्पादन]

काव्य हेतु पर विचार करते हुए आचार्य मम्मट ने अपने से पहले और बाद के सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित मतों में सबसे अधिक सुव्यवस्थित, व्यापक और स्पष्ट विचार प्रकट किया है। काव्य प्रकाश में वह लिखते हैं —

"शक्तिर्निपुणता लोक काव्यशास्त्राद्यवे क्षणात्।
काव्यज्ञ शिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे॥ ( काव्य प्रकाश १/३ )

मम्मट ने माना है कि शक्ति (प्रतिभा) के अभाव में काव्य का प्रसार संभव नहीं। 'शक्ति कवित्व बीजरूपः यां बिना न काव्यं न प्रसरेत्।' काव्य के उद्भव या निर्माण में शक्ति (प्रतिभा), निपुणता, लोक-काव्य-शास्त्र आदि का अवलोकन, काव्य के जानकारों (कवि और काव्य के सिद्धांत की जानकारी रखने वाले लोगों) द्वारा प्राप्त शिक्षा के अनुसार अभ्यास प्रमुख हेतु या कारण होते हैं। मम्मट का दृष्टिकोण सबसे अधिक व्यापक और व्यावहारिक है। कवि की प्रतिभा, शास्त्र का ज्ञान और अभ्यास की चर्चा उनके पहले के आचार्य कर चुके थे। मम्मट की मौलिकता इस बात में है कि उन्होंने काव्य और शास्त्र के साथ साथ लोक के अवलोकन (Observation) को महत्व दिया और स्वतंत्र रूप से अभ्यास करने में समय व श्रम के अपव्यय को ध्यान में रखते हुए कवियों और आचार्यों के मार्गदर्शन में अभ्यास का निर्देश दिया है। शक्ति या प्रतिभा और निपुणता के साथ प्रामाणिक मार्गदर्शन जरूरी है। लोक, शास्त्र और काव्य के निरीक्षण करने के बाद पर्याप्त मात्रा में उचित विचार विमर्श के बाद काव्य रचना में प्रवृत्त होने का निर्देश देना मम्मट के आचार्यत्व का ही परिचायक नहीं है, अपितु इससे यह भी पता चलता है कि काव्य कर्म मात्र कौतुक क्रीड़ा या शब्द व्यापार न होकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरा कर्तव्य है। इसके पालन में सामर्थ्य हासिल करने के लिए प्रतिभा प्रबंधन व मार्गदर्शन आवश्यक है।

पंडितराज जगन्नाथ[सम्पादन]

इन्होंने प्रतिभा को ही एकमात्र काव्यहेतु स्वीकार किया। प्रतिभा के दो भेदों — कारयित्री एवं भावयित्री को मानते हुए भी इन्होंने केवल कारयित्री प्रतिभा को महत्व दिया। केवल प्रतिभा को ही काव्यहेतु मानने के कारण इन्हें 'केवल प्रतिभावादी' ("प्रतिभैवकेवला कारणम्") भी कहा जाता है। प्रतिभा के बारे में उनका मत है कि काव्य-रचना के अनुकूल शब्दार्थ की उपस्थितिमात्र करानेवाली क्षमता है — "सा च काव्यघटनानुकूलशब्दार्थोपस्थिति।" [३]। उन्होंने प्रतिभा के तीन विभाग किए — अदृष्ट, व्युत्पत्ति और अभ्यास। अदृष्ट प्रतिभा की उत्पत्ति देवकृपा, महापुरुष आदि के वरदान से होती है। किसी-किसी में व्युत्पत्ति एवं अभ्यास के अभाव में भी शैशवावस्था से काव्य-निर्माण की क्षमता आ जाती है। अतः व्युत्पत्ति एवं अभ्यास को काव्य का कारण न मानकर एकमात्र प्रतिभा को ही माना जा सकता है। जगन्नाथ ने यह भी माना है कि प्रतिभा की विविधता और विलक्षणता के कारण ही काव्य में विविधता और विलक्षणता आती है।

निष्कर्ष[सम्पादन]

उपर्युक्त जिन आचार्यों ने काव्यहेतु संबंधी मत व्यक्त किए हैं उनमें दो प्रकार के विचार दिखाई पड़ते हैं। एक मत के अनुसार प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास सम्मिलित रूप से काव्य के कारण हैं। इस विचार-वर्ग में रुद्रट तथा मम्मट का स्थान प्रमुख है। दूसरे मत के अनुसार काव्य का कारण केवल प्रतिभा है और व्युत्पत्ति एवं अभ्यास उसके संस्कारक या सहायक तत्व हैं। इस वर्ग के अंतर्गत राजशेखर तथा जगन्नाथ जैसे आचार्य प्रमुख हैं।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. भट्टतौत, काव्यकौतुक, पृष्ठ-२१२
  2. अभिनवगुप्त, ध्वन्यालोकलोचन, पृष्ठ-२९
  3. पंडितराज जगन्नाथ-रसगंगाधर, पृष्ठ—९