भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)/समवर्णिक छंद

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भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)
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भुजंगप्रयाग[सम्पादन]

यह एक समवर्णिक छंद है इसमें वर्णों की गणन्य होती है । प्रत्येक चरण में चार यगण (ऽऽ) के क्रम से 12 वर्ण होते है । अर्थात इसके प्रत्येक चरण चार यगण क्रम से होते है और एक चरण में बारह वर्ण होते हैं ।

परिभाषा - जिस समवर्णिक छंद के प्रत्येक चरण में चार यगण के क्रम से 12 वर्ण होते हैं , उसे भुजंगप्रयात छंद कहते हैं ।

उदाहरण-

बनाती रसोई सभी को खिलाती ,
इसी काम में आज मैं तृप्ति पाती ।
रहा किन्तु मेरे लिए एक रोना ,
खिलाऊँ किसे मैं अलोना - सलोना

(चार यगण)

द्रुतविलंबित[सम्पादन]

यह एक समवर्णिक छंद है। इस छंद के चार चरण होते है। तथा प्रत्येक चरण में नगण , दो भगण और रगण के क्रम से 12 वर्ण होते हैं।

परिभाषा- जिस समवर्णिक छंद में नगण, भगण, और रगण के क्रम से प्रत्येक चरण में 12 वर्णो का सयोजन होता है, उसे द्रुतविलंबित छंद कहते हैं।

उदाहरण

दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरुशिखा पर थी अब राजती,
कमलिनी - कुल वल्लभ की प्रभा

शिखरिणी[सम्पादन]

यह छंद समवर्णिक छंद है । इसके चार चरण होते है। इसमें वर्णो की गणना की जाती है । इसके प्रत्येक चरण में यगण , मगण , नगण , सगण , भगण , अंत में लघु और गुरु क्रम से 17 वर्ण होते हैं तथा इसके छठे अक्षर पर यति ( विराम ) होता है ।

परिभाषा - जिस समवर्णिक छंद के प्रत्येक चरण में यगण , भगण , नगण , सगण , भगण , अंत में लघु और गुरु के क्रम से 17 वर्ण होते हैं और छठे अक्षर पर यति होती है , उसे शिखरिणी छंद कहते हैं ।

उदाहरण

अनूठी आभा से,सरस सुषमा से सुरस से ।
बना जो देती थी बहु गुणत्मयी भू - विपिन को।

निराले फूलों की विविध बल बाली अनुपमा ।
जड़ी - बूटी नाना बहु फलवती विलसती ।

शार्दूलविक्रीड़ित[सम्पादन]

शार्दूलविक्रीड़ित छंद - यह समवर्णिक छंद हैं । इसके चार चरण होते हैं और इसमें वर्णो की गणना की जाती है । इसके प्रत्येक चरण में मगण , सगण , जगण , सगण , दो तगण और अंत मे एक गुरु के क्रम से 19 वर्ण होते हैं । इसमें 12 वें वर्ण पर यति ( विराम ) होता है ।

परिभाषा - जिस समवर्णिक छंद के प्रत्येक चरण में मगण , सगण , जगण , सगण , तगम, तगण , और अन्त में एक गुरु के क्रम से 19 वर्ण होते हैं , तथा 12 वें वर्ण पर यति होती है । उसे शार्दूलविक्रिड़ित छंद कहते हैं ।

उदाहरण

जैसे हो लघु वेदना हृदय की , औ दूर होवे व्यथा। पावें शांति समस्त लोग न जलें , मेरे वियोगग्नि में। ऐसे ही वर - ज्ञान तात ब्रज को , देना बताना किया।
माता का सतिवशेष तोष करना , और वृद्ध गोपेश का ।।

सवैया[सम्पादन]

सवैया छंद - यह छंद का एक स्वतंत्र प्रकार है । इसमें चार चरण होते हैं । इसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण तक का गण क्रम से संयोजन होता है । गण क्रम और वर्ण सयोंजन के आधार पर सवैया के कई भेद किए गए हैं । इसके भेद है - मदिरा , चकोर , मतगयंद या मालती , सुमुखि , किरीट , दुर्मिल , सुन्दरी आदि। इन सबमें मतगयंद सवैया का कवियो ने। सर्वाधिक प्रयोग किया है।

परिभाषा- जिस छंद के प्रत्येक चरण में सात भगण और दो गुरु के साथ 23 वर्ण होते हैं । उसे सवैया छंद कहते हैं । मतगयंद सवैया या मालती सबैया के प्रत्येक चरण में सात भगण और उसके बाद दो गुरु वर्ण होते हैं । इस प्रकार 23 वर्ण का संयोजन होता है , उसे मतगयन्द सवैया कहते हैं ।

उदाहरण-

सोबत सोबत सोइ गयो सठ रोवत रोवत कै बर रोयौ ।
गोवत गोवत गोइ घरो धन खोवत खोवत ते सब खोयौ ।
जोवत जोवत बीति गए दिन बोवत लै विष बोयौ ।
सुन्दर सुन्दर राम भजो नहि ढोबल ढोवत बोझहि ढोयौ ।

घनाक्षरी[सम्पादन]

घनाक्षरी छंद के प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं । और गणों का क्रम निश्चित नहीं होता तथा सोलहवें अक्षर पर यति होती है , धनाक्षरी का दूसरा नाम ' मनहरण ' भी है ।

परिभाषा - जिस छंद के प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते है और गणों का क्रम निश्चित नहीं वर्ण होते होता तथा सोलहवें अक्षर पर यति होती है , उसे घनाक्षरी छंद कहते हैं ।

उदाहरण

सुनसान कानन भयावह है ,चारों ओर
दूर - दूर साथी सभी हो रहे हमारे हैं
काँटे बिखरे हैं कहाँ जावें जहाँ पावें ठौर ,
छूट रहे पैरों से रुधिर के फुहारे हैं ।
आ गया कराल रात्रिकाल है अकेले यहाँ ,
हिस्व जन्तुओं के चिह्न जा रहे निहारे हैं ।
किसको पुकारे यहाँ रोकर अरण्य बीच ,
चाहे जो करो शरण्य शरणा तिहारे हैं ।