योग

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"जीवन जीने की सँयमी पद्धति ही 'योग' है!" —योगी कुमार प्रदीप.

"योग" भारत के छै:प्रमुख दर्शनों में से एक दर्शन है| इसका प्राचीनतम नाम राजयोग है| योग, परमर्षि कपिल मुनि रचित 'साँख्य दर्शन' का ही एक सरल व क्रियात्मक स्वरूप है| यह दर्शन विश्व के सभी धर्म, जाति-प्रजाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, मत-मतान्तर व ऊँच-नीच आदि के भेद-भाव से रहित है| यह सभी लिंग व आयु वर्ग के बच्चों, किशोर, युवाओं, अधेड़ व बृद्ध मनुष्यों का, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्ग दर्शन करने की क्षमता रखता है| अाध्यात्मिकता में रूची रखने वालों के लिए, 'आत्मा को परमात्मा से मिलाने का एक साधन है' तो भौतिकता को अपनाने वालों के लिए, 'मानवीय चैतन्य ऊर्जा को विश्व चैतन्य ऊर्जा से जोड़ने का साधन है| कुछ लोग इसे स्थूलता से सूक्षमता की ओर जाने का तरीका मानते हैं| मूलत: योग के दो आधार या दो पैर हैं- 1.अभ्यास, 2. ग्यानपूर्ण आचरण| इस पद्धति पर चलकर, निजी, सामाजिक, आध्यात्मिक व प्राकृतिक दुनियाँ के मानसिक, शारीरिक, सार्वजनिक स्वास्थ्य को मूलभूत रूप से श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। इसके अभ्यास से, लगभग सभी तरह की बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है| कालान्तर में, अभ्यासियों की योग्यता, क्षमता, रूचि व देश-काल-परिस्थितियों के अनुरूप, योग की अनेक शाखायें(पद्धतियाँ) विकसित हो गयीं जैसे- राजयोग, अष्टाँग योग, हठ योग, सँयम योग, कर्म योग, ग्यान योग, सहज योग, सहज राज योग, भक्ति योग, उपासना योग, तन्त्र योग, आदि| सभी शाखाओं का उद्देश्य या तो परमात्मा, ईश्वर, भगवान, अल्लाह, खुदा, प्रभु, GOD आदि नामों से जाने-पहचाने जाने वाली उस, अग्यात शक्ति को जानकर, उससे सम्बन्ध बनवाना है या अपने-अपने मानसिक-शारीरिक-सामाजिक स्वास्थ को ठीक करके, निरोगी काया व निरोगी समाज का निर्माण करना है| योग की सभी पद्धतियाँ, पुरूषार्थि/अभ्यासियों से, सामान्यत: कुछ विशेष आचरण की अपेक्षा रखती हैं, जैसे– 1. स्वयँ से व स्वयँ में सच्चाई व सफाई| 2. प्रकृति एवं जीव जगत प्रति

  कल्याणकारी, अपनत्व, ग्यान व 
  तालमेलपूर्ण सँयमी आचरण|

3. श्रेष्ठ मानवीय गुणों की धारणा| 4. निरन्तर परमात्मा/खुदा/GOD की याद में

  रहते हुऐ प्रत्येक कर्म करते रहना|

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