सामान्य अध्ययन २०१९/विज्ञान और प्रौद्योगिकी-विश्व

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सामान्य अध्ययन २०१९
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  • अकादमिक लोमोनोसोव (Akademik Lomonosov) रूस का आर्कटिक महासागर में तैरता हुआ पहला परमाणु रिएक्टर है,जिसे पर्यावरणविदों की चेतावनियों के बावजूद हाल हीं में लॉन्च किया गया। पर्यावरणविदों ने इस रिएक्टर की प्रभावशीलता को देखते हुए इसे ‘बर्फ पर चेर्नोबिल’ (Chernobyl on ice) और ‘परमाणु टाइटैनिक’ नाम दिया है।
पोर्टामेंटो
  • पोर्टामेंटो(Portamento) प्रभाव उत्पन्न करने वाले एक एल्गोरिथ्म का आविष्कार किया गया।यह वास्तविक समय में किसी भी दो ऑडियो सिग्नल के बीच उत्पन्न होता है।

संगीत या वाद्ययंत्रों के बजने के दौरान उनकी ध्वनियों में बदलाव को पोर्टामेंटो (Portamento) कहते हैं। संगीतकार इस शब्द का प्रयोग सैकड़ों वर्षों से कर रहे हैं। पोर्टामेंटो से संबंधित प्रयोगों में एल्गोरिथ्म ने मूल रूप से विभिन्न ऑडियो क्लिप जैसे कि एक पियानो की आवाज को मिला दिया गया। यह एल्गोरिथ्म इष्टतम परिवहन (Optimal Transport), जो सदियों पुरानी एक ज़्यामितीय-आधारित रूपरेखा है, पर निर्भर करता है। इस ज़्यामितीय-आधारित रूपरेखा में दो वस्तु-विन्यासों के बीच स्थानांतरित होने वाली ध्वनियों को दर्ज किया जाता है। यह एल्गोरिथ्म द्रव गतिकी (Fluid Dynamics), 3-डी मॉडलिंग और कंप्यूटर ग्राफिक्स आदि पर लागू किया गया है।

  • ग्लोब (Global Learning and Observations to Benefit the Environment-GLOBE) GLOBE कार्यक्रम का संचालन नासा द्वारा राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन,राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (National Oceanic and Atmospheric Administration-NOAA) के सहयोग से संचालित किया जाता है।

इसकी रूपरेखा वर्ष 1994 में तैयार की गई थी और इसे व्यापक रूप से वर्ष 1995 में शुरू किया गया था। वर्तमान में इस कार्यक्रम में 121 देश शामिल हैं। GLOBE एक अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान और शिक्षा कार्यक्रम है जो छात्रों और नागरिकों को डेटा संग्रहण और वैज्ञानिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर प्रदान करता है।

अंतरिक्ष विज्ञान[सम्पादन]

  • 23 दिसंबर,1672 को जियोवानी कैसिनी (Giovanni Cassini) द्वारा रिया उपग्रह की खोज की गई थी। रिया उपग्रह है। जियोवानी कैसिनी द्वारा खोजे गए चार उपग्रहों का नाम इस प्रकार है-
  1. आइपिटस (Iapetus)
  2. रिया (Rhea)
  3. टेथिस (Tethys)
  4. डायोन (Dione)

रिया (टाइटन के बाद शनि का दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह), टेथिस तथा डायोन की तरह स्थानबद्ध (Tidally Locked) है यानी इसका एक हिस्सा सदैव शनि के सम्मुख रहता है। रिया की औसत त्रिज्या 764 किमी है,जो पृथ्वी के लगभग 10वें हिस्से के बराबर है। रिया के मैदानों की औसत आयु लगभग चार बिलियन वर्ष है। वर्ष 2010 में, कैसिनी नामक एक अंतरिक्ष यान ने रिया के चारों ओर एक बहुत ही पतले वातावरण का पता लगाया जिसे बहिर्मंडल के रूप में जाना जाता है यह ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का मिश्रण है।कार्बन डाइऑक्साइड की उत्पत्ति का स्रोत निश्चित नहीं है परंतु माना जाता है कि ऑक्सीजन तब उत्पन्न होती है जब रिया शनि का चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव में आ जाता है। इस उपग्रह की सतह पर ऊर्जावान कणों की उपस्थिति है जो शनि के चुंबकीय क्षेत्र के संपर्क में आने पर रासायनिक अभिक्रियाएँ करते हैं जिससे इसकी सतह विघटित होती है और ऑक्सीजन का निर्माण होता है।

कैसिनी मिशन शनि और उसकी प्रणाली को देखने वाला पहला समर्पित अंतरिक्ष मिशन था। 15,अक्तूबर 1997 को नासा द्वारा इस मिशन को प्रारंभ किया गया तथा यह 15 सितंबर,2017 को समाप्त हो गया। इसका नामकरण 17वीं शताब्दी के खगोलशास्त्री जियोवानी कैसिनी (Giovanni Cassini) के नाम पर किया गया था। जियोवानी कैसिनी एक इटैलियन खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और इंजीनियर थे।
  • अमेरिकी कान्ग्रेस ने भारत के NAVIC उपग्रह को ‘संबद्ध नौवहन उपग्रह प्रणाली’ के रूप में यूरोपीय संघ के गैलीलियो (Galileo) और जापान के ‘QZSS’ के साथ नामित करने की सहमति दी है। इसे राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम (NDAA) 2020 के एक भाग के रूप में अनुमोदित किया गया है

यह अधिनियम रूस के ‘ग्लोनास’(GLONASS) और चीनी के ‘बेईदोऊ’(BeiDou) को "गैर-संबद्ध प्रणाली" के रूप में नामित करता है। इसका अर्थ है कि अमेरिकी उपग्रह नेविगेशन प्रणाली इन दो उपग्रह नेविगेशन प्रणालियों (रूस और चीन) के साथ डेटा का सह-संचालन या विनिमय नहीं करेगी। भारत की ‘NAVIC’ उपग्रह प्रणाली को एक "संबद्ध प्रणाली" के रूप में नामित करना,अमेरिका के ‘मल्टी-ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम रिसीवर’ के विकास के लिये एक प्रोटोटाइप कार्यक्रम विकसित करने का हिस्सा है।

नाविक (Navigation in Indian Constellation) आठ उपग्रहों की क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह आधारित स्वदेशी प्रणाली है जो अमेरिका के GPS की तरह कार्य करती है।

इसके माध्यम से स्थानीय स्थिति (Indigenous Positioning) या स्थान आधारित सेवा (Location Based Service- LBS) जैसी सुविधाएँ प्रदान की जा रही है। यह भारतीय उपमहाद्वीप पर 1,500 किलोमीटर के दायरे को कवर करता है।

  • एक विशाल ग्रह द्वारा सफेद बौने तारे (WDJ0914+1914) की परिक्रमा किये जाने का अप्रत्यक्ष प्रमाण मिला है।चिली में स्थापित एक विशाल दक्षिणी यूरोपीय वेधशाला द्वारा इन गैसीय डिस्क का पता लगाया गया। इस ग्रह को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकता, इस ग्रह के प्रमाण इसके वाष्पीकृत वातावरण में उपस्थित गैस की डिस्क (हाइड्रोजन, आक्सीजन, सल्फर) के रूप में मिले हैं। यह ग्रह प्रति 10 दिन में सफेद बौने तारे की एक बार परिक्रमा करता है।

पिछले दो दशकों से यह शोध किया जा रहा था कि ग्रहीय तंत्र, सफेद बौने तारों में भी संभव है। इस दिशा में पहली बार एक वास्तविक ग्रह खोजा गया है।

सफेद बौना तारा :-किसी तारे के केंद्र में मौजूद मज़बूत गुरुत्व के कारण कोर का तापमान और दबाव बहुत ही ज़्यादा रहता हैं। सफेद बौने तारों में उपस्थित हाइड्रोजन नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया में पूरी तरह से खत्म हो जाता है।

तारों में संलयन की प्रक्रिया ऊष्मा और बाहर की तरफ दबाव उत्पन्न करती है, इस दबाव को तारों के द्रव्यमान से उत्पन्न गुरुत्व बल संतुलित करता है। तारे के बाह्य कवच के हाइड्रोजन के हीलियम में परिवर्तित होने से ऊर्जा विकिरण की तीव्रता घट जाती है एवं इसका रंग बदलकर लाल हो जाता है। इस अवस्था के तारे को ‘लाल दानव तारा’ (Red Giant Star) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में अंततः हीलियम कार्बन में और कार्बन भारी पदार्थ, जैसे- लोहे में परिवर्तित होने लगता है।

यदि किसी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से कम या बराबर (चंद्रशेखर सीमा) होता है तो वह लाल दानव से ‘सफेद बौना’ (White Dwarf) और अंततः ‘काला बौना’ (Black Dwarf) में परिवर्तित हो जाता है।

चंद्रशेखर सीमा (Chandrashekhar Limit):-इसके अनुसार, सफेद बौने तारों के द्रव्यमान की ऊपरी सीमा सौर द्रव्यमान का 1.44 गुना है, इसको ही चंद्रशेखर सीमा कहते है। एस. चंद्रशेखर को वर्ष 1983 में नाभिकीय खगोल भौतिकी में डब्ल्यू. ए. फाउलर के साथ संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

  • चीनी वैज्ञानिकों द्वारा सूर्य से 70 गुना बड़े एलबी-1 ब्लैक होल (LB-1 Black Hole) की खोज की गई है।

मिल्की वे आकाशगंगा में लगभग 100 मिलियन तारकीय ब्लैक होल होने की संभावना है। वैज्ञानिकों के अनुसार, अभी तक मिल्की वे आकाशगंगा में कोई भी ब्लैक होल सूर्य से 20 गुना बड़ा नहीं है त्तथा LB- 1 द्रव्यमान अनुमानित से लगभग 2 गुना ज्यादा है। LB-1 ब्लैक होल का नामकरण चाइनीज विज्ञान अकादमी की राष्ट्रीय खगोलीय वेधशाला के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। यह पृथ्वी से लगभग 15000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर मिल्की वे आकाशगंगा में स्थित है। लाभ:-LB-1 का प्रत्यक्ष दर्शन यह साबित करता है कि अति-विशाल तारकीय ब्लैक होल की यह आबादी हमारी अपनी आकाशगंगा में भी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह खोज उन्हें बड़े ब्लैक होल बनने के मॉडल की फिर से जाँच करने के अध्ययन को चुनौती देगी।

  • यूरोपा उपग्रह की सतह पर जलवाष्प की उपस्थिति की खोज का वर्णन नेचर एस्ट्रोनोमी पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में किया गया है।

यह अध्ययन अमेरिका के हवाई द्वीप स्थित WM कीक वेधशाला (WM Keck Observatory) द्वारा किया गया है। जल की यह तरल अवस्था,यूरोपा उपग्रह पर मौजूद बर्फ की परत के नीचे उपस्थित है।

यूरोपा ब्रहस्पति ग्रह के 79 उपग्रहों में से एक है तथा यह 3.5 दिन में ब्रहस्पति की परिक्रमा पूरी करता है। यह सौर मंडल का 6वाँ सबसे बड़ा उपग्रह भी है।

इसका व्यास पृथ्वी के व्यास का एक चौथाई होने के बावजूद भी यहाँ उपलब्ध जल की मात्रा,पृथ्वी पर उपलब्ध जल की मात्रा से दोगुनी है। इसकी सतह पर बर्फ की अधिक मात्रा होने के कारण यह हमारे चंद्रमा की तुलना में सूर्य के प्रकाश का 5.5 गुना परावर्तित करता है। सूर्य के प्रकाश को यूरोपा तक पहुँचने में 45 मिनट लगते हैं।

  • नासा के न्यू हॉरिजन्स अंतरिक्षयान द्वारा खोजे गए सौर मंडल में सबसे दूर स्थित पिंड, अल्टिमा थुले (Ultima thule) का नाम परिवर्तित अरोकोथ (Arrokoth) कर दिया गया है।

यह पृथ्वी से अब तक का सबसे दूर स्थित आकाशीय बर्फीला पिंड है। अल्टिमा थुले प्लूटो से करीब एक बिलियन (1.6 बिलियन किलोमीटर) मील दूर है। इस कुइपर बेल्ट ऑब्जेक्ट को वर्ष 2014 में हबल स्पेस टेलीस्कोप द्वारा खोजा गया था। अभी तक आधिकारिक तौर पर इसे 2014 MU69 के रूप में जाना जाता था

  • नासा का वॉयजर-2 अंतरिक्षयान(NASA’s Voyager 2 spacecraft)सौरमंडल की परिधि (Heliosphere) के बाहर वायेजर-1 के बाद इंटरस्टेलर क्षेत्र में पहुँचने वाला दूसरा मानव निर्मित अंतरिक्षयान बन गया है। इससे यह ज्ञात हुआ है कि इस क्षेत्र में सौर हवाओं कि एक मज़बूत सीमा बनी हुई है।
वॉयजर-2 को 20 अगस्त,1977 को लाॅन्च किया गया था तथा इसके 16 दिन बाद 5 सितंबर,1977 को वॉयजर-1 लांच किया गया था।

अंतरिक्षयान पर लगे प्लाज़्मा तरंग यंत्र पर प्लाज़्मा घनत्व की रीडिंग के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वॉयजर-2 ने 5 नवंबर,2018 को इंटरस्टेलर क्षेत्र में प्रवेश किया था। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लाज़्मा का बढ़ा हुआ घनत्व इस बात की पुष्टि करता है कि अंतरिक्षयान सौर हवाओं के गर्म और कम घनत्व वाले प्लाज़्मा के घेरे से बाहर निकलते हुए ठंडे एवं अधिक प्लाज़्मा घनत्व वाले इंटरस्टेलर स्पेस में सफर कर रहा है।

वॉयजर-2 से मिले प्लाज़्मा घनत्व के आँकड़े वॉयजर-1 के घनत्व के आँकड़ों से मिलते हैं।
वॉयजर-1 और वॉयजर-2 ने अलग-अलग पथ से होते हुए सूर्य से लगभग बराबर दूरी पर इंटरस्टेलर क्षेत्र में प्रवेश किया। इससे पता चलता है कि हेलियोस्फेयर का आकार सममित (Symmetric) है।

हेलियोस्फेयर और इंटरस्टेलर सूर्य से बाहर की ओर बहने वाली हवाओं से सौरमंडल के चारों ओर एक बुलबुले जैसा घेरा बना हुआ है। इस घेरे को हेलियोस्फेयर और इसकी सीमा से बाहर के क्षेत्र को इंटरस्टेलर कहा जाता है।

  • कनाडा के मैकगिल विश्वविद्यालय (McGill University) के खगोलविदों ने पृथ्वी के वायुमंडल का एक फिंगरप्रिंट बनाया है, जिसका उद्देश्य बाह्य अंतरिक्ष में मानव के रहने अनुकूल ग्रहों का पता लगाना है। वायुमंडलीय फिंगरप्रिंट पर किये गए अध्ययन का निष्कर्ष रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी (Royal Astronomical Society) नामक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित किया गया। वायुमंडल में गैसों की की संरचना से एक जैवहस्ताक्षर (Biosignatures) तैयार किया गया। इस प्रकार के
जैवहस्ताक्षर (Biosignatures) जैसे संकेतकों के माध्यम से किसी बाह्य ग्रह के वायुमंडल का अध्ययन किया जाएगा जिसकी सहायता से वहाँ मानव जीवन के अनुकूल परिस्थितियों का बता लगाया जाएगा।
  • जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को वर्ष 2021 में TRAPPIST-1 सौरमंडल पर जीवन की तलाश हेतु लॉन्च किया जाएगा। इस सौरमंडल के ग्रह एक ऐसे लाल बौने तारे (TRAPPIST-1A) की परिक्रमा कर रहे हैं जो हमारे सूर्य से छोटा और ठंडा है।

TRAPPIST-1 सौरमंडल पृथ्वी से लगभग 40 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है इसमें सात ग्रह क्रमशः TRAPPIST-1 b, c, d, e, f, g, h हैं। इन ग्रहों का आकार पृथ्वी के समान है। सात में से तीन ग्रहों TRAPPIST-1 e, f, g के गोल्डीलॉक्स ज़ोन (Goldilocks Zone) में होने की संभावना है। TRAPPIST-1A लाल बौना तारा बेहद सक्रिय है जिसमें से पृथ्वी के अरोरा के समान भारी मात्रा में उच्च ऊर्जा वाले प्रोटॉन (Protons) का उत्सर्जन हो रहा है। इससे TRAPPIST-1 सौरमंडल में उच्च ऊर्जा वाले प्रोटॉन (Protons) पाये जा रहे हैं।

  • अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी बोइंग ने नासा (NASA) के वाणिज्यिक क्रू कार्यक्रम (Commercial Crew Programme- CCP) के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में वैज्ञानिकों के आवागमन के लिये C.S.T-100 स्टारलाइनर क्रू कैप्सूल नामक अंतरिक्षयान की मानवरहित उड़ान का पहला सफल परीक्षण किया है।
  • ‘स्पेसकॉम’ अंतरिक्ष युद्ध के लिये समर्पित एक स्पेस कमांड (Space Command) है। अमेरिका द्वारा अंतरिक्ष में चीन और रूस से होने वाले खतरों से बचाव हेतु की गई है। यह पेंटागन का 11वाँ पूर्ण कमांड और बीते दो वर्षों में स्थापित होने वाला दूसरा कमांड है। इससे पूर्व वर्ष 2018 में साइबर युद्ध के खतरों को देखते हुए एक कमांड की स्थापना की गई थी।
  • वारविक विश्वविद्यालय (Warwick University) के खगोलविदों ने पहली बार श्वेत वामन तारों (White Dwarf Stars) के क्रिस्टल के रूप में जमने के प्रत्यक्ष प्रमाण पाए हैं। ये तारे ब्रह्मांड के प्राचीनतम तारकीय पिंडों में से एक हैं। वे खगोलविदों के लिये उपयोगी होते हैं क्योंकि उनका पूर्वानुमानित जीवन चक्र पड़ोसी तारा समूहों की आयु का अत्यंत सटीकता से अनुमान लगाने के लिये उनका ब्रह्मांडीय घड़ियों के रूप में उपयोग का अवसर देता है।
  • Bedin 1 नई वामन आकाशगंगा (dwarf galaxy) है जिसकी खोज NASA/ESA के हबल स्पेस टेलीस्कोप की सहायता से की गई। यह आकाशगंगा लगभग 30 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर है और इसे वामन गोलाकार आकाशगंगा के रूप में वर्गीकृत किया गया है क्योंकि यह अपनी अधिकतम सीमा के साथ मात्र लगभग 3,000 प्रकाश वर्ष दूर है और हमारी आकाशगंगा ‘मिल्की वे’ (Milky Way) की तुलना में इसका प्रकाश लगभग एक हज़ार गुना मंद है।
  • कॉर्नेल विश्वविद्यालय (Cornell University) के खगोलविदों के एक दल ने NASA के ट्रांज़िटिंग एक्सोप्लेनेट सर्वे सैटेलाइट (Transiting Exoplanet Survey Satellite- TESS) का उपयोग करके हमारे सौरमंडल के बाहर पहले संभावित वासयोग्य ग्रह का पता लगाया है। इस बाह्य ग्रह (Exoplanet) का नाम G1 357d रखा गया है। यह पृथ्वी की तुलना में बहुत बड़ा है और पृथ्वी से लगभग 31 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है।
  • अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) वर्ष 2019 में अपनी 100वीं वर्षगाँठ मना रहा है। यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी नहीं है। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से अनुसंधान,संचार,शिक्षा और विकास सहित सभी पहलुओं में खगोलीय विज्ञान को बढ़ावा देना और संरक्षोपाय करना है।

IAU की दीर्घकालिक नीति का निर्धारण महासभा द्वारा किया गया है। इस महासभा का आयोजन प्रत्येक 3 साल में एक बार किया जाता है। इसका हालिया आयोजन वर्ष 2018 में वियना में किया गया था। यह एक वैश्विक प्राधिकरण है जो सौर प्रणाली में ग्रहों की विशेषताओं का नामकरण करता है। IAU के अन्य कार्यों में मौलिक खगोलीय और भौतिक स्थिरांक तथा अस्पष्ट खगोलीय नामकरण को परिभाषित करना शामिल है। इस संघ का उद्देश्य खगोल विज्ञान को बढ़ावा देना है। खगोलीय संघ द्वारा दिये गये नाम ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य होते हैं। भारत वर्ष 1964 में इस संघ में शामिल हुआ था।

  • कॉस्मिक येती (Cosmic YETI)प्रारंभिक समय के ब्रह्मांड की एक विशालकाय आकाशगंगा के चिह्न।इस प्रकार के चिह्न पहले कभी नहीं देखे गए।इसके अस्तित्व के साक्ष्यों की कमी के कारण खगोलविद इन्हें लोक कथाओं से संबंधित मानते थे।
संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के खगोलविदों ने पहली बार ऐसी आकाशगंगा की तस्वीर खींचने में सफलता प्राप्त की है।

हाल ही के अध्ययन में पाया गया कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ी आकाशगंगाओं में से कुछ बहुत तेज़ी से परिपक्व हुईं हैं जिन्हें अभी तक सैद्धांतिक रूप से नही समझा गया है। यह नई खोज ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित कारकों का पता लगाने में मददगार साबित होगी। खगोलविदों का मानना है कि इस आकाशगंगा से प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग 12.5 बिलियन वर्ष लगे हैं। यह खोज अटाकामा लार्ज मिलीमीटर ऐरे (Atacama Large Millimeter Array- ALMA) द्वारा की गई है।

अटाकामा लार्ज मिलीमीटर ऐरे (Atacama Large Millimeter Array- ALMA)को कनाडा,ताइवान और दक्षिणी कोरिया के साथ यूरोपीय दक्षिणी वेधशाला (European Southern Observatory- ESO), संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन (National Science Foundation- NSF) तथा जापान के राष्ट्रीय प्राकृतिक विज्ञान संस्थान (National Institutes of Natural Sciences- NINS) के सहयोग से चिली में स्थापित किया गया है।

ALMA एक एकल दूरबीन है जो 66 सुस्पष्ट एंटीना के साथ उत्तरी चिली के चज़नंतोर पठार (Chajnantor plateau) पर अवस्थित है।

  • स्मार्ट ड्रैगन (Smart Dragon-SD) चीन की वाणिज्यिक वाहक रॉकेटों की नई पीढ़ी। हाल में अनावरण किये गये इस ठोस ईंधन संचालित रॉकेट के माध्यम से 1.5 टन तक के पेलोड को प्रक्षेपित किया जा सकता है। यह स्मार्ट ड्रैगन-1,2,3 लॉन्च वाहनों से बना है।
वाणिज्यिक रॉकेटों के अनुसंधान के क्षेत्र में चीन नवाचार और क्षमता निर्माण तथा पुन: प्रयोज्य लॉन्च वाहनों के विकास के लिये चरणबद्ध तरीके से जनता से 10 बिलियन युआन जुटाएगा ।
इसका उद्देश्य घरेलू और वैश्विक वाणिज्यिक अंतरिक्ष प्रक्षेपण की बढ़ती क्षमता का लाभ उठाना है।

भारत के लिये चिंताएँ:-वर्तमान में भारत का वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग चीन से बेहतर स्थिति में है। चीन के इस प्रकार के परीक्षण से भारत के लिये कठिन चुनौती उत्पन्न होगी।

  • शनि ग्रह(Saturn) के 20 नए उपग्रहों की खोज के बाद अब इसके उपग्रहों की संख्या 82 हो गई है। शनि अब सौरमंडल का सबसे अधिक उपग्रहों वाला ग्रह हो गया है। इस खोज के पहले तक सौरमंडल में सबसे अधिक 79 उपग्रह बृहस्पति के थे।

शनि के खोजे गए 20 नए उपग्रह माइनसक्यूल (Minuscule) हैं और इनका अधिकतम व्यास लगभग 5 किमी. है।

शनि के नए उपग्रहों में से 17 उपग्रह, ग्रह के विपरीत या प्रतिगामी दिशा में परिक्रमण कर रहे हैं।
ये उपग्रह शनि से इतनी दूर हैं कि इनको ग्रह की एक बार परिक्रमा करने में 2 से 3 वर्ष का समय लगता है।
वैज्ञानिकों की टीम ने हवाई स्थित दूरबीन के माध्यम से एक विस्तृत विश्लेषण के बाद इन उपग्रहों की खोज की। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अभी और 100 टिनियर (Tinier) उपग्रह (छोटे आकर के उपग्रह) शनि की परिक्रमा कर रहे हैं लेकिन इनको खोजा नहीं जा सका है।
  • TESS, मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MIT) के नेतृत्व में एक नासा मिशन है, जो बाह्यग्रहों की खोज के लिये एक संपूर्ण-आकाशीय सर्वेक्षण है।

नासा ने लगभग एक दशक से कार्यरत केप्लर अंतरिक्ष दूरबीन को पृथ्वी से दूर अपनी वर्तमान सुरक्षित कक्षा में कार्य-मुक्त करने का निर्णय लिया है। इस टेलीस्कोप में अब आगे के वैज्ञानिक संचालनों के लिये आवश्यक ईंधन नहीं है। TESS को अप्रैल 2018 को स्पेस कैन फाल्कन 9 रॉकेट द्वारा केप कैनावेरल से लॉन्च किया गया था जो केप्लर का स्थान लेगा। नासा के ट्रांज़िटिंग एक्सोप्लेनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) ने अब तक के सबसे छोटे ग्रह को खोज निकाला है जो पृथ्वी और मंगल के आकार के बीच है और इसे L98-59b नाम दिया गया है। यह ग्रह TESS के पिछले रिकॉर्ड से 105 गुना छोटा है।

  • नेपच्यूनियन रेगिस्तान सितारों के समीप स्थित क्षेत्र है जहाँ कोई नेपच्यून आकार के ग्रह नहीं पाए जाते हैं।

इस क्षेत्र को तारों से मज़बूत विकिरण प्राप्त होते हैं। यहाँ मौज़ूद ग्रह अपने गैसीय वातावरण को बरकरार नहीं रखते हैं क्योंकि वे सिर्फ एक चट्टानी कोर को छोड़कर वाष्पित हो जाते हैं।

सैजिटेरियस A*ब्लैकहोल सिमुलेशन
  • सैजिटेरियस A* (Sagittarius A*)

पृथ्वी से 26,000 प्रकाश वर्ष दूर एक आकाशगंगा के केंद्र में स्थित इस ब्लैकहोल की खोज 24 वर्ष पहले की गई थी इसके बाद से यह काफी शांत था। वर्ष 2019 में इसमें कुछ असामान्य गतिविधियांँ देखी गई हैं, जैसे- इसके आस-पास का क्षेत्र सामान्य से बहुत ज़्यादा चमकदार हो गया है। किसी ब्लैकहोल द्वारा स्वयं प्रकाश का उत्सर्जन नहीं किया जाता है, लेकिन यह प्रकाश को अवशोषित कर सकता है। इस ब्लैकहोल के आसपास के क्षेत्र में अधिक चमक का कारण अंतरिक्ष में स्थित एक तारे S0-2 के प्रकाश को बताया जा रहा है। इस तारे का प्रकाश बड़ी मात्रा में पिछले वर्ष ब्लैकहोल के करीब पहुंँचा था। वैज्ञानिकों द्वारा इस ब्लैकहोल के आकार के बढ़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

  • K2-18b बाह्यअंतरिक्ष में पृथ्वी से 110 प्रकाश वर्ष दूर तथा पृथ्वी के द्रव्यमान से आठ गुना अधिक बड़ा ग्रह है। जहाँ पर निवास के लिये आवश्यक परिस्थितियाँ जैसे- पानी और सामान्य तापमान के होने की संभावना है।

K2-18b से संबंधित यह अध्ययन नेचर एस्ट्रोनॉमी ( Nature Astronomy) नमक जर्नल में प्रकाशित किया गया। खगोलविदों ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप द्वारा वर्ष 2016 और 2017 में एकत्र किए गए डेटा का उपयोग करते हुए K2-18b के वातावरण से फिल्टर हुए प्रकाश (Starlight) का विश्लेषण करने के लिये ओपन-सोर्स एल्गोरिदम विकसित किया। इस अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, इस ग्रह पर जलवाष्प की उपस्थिति की संभावनाएँ है। जलवाष्प की उपलब्धता से इस ग्रह के वायुमंडल में हाइड्रोजन और हीलियम की उपस्थिति की संभावना व्यक्त की जा रही है। इस ग्रह के वायुमंडल में नाइट्रोजन और मीथेन सहित अन्य अणुओं के मौजूद होने की भी संभावना है लेकिन इसको लेकर किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं एकत्र की जा सकी है।

गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग
  • गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग(Gravitational Lensing)-नासा के जेम्स वेब स्पेस (James Webb) टेलीस्कोप को मशीन के रूप में उपयोग करते हुए, शोधकर्त्ता यह जाँचने की योजना बना रहे हैं कि नए सितारे कैसे पैदा होते हैं। इसके लिये वे ‘गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग’ नामक एक प्राकृतिक घटना की मदद लेंगे।

यह घटना तब घटित होती है जब भारी मात्रा में पदार्थ, जैसे कि एक विशाल आकाशगंगा या आकाशगंगाओं का समूह, एक गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र बनाता है जो अपने पीछे की वस्तुओं के प्रकाश को बढ़ाता और विकृत करता है। ये प्राकृतिक ब्रह्मांडीय दूरबीन हैं; जिन्हें गुरुत्वाकर्षण लेंस कहा जाता है। ये विशाल आकाशीय पिंड होते हैं और दूर की ऐसी आकाशगंगाओं के प्रकाश का आवर्द्धन करते हैं जो कि तारे के निर्माण के चरम पर या उसके निकट हैं। यह प्रभाव शोधकर्त्ताओं को दूर स्थित आकाशगंगाओं का अध्ययन करने में मदद करता है जिन्हें सबसे शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीनों से देखा जा सकता है। गुरुत्वीय लेंसिंग अंतरिक्ष में किसी बड़ी वस्तु के उस प्रभाव को कहते हैं जिसमें वह वस्तु अपने पास से गुज़रती प्रकाश की किरणों को मोड़कर एक लेंस जैसा काम करती है। भौतिकी के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की वजह से कोई भी वस्तु अपने आसपास के व्योम (‘दिक्-काल’ या स्पेस-टाइम) को मोड़ देती है और बड़ी वस्तुओं में यह झुकाव अधिक होता है।

  • भूकंपीय जाँच, जिओडेजी और हीट ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करने के लिये आंतरिक अन्वेषण (InSight) मिशन एक मार्स लैंडर है जिसे मंगल के आंतरिक हिस्से के अन्वेषण के लिये डिज़ाइन किया गया है। यह एक प्रथम वाह्य अंतरिक्ष रोबोटिक अन्वेषक है जो मंगल के आंतरिक हिस्सों, इसकी पर्पटी, आवरण और भीतरी भाग का सघन अध्ययन करेगा।

इनसाइट मार्स लैंडर मई 2018 में नासा द्वारा लॉन्च किया गया था और 26 नवंबर, 2018 को यह मंगल पर पहुँचा तथा इसने एक भूकंपमापीय जिसे सेस्मिक एक्सपेरिमेंट फॉर इंटीरियर स्ट्रक्चर(SEIS) कहा जाता है, को मंगल पर भूकंप का पता लगाने और मंगल की आंतरिक संरचना का विश्लेषण करने के लिये वहाँ पर परिनियोजित किया। एक क्षीण भूकंपीय सिग्नल जिसे एक लघु मंगल भूकंप कहा जाता है, 6 अप्रैल, 2019 को इनसाइट लैंडर द्वारा मापा और रिकॉर्ड किया गया। यह पृथ्वी और चंद्रमा के बाहर किसी ग्रह में पहली बार रिकॉर्ड की गई भूकंपीय गतिविधि थी।

  • भारत, फैसिलिटी फॉर एंटीप्रोटोन आयन रिसर्च (FAIR) के संस्थापक सदस्यों में से एक है FAIR पदार्थ के मूलभूत कणों तथा ब्रह्मांड के विकास का अध्ययन करने के लिये जर्मनी में बनाया जा रहा है।FAIR तारों के भीतरी भाग और ब्रह्मांड के प्रारंभिक चरण के अंदर दशाओं की नकल हेतु उच्च शक्ति के सटीक और अनुकूल आयन बीमों का प्रयोग करेगा।

पारंपरिक परमाणु रिएक्टर ऊर्जा पैदा करने हेतु भारी अणुओं जैसे-प्लूटोनियम को तोड़ने के लिये विखंडन (Fission) का प्रयोग करते हैं। संलयन (Fusion) रिएक्टर जैसे इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (ITER) स्वच्छ हरित ऊर्जा प्राप्त करने के लिये रेडियोएक्टिव पदार्थ के बजाय हल्के तत्त्वों जैसे- हाइड्रोजन और हीलियम का प्रयोग करेंगे। फ्राँस में बनाया जा रहा ITER का वित्तीयन सात देशों द्वारा किया जा रहा है। अतः युग्म 3 सही सुमेलित है। थर्टी मीटर टेलीस्कोप (TMT) उत्तरी गोलार्द्ध में विश्व का सबसे बड़ा ऑप्टिकल एवं इंफ्रारेड टेलीस्कोप है जो हवाई में कनाडा, चीन, भारत, जापान और अमेरिका द्वारा बनाया जाएगा। TMT वैज्ञानिकों को दूर के धुँधले पदार्थों के अध्ययन और ब्रह्मांड का विकास किस तरह हुआ, इस पर प्रकाश डालने में सक्षम बनाएगा। स्क्वेयर किलोमीटर अर्रे (SKA) एक रेडियो टेलीस्कोप परियोजना है जिसे ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में बनाया जाना प्रस्तावित है। यदि यह बन गया तो इसका कुल कलेक्टिंग एरिया लगभग एक स्क्वेयर किलोमीटर होगा।

  • हीलियम हाइड्राइड - हीलियम और हाइड्रोजन का संयोजन है जिसकी खोज नासा के स्ट्रैटोस्फेरिक वेधशाला इन्फ्रारेड एस्ट्रोनॉमी (SOFIA) द्वारा पृथ्वी से लगभग 3,000 प्रकाश-वर्ष की दूरी पर की गई थी।

वैज्ञानिकों ने एक प्रकार के अणु का पता लगाया है जो ब्रह्मांड में बनता है, यह हीलियम और हाइड्रोजन का एक संयोजन है जिसे हीलियम हाइड्राइड कहा जाता है। इसे एक ग्रहीय निहारिका NGC-7027 में तारामंडल साइग्नस के पास देखा गया ।

  • इन्फ्रारेड एस्ट्रोनॉमी के लिये स्ट्रैटोस्फेरिक ऑब्जर्वेटरी (SOFIA) एक बोइंग 747SP विमान है, जिसे 2.7 मीटर (106 इंच) की रिफ्लेक्टिंग टेलीस्कोप ( Reflecting Telescope) को रखने के लिये संशोधित किया गया है (जिसका प्रभावी व्यास 2.5 मीटर या 100 इंच है)। 38,000-45,000 फीट पर समतापमंडल में उड़ान भरने से पृथ्वी के 99% अवरक्त-अवरुद्ध वातावरण के ऊपर SOFIA लगा होता है, जिससे खगोलविदों को सौर प्रणाली का अध्ययन करने और उन तरीकों से परे अध्ययन करने की अनुमति मिलती है जो जमीन-आधारित दूरबीनों से संभव नहीं हैं।

SOFIA नासा और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर (DLR) के बीच एक साझेदारी के माध्यम से संचालित है। प्रत्येक उड़ान के बाद SOFIA भूमि पर वापस आ जाएगा इसलिये इसके उपकरणों का आदान-प्रदान किया जा सकता है, नई तकनीकों का उपयोग करने के लिये इसे अपडेट किया जा सकता है। चूँकि इन नए उपकरणों का परीक्षण और समायोजन किया जा सकता है, इसलिये SOFIA सौर प्रणाली में और उससे आगे के नए मोर्चे का पता लगा सकता है और प्रौद्योगिकी के लिये एक परीक्षण के रूप में काम कर सकता है।

  • सैटेलाइट विद एआरजीओएस एंड एएलटीआईकेए (SARAL) समुद्र के वैज्ञानिक अध्ययन के लिये भारत-फ्राँस का संयुक्त सैटेलाइट मिशन है।

ka-बैंड अल्टीमीटर, एएलटीआईकेए एंड एआरजीओएस डेटा कलेक्शन सिस्टम फ्राँसीसी नेशनल स्पेस एजेंसी – सीएनईएस द्वारा बनाया गया है। पेलोड समुद्र वैज्ञानिक एप्लीकेशन के लिये है। सॉलिड स्टेट सी-बैंड ट्रांसपोंडर (SCBT) इसरो का है और ग्राउंड रडार कैलिब्रेशन के लिये है। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल रॉकेट द्वारा सन सिनक्रोनस ऑरबिट (SSO) में मिशन लॉन्च किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अंतरिक्ष यान के प्लेटफ़ॉर्म, लॉन्च एवं संचालन के लिये उत्तरदायी था। सरल (Saral) अल्टिमेट्रिक माप निष्पादित करता है, समुद्री विस्तार और समुद्री सतह में वृद्धि का अध्ययन करता है।

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप(James Webb Space Telescope) को JWST या वेब्ब भी कहा जाता है) 6.5 मीटर प्राथमिक प्रतिबिंब के साथ एक बड़ा अवरक्त दूरबीन है जिसे 2021 में फ्रेंच गुयाना से एरियन 5 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया जाएगा। यह हमारे ब्रह्मांड के इतिहास में हुए हर चरण का अध्ययन करेगा, साथ ही बिग-बैंग के बाद पहली चमकदार उद्वीप्ति के विस्तार, सौरमंडल के गठन, पृथ्वी जैसे जीवन जीने में सक्षम ग्रहों और हमारे अपने सौर मंडल के विकास का विस्तृत अध्ययन करेगा। यह नासा (NASA), यूरोपियन स्पेस एजेंसी (European Space Agency-ESA) और कनाडाई स्पेस एजेंसी (Canadian Space Agency-CSA) के बीच एक अंतरराष्ट्रीय मिशन है।

  • पर्सेइड उल्कापिंडों की बौछार 17 जुलाई,2019 से सक्रिय है, इसे 26 अगस्त, 2019 तक देखा जा सकता है। प्रत्येक वर्ष 17 जुलाई से 24 अगस्त के दौरान हमारी पृथ्वी स्विफ़्ट टटल धूमकेतु के पास से गुज़रती है।

स्विफ़्ट टटल धूमकेतु ही पर्सेइड उल्कापिंडों की बौछार का प्रमुख कारण है। स्विफ्ट टटल धूमकेतु के छोटे अंश/भाग तेज़ी से घूमते पर्सेइड उल्का के रूप में पृथ्वी के ऊपरी वातावरण में 2 लाख, 10 हज़ार किलोमीटर प्रति घंटे की गति से घूमते हैं जो रात्रि के समय आकाश में तीव्र चमक के साथ बौछार करते नज़र आते हैं। स्विफ़्ट टटल धूमकेतु एक विकेंद्री (अव्यवस्थित केंद्रक के साथ) अंडाकार कक्षा में परिक्रमा करता है जो लगभग 27 किलोमीटर चौड़ी होती है। जब यह सूर्य से अधिकतम दूरी पर होता है तो प्लूटो की कक्षा के बाहर होता है तथा जब सूर्य के बहुत नज़दीक होता है तो पृथ्वी की कक्षा के अंदर होता है। यह 133 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है। उल्कापात आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का (meteor) या 'टूटते हुए तारे' कहते हैं। उल्काओं का जो अंश/भाग वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड (meteorite) कहते हैं। प्रायः प्रत्येक रात्रि को उल्काएँ अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरनेवाले पिंडों की संख्या काफी कम होती है। हालाँकि वैज्ञानिक दृष्टि से ये उल्कापिंड काफी महत्त्वपूर्ण होते हैं। अति दुर्लभ होने के साथ-साथ आकाश में विचरते हुए विभिन्न ग्रहों इत्यादि के संगठन एवं संरचना के ज्ञान के प्रत्यक्ष स्रोत भी केवल ये ही पिंड हैं। इस प्रकार ये पिंड ब्रह्माण्ड विद्या तथा भू-विज्ञान के बीच संपर्क स्थापित करने में सहायक हो सकते हैं।

  • सुपर-अर्थ’: GJ 357d धरती से करीब 31 प्रकाश वर्ष दूर स्थित ग्रह हमारे सौरमंडल

नासा के ट्रांज़िटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (NASA's Transiting Exoplanet Survey Satellite, TESS) ने एक वाह्य दुनिया की खोज की है जहाँ जीवन की सम्भावना जताई जा सकती है। यह के बाहर मिला है। जो हमारी है। इस ‘सुपर अर्थ’ (Super Earth) ग्रह को जीजे 357-डी (GJ 357d) नाम दिया गया है। इस ग्रह की खोज इस साल की शुरूआत में नासा के सैटेलाइट से की गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक उत्साहजनक खोज है कि पृथ्वी के समीप पहला सुपर अर्थ मिला है।

  • होप प्रोब(Hope Probe) संयुक्त अरब अमीरात ने जुलाई वर्ष 2020 में मंगल ग्रह पर अरब देशों के पहले अंतरिक्ष यान ‘होप प्रोब’ लॉन्च किये जाने की घोषणा की है।

यह अंतरिक्ष कार्यक्रम एमिरेट्स मार्स मिशन (Emirates Mars Mission- EMM)) के नाम से जाना जाएगा। इस मिशन का उद्देश्य मंगल ग्रह के वायुमंडल की ऊपरी सतह की जानकारी एकत्र करना है। इसके तहत पानी के मुख्य घटक हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन गैसों के घटते स्तर का अध्ययन किया जाएगा। संभवतः यह लाल ग्रह यानी मंगल की सतह की तस्वीर धरती पर भेजने वाला अंतरिक्ष में पहला खोजी अभियान हो सकता है।

  • आर्टेमिस कार्यक्रम (Artemis Programme)

20 जुलाई 2019 के ऐतिहासिक दिवस पर नासा ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘आर्टेमिस’ (Artemis) की जानकारी दी। आर्टेमिस कार्यक्रम के माध्यम से NASA पहली बार एक महिला को चंद्रमा पर भेजने की योजना बना रहा है। इसके अलावा इस कार्यक्रम में एक अन्य व्यक्ति को भी चंद्रमा पर भेजने की योजना बनाई जा रही है। आर्टेमिस नाम अपोलो (Apollo) की जुड़वां बहन के नाम पर रखा गया है। ग्रीक पौराणिक कथाओं के कथाओं के अनुसार,अपोलो प्रकाश, कविता, नृत्य, संगीत, चिकित्सा, भविष्यवाणी और खेल के देवता थे। इनके नाम पर ही NASA ने अपने चंद्र मिशन का नाम Apollo रखा था। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर जाने का कार्यक्रम वर्ष 2024 तक शुरू किये जाने की योजना है। नासा के इस मिशन का उद्देश्य चंद्रमा के उन क्षेत्रों के बारे में जानकारी एकत्र करना है जिनके बारे में अभी तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है इससे अन्य ग्रहों जैसे मंगल पर जाने के नए रास्ते भी प्राप्त हो सकते हैं।

  • 20 जुलाई-नेशनल मून डे (National Moon Day)[१]

वर्ष 1969 में चंद्रमा पर पहली बार चहलकदमी करने वाले व्यक्ति एवं उनकी उपलब्धियों के सम्मान में मनाया जाता है।वर्ष 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस दिवस को पहली बार मनाया था। अपोलो 11 मिशन 16 जुलाई, 1969 को लॉन्च किया गया था। इसकी चंद्रमा पर लैंडिंग 20 जुलाई को ही हुई थी। अपोलो 11 मिशन के तहत दो अमेरिकी व्यक्ति नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन चंद्रमा पर उतरे। नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा की सतह पर कदम रखा और अंतरिक्ष यान के बाहर लगभग ढाई घंटे बिताए। एल्ड्रिन ने आर्मस्ट्रांग की तुलना में चंद्रमा पर कम समय बिताया, हालाँकि उन्होंने चंद्रमा की सतह से लगभग 47.5 पाउंड चंद्र सामग्री एकत्र की (पृथ्वी पर अध्ययन हेतु लाने के लिये)।

अपोलो 11(Apollo 11)

16 जुलाई, 2019 को अपोलो 11 (चंद्रमा पर उतरने वाला पहला मानवयुक्त मिशन) के 50 वर्ष पूरे हुए। इस मिशन की शुरुआत 16 जुलाई, 1969 को हुई थी। अपोलो मिशन को चंद्रमा पर मनुष्यों को उतारने और उन्हें सुरक्षित पृथ्वी पर लाने के लिये डिज़ाइन किया गया था। इस मिशन के फलस्वरूप 20 जुलाई, 1969 को अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और एडविन बज़ एल्ड्रिन ने पहली बार चंद्रमा पर उतरने में सफलता पाई थी। अपोलो मिशन की घोषणा उस समय की गई थी जब अमेरिका अंतरिक्ष विकास की होड़ में सोवियत संघ को पीछे छोड़ रहा था। इस मिशन के कारण ही अंतरिक्ष तक पहुँचने की दौड़ में अमेरिका को सफलता मिली थी। इस मिशन से पूर्व अंतरिक्ष में रूस का वर्चस्व कायम था और चंद्रमा पर भेजा गया पहला जानवर भी रूस ने ही भेजा था।

  • प्लूनेट्स (Ploonets) खगोलविदों ने एक ऐसे आकाशीय पिण्ड (‘प्लूनेट’) की खोज की है जो एक उपग्रह है। अभी तक किसी भी ग्रह से इसके संबंध का पता नहीं चल पाया है।

प्लेनेट + मून = प्लूनेट (Planet + moon = Ploonet) शोधकर्त्ताओं के अनुसार, ग्रह एवं उसके चंद्रमा के बीच की कोणीय गति के परिणामस्वरूप चंद्रमा अपने मूल ग्रह के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से बच जाता है। एक नए अध्ययन से पता चलता है कि गैस के विशाल भंडार वाले इन बाह्य ग्रहों के चंद्रमा अपनी स्वयं के कक्षाओं से विस्थापित हो सकते हैं। अध्यायांकर्त्ताओं द्वारा जारी नए मॉडल के अनुसार, जैसे ही ये बाह्य ग्रह अपने सूर्य की ओर बढ़ते हैं उनके चंद्रमाओं की परिक्रमा अक्सर बाधित होती है। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार, इन गैसों (जो बाह्य ग्रहों पर उपस्थित होती हैं) को अपने पैरेंट/मूल तारों के आस-पास की कक्षाओं में मौजूद होना चाहिये जिससे चंद्रमा या ग्रहों की कार्यप्रणाली प्रभावित न हो।

  • Spektr-RG रूस की अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस (Roscosmos) ने जर्मनी के साथ एक संयुक्त परियोजना के तहत कज़ाखस्तान के बैकोनूर में कॉस्मोड्रोम से अंतरिक्ष दूरबीन (Space Telescope) लॉन्च की।

Spektr-R जिसे ‘रूसी हबल’ के रूप में जाना जाता है, को प्रतिस्थापित करने के लिये जर्मनी के सहयोग से Spektr-RG को विकसित किया गया है। उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व ही Spektr-R ने नियंत्रण खो दिया था। ब्लैक होल, न्यूट्रॉन सितारों और चुंबकीय क्षेत्रों का निरीक्षण करने के लिये वर्ष 2011 में Spektr-R को लॉन्च किया गया था। वर्ष 2011 के बाद से रूस एकमात्र ऐसा देश रहा है जो अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station-ISS) में टीमों को भेजने में सक्षम है।

  • ओरियन कैप्सूल नासा द्वारा अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर ले जाने के लिये डिज़ाइन इस कैप्सूल (Orion Capsule) के लॉन्च-एबॉर्ट सिस्टम (Launch-abort System) का सफल परीक्षण किया गया।

इस परीक्षण की कुल अवधि 3 मिनट थी और इसे फ्लोरिडा के केप केनवेरल (Cape Canaveral) में किया गया। इस परीक्षण का उद्देश्य किसी रॉकेट की असफलता या विस्फोट के कारण उत्पन्न आपातकाल की स्थिति में रॉकेट में उपस्थित लोगों को आसानी से वापस लाना है। नासा द्वारा किया गया यह परीक्षण उसके आर्टेमिस मिशन (Artemis Missions) के लिये एक बड़ी उपलब्धि है। इस परीक्षण के दौरान एक मिनी-रॉकेट द्वारा मानवरहित ओरियन कैप्सूल लॉन्च किया गया।

  • जर्मनी तथा रूस के वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम स्पेक्ट्रम-रॉन्टजेन-गामा (Spectrum-Roentgen-Gamma- SRG) नामक अंतरिक्ष दूरबीन लॉन्च करने की योजना बना रही है। यह दूरबीन ब्रह्मांड का त्रि-आयामी (Three-Dimensional-3D) एक्स-रे मानचित्र का निर्माण करेगी और अज्ञात विशालकाय कृष्ण छिद्रों, डार्क एनर्जी एवं सितारों के रहस्यों को सुलझाने में मदद करेगी।

SRG टेलीस्कोप का उद्देश्य आकाशगंगा के 3 मिलियन से अधिक विशालकाय कृष्ण छिद्रों की पहचान करना है।

  • नासा द्वारा शनि के उपग्रह टाइटन पर‘ड्रैगनफ्लाई ड्रोन’भेजने की योजना

जीवन के निर्माणकारी घटकों की खोज़ के लिये नासा द्वारा इस मिशन को वर्ष 2026 में लॉन्च किया जाएगा जो वर्ष 2034 में पृथ्वी पर वापस आएगा।यह अतीत के जीवन की संभावनाओं का भी अध्ययन करेगा। नासा द्वारा पहली बार किसी अन्य ग्रह पर एक बहु-रोटर व्हीकल (Multi-Rotor Vehicle) उड़ाया जाएगा।मल्टी-रोटर वाहन में आठ रोटर होंगे जो एक बड़े ड्रोन जैसे होंगे।

  • पाँच मील (8 किलोमीटर) की लंबी उड़ान के दौरान इसे भूमध्यरेखीय "शांगरी-ला" टीले पर उतारा जाएगा।
  • यह टाइटन के वायुमंडलीय और सतह के गुणों की जाँच करेगा साथ ही उप-महासागर सतहों तथा जलाशयों में अतीत के रासायनिक साक्ष्यों की भी जाँच करेगा।
  1. टाइटन शनि का सबसे बड़ा तथा सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह है।
  2. इसकी सतह पर नदियाँ, झीलें और समुद्र हैं (हालाँकि इनमें मीथेन और एथेन जैसे हाइड्रोकार्बन होते हैं, पानी नहीं)।
  3. टाइटन का वातावरण पृथ्वी की तरह नाइट्रोजन से बना है, लेकिन इसका घनत्व पृथ्वी के घनत्व से चार गुना अधिक है।
  4. पृथ्वी के विपरीत यहाँ पर बादल भी उपस्थित है एवं मेथेन की बारिश होती है।
  5. यह सूर्य से लगभग 886 मिलियन मील (1.4 बिलियन किलोमीटर) दूर है।
  6. सूर्य से दूर होने के कारण टाइटन की सतह का तापमान -179 डिग्री सेल्सियस होता है।
  7. इसकी सतह का दबाव भी पृथ्वी से 50% अधिक होता है।
  • सुपरनोवा विस्फोट- वैज्ञानिकों ने लगभग 1,800 नए सुपरनोवा या विस्फोट वाले तारे की खोज की है।हवाई के मौना कीआ वेधशाला में स्थित सुबारू टेलीस्कोप जापान की राष्ट्रीय खगोलीय वेधशाल की दूरबीन है।

नई खोज यह मापने में मदद कर सकती है कि ब्रह्मांड कितनी तेज़ी से विस्तार कर रहा है।वैज्ञानिकों ने 8 बिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित 58 टाइप वन ए (Type Ia) सुपरनोवा की खोज की है। शोधकर्त्ताओं ने सुबारू टेलीस्कोप (Subaru Telescope) और 870 मेगापिक्सेल हाइपर सुप्रीम-कैमरा (Hyper Suprime-Cam)/(डिजिटल कैमरा) की सहायता से यह खोज की। सुपरनोवा-संलयन (Fusion) की समाप्ति (ईंधन खत्म होने पर) के पश्चात् तारे अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण नष्ट (विस्फोट) होने लगते हैं जिसे सुपरनोवा (Supernova) कहते है। आमतौर पर सूर्य के द्रव्यमान से आठ गुना अधिक बड़े तारों में यह विस्फोटक घटना होती है।

नेपच्यूनियन डेज़र्ट तारों के समीप का वैसा क्षेत्र जहाँ नेपच्यून के आकार का कोई ग्रह नहीं पाया जाता हैं।इस क्षेत्र में गर्मी और रेडिएशन इतनी ज़्यादा होती है कि गैसीय वायुमंडल वाले ग्रह इसमें अपना अस्तित्व नहीं बचा पाते हैं।

हाल ही में खगोल वैज्ञानिकों ने एक नए ‘निष्काषित बहिर्ग्रह’ (Rogue Exoplanet) की खोज की है। इस ग्रह का तकनीकी नाम NGTS-4b रखा गया है। इसकी विलक्षण विशेषताओं के कारण इसका उपनाम फॉरबिडेन प्लैनेट (Forbidden Planet) रखा गया है। NGTS-4b का अपना वायुमंडल है। यह मर्करी से भी ज़्यादा गर्म है। NGTS-4b आकार में नेपच्यून से छोटा किंतु यह पृथ्वी से तीन गुना बड़ा है।

  • स्टारलिंकअमेरिकी कंपनी स्पेस एक्स (SpaceX) द्वारा कम लागत तथा उच्च-प्रदर्शन वाली सैटेलाइट बस और नई अंतरिक्ष-आधारित इंटरनेट संचार प्रणाली को लागू करने हेतु ग्राहक ग्राउंड ट्रांसीवर्स (Ground Transceivers) विकसित करने के लिये एक उपग्रह नक्षत्र विकास परियोजना है।

इसका उद्देश्य अंतरिक्ष यान की परिक्रमा करने वाले क्लस्टर के साथ एक ब्रॉडबैंड नेटवर्क बनाना है जो अंततः हजारों की संख्या में हो सकते हैं। इसका उद्देश्य पृथ्वी की निम्न कक्षा में हज़ारों उपग्रहों के नेटवर्क का उपयोग करके दुनिया भर में निरंतर कवरेज प्रदान करना तथा अंतिम उपयोगकर्त्ताओं को कम-विलंबता के साथ उच्च-बैंडविड्थ ब्रॉडबैंड सेवाओं से जोड़ना है। यह एक नए फ्लैट-पैनल डिज़ाइन पर आधारित होगा,जिसमें क्रिप्टन-ईंधन प्लाज़्मा थ्रस्टर्स, उच्च-शक्ति एंटीना और अंतरिक्ष में अन्य वस्तुओं से स्वतः दूर जाने की क्षमता होगी। स्पेसएक्स के अनुसार, फाल्कन-9 रॉकेट की सहायता से 60 उपग्रहों का पेलोड प्रक्षेपित किया जाएगा जिसका वज़न 15 टन (13,620 किलोग्राम) होगा।

  • M87 ब्लैक होल को आधिकारिक तौर पर M87* से नामित किया गया है लेकिन हवाई भाषा में इसे ‘पवई’ (Powehi) नाम भी दिया गया है जिसका अर्थ है 'अथाह रचना का अलंकृत अंधेरा स्रोत'। हालांकि, यह नाम दुनिया भर के खगोलविदों द्वारा आधिकारिक रूप से पहचाने जाने से पहले इसे अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिये।


‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ जिसे JWST या वेव्ब भी कहा जाता है, 6.5 मीटर प्राथमिक प्रतिबिंब के साथ एक बड़ा अवरक्त दूरबीन है जिसे 2021 में फ्रेंच गुयाना से एरियन 5 रॉकेट द्वारा लान्च किया जाएगा। यह हमारे ब्राह्मांड के सौरमंडल के गठन पृथ्वी जैसे जीवन जीने में सक्षम ग्रहों और अपने सौर मंडल के विकास का विस्तृत अध्ययन करेगा। यह नासा,यूरोपियन स्पेस एजेंसी और कनाडाई स्पेस एजेंसी के बीच एक अंतर्राष्ट्रीय मिशन है।

मिशन आर्टेमिस-नासा का चंद्रमा हेतु एक नए मानवयुक्त मिशन। ग्रीक पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रमा की देवी, आर्टेमिस, अपोलो की जुड़वाँ बहन थी।वर्ष 2017 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अंतरिक्ष नीति निर्देश पर हस्ताक्षर किये जाने के पश्चात् मिशन आर्टेमिस की शुरुआत हुई थी। इसके तहत अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजा जाना है। यह 2024 में चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतरेगा और इसमें महिलाओं को भी शामिल किया जाएगा।
नासा का मिशन डार्ट नासा स्पेसएक्स के फाल्कन9 (SpaceX Falcon9) रॉकेट द्वारा एक डार्ट (Double Asteroid Redirection Test-DART) मिशन शुरू करने की योजना बना रहा है। इस मिशन के तहत बाइनरी एस्टेरोइड, डिडायमोस के एक छोटे से चन्द्रमा से सितंबर 2022 में टक्कर कराए जाने का लक्ष्य रखा गया है। यह एक ग्रह रक्षा तकनीक है, जिसे 2021 के मध्य में लॉन्च किया जाना है।यह नासा का पहला मिशन है।यह एक ऐसा अंतरिक्ष मिशन है जो काइनेटिक इम्पैक्टर का प्रयोग करते हुए एस्टेरोइड का मार्ग परिवर्तित करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन करेगा। काइनेटिक इम्पैक्टर काइनेटिक इम्पैक्टर के तहत आकार में बड़े, उच्च गति वाले किसी अंतरिक्ष यान को पृथ्वी के निकट आने वाली वस्तु के मार्ग में भेजा जाता है।
क्षुद्रग्रह 99942 एपोफिस (APOPHIS) 13 अप्रैल, 2029 को पृथ्वी की सतह से लगभग 31,000 किमी. ऊपर से होकर गुजरेगा। वैज्ञानिकों द्वारा व्यक्त अनुमान के अनुसार, 99942 एपोफिस आकार में 340 मीटर चौड़ा है।मिस्र के अराजकता के देवता के नाम पर इस क्षुद्रग्रह का नाम रखा गया है।

मार्सक्वेकनासा के मार्स इनसाइट लैंडर ने पहली बार मंगल ग्रह पर ‘मार्सक्वेक’ (पृथ्वी पर भूकंप की तरह) के झटके को मापा और रिकॉर्ड किया है। लैंडर के आंतरिक संरचना भूकंपीय प्रयोग (Seismic Experiment for Interior Structure-SEIS) तंत्र ने एक बहुत हल्के भूकंपीय संकेत का पता लगाया है। ‘मार्सक्वेक’ (Marsquake) की यह घटना मंगल ग्रह के अंदरूनी हिस्से के संबंध में ठोस डेटा प्रदान करने में सक्षम नहीं थी क्योंकि यह संकेत बहुत हल्का था। मंगल और चंद्रमा में टेक्टोनिक प्लेट नहीं है, किंतु फिर भी कंपन की घटनाएँ होती हैं। मंगल और चंद्रमा पर सतह के ठंडा होने और उसके संकुचन के कारण उत्पन्न तनाव की वज़ह से कंपन की घटना होती है। सतह पर उत्पन्न यह तनाव समय के साथ मज़बूत होता जाता है और भू-पर्पटी को तोड़ने में सक्षम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप कंपन शुरू होता है।


यूरोपियन यूनियन उपग्रह हाल ही में यूनानी विश्वविद्यालय के छात्रों की एक टीम ने उपग्रह का उपयोग करके समुद्र में उपस्थित कूड़े का पता लगाया है। यूरोपीय उपग्रह प्रणाली एक निश्चित समय अंतराल पर पृथ्वी के सभी भागों से गुज़रती है। अतः इन उपग्रहों द्वारा समुद्र में तैरते हुए कूड़ा-करकट का पता लगाया जा सकता है। समुद्र में मौजूद कूड़ा-करकट (जिनमें सबसे ज़्यादा प्लास्टिक पदार्थ होते हैं) समुद्री जीवों जैसे- डॉल्फ़िन, कछुए और सील के लिये सबसे खतरनाक होते हैं।

  • 'नेपालीसैट-1' नेपाल के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित अपने पहले उपग्रह को अमेरिका के वर्जीनिया से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया । इस उपग्रह को दो नेपाली वैज्ञानिकों आभास मास्की और हरिराम श्रेष्ठ ने जापान के क्यूशू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की BIRDS परियोजना के तहत विकसित किया है।

नेपाल की राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (NAST) ने जापानी क्यूशू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की BIRDS परियोजना के तहत देश के अपने उपग्रह के प्रक्षेपण की शुरुआत की। BIRDS परियोजना को संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से डिज़ाइन किया गया है जिसका उद्देश्य किसी देश को अपने पहले उपग्रह को लॉन्च करने में मदद करना है। नेपालीसैट -1 को पृथ्वी की निचली कक्षा में (पृथ्वी की सतह से 400 किलोमीटर की दूरी पर) स्थापित किया जाएगा। यह नेपाल की भौगोलिक जानकारी एकत्र करने के लिये यह उपग्रह नियमित आधार पर तस्वीरें लेगा।

  • नासा के शोधकर्त्ताओं ने यह जानकारी दी है कि चंद्रमा पर उल्कापिंडों की वर्षा के कारण उसकी सतह के नीचे मौजूद पानी को नुकसान पहुँचा है और इस वज़ह से गहन अंतरिक्ष में सतत दीर्घावधि वाली मानवीय खोज के कार्य में संभावित स्रोत का काम धीमा पड़ गया है। नासा और अमेरिका के जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी अप्लायड फिजिक्स लेबोरेट्री के शोधकर्त्ताओं को नासा के लूनर एटमॉसफेयर एंड डस्ट एनवायरनमेंट एक्सप्लोरर (LADEE) द्वारा एकत्रित आँकड़ों से ऐसी कई घटनाओं का पता चला। LADEE एक रोबोटिक अभियान था, जिसने चंद्रमा की कक्षा में परिक्रमा करते हुए चंद्रमा के विरल वायुमंडल की संरचना तथा उसके आसमान में धूल के प्रसार के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाई।
  • ‘मार्स बेस 1’ (‘Mars Base 1’) चीन द्वारा मंगल ग्रह के आकार की निर्मित प्रतिकृति। गोबी रेगिस्तान की गांसु प्रांत स्थित रेगिस्तानी पहाड़ियों में तैयार की गई। भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के लिये सी-स्पेस नामक एक चीनी कंपनी ने “मार्स बेस 1” खोला है।

इसमें सफेद रंग के आधार पर एक गुंबद और नौ मॉड्यूल हैं, जिसमें रहने के लिये क्वार्टर, एक नियंत्रण कक्ष, एक ग्रीनहाउस और एक एयरलॉक शामिल हैं। फिलहाल इसका उपयोग शैक्षिक उद्देश्यों के लिये किया जाएगा किंतु भविष्य में इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में भी विस्तारित किया जाएगा। ‘मार्स बेस 1’ छात्रों को यह बताने में मदद करेगा कि मंगल पर जीवन कैसा हो सकता है। 2022 तक क्रू स्पेस स्टेशन स्थापित किये जाने की उम्मीद के साथ चीन अपने सैन्य-संचालित अंतरिक्ष कार्यक्रम में अरबों रुपए का निवेश कर रहा है।

यह किंघई के क़ैदाम बेसिन में पिछले महीने खोले गए ‘मंगल गाँव’ का अनुसरण करता है। किंघई का क़ैदाम बेसिन एक बेहद गर्म और शुष्क क्षेत्र है। यह दुनिया का सबसे ऊँचा मरुस्थल है। इसे मंगल की सतह की स्थितियों की सबसे अच्छी प्रतिकृति माना जाता है।

गोबी रेगिस्तान मध्य एशिया में स्थित है, गोबी एक मंगोलियाई शब्द है जिसका अर्थ ‘पानी रहित स्थान’ होता है। यह मंगोलिया और चीन दोनों के विशाल भागों में फैला है। इसके उत्तर में अल्ताई पर्वत और मंगोलिया के घास के मैदान और दक्षिण-पश्चिम में तिब्बती पठार और दक्षिण-पूर्व में उत्तर चीन के मैदान से घिरा है।

  • नासा के कैसिनी अंतरिक्षयान द्वारा प्राप्त आँकड़ों का उपयोग करके वैज्ञानिकों ने पाया कि शनि के चंद्रमा टाइटन में तरल मीथेन की झीलें हैं। सौर प्रणाली में टाइटन और पृथ्वी दो ऐसे स्थान हैं जहाँ सतह पर तरल पदार्थ पाए गए हैं।

पृथ्वी के बाद टाइटन एक ऐसा खगोलीय पिंड है जिसकी सतह पर तरल स्थानों, जैसे- नहरों, झीलों और हाइड्रोकार्बन के समुद्र आदि के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं।

शनि ग्रह(Saturn)हमारे सौरमंडल में बृहस्पति के बाद दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इस जोवियन ग्रह(पूरी तरह से गैस से निर्मित) के पास यूरेनस और नेप्च्यून के समान छल्ले (Rings)हैं। अब तक शनि के 53 चंद्रमाओं का पता लगाया जा चुका है।
टाइटन शनि के सभी चंद्रमाओं में सबसे बड़ा है और यह ज्यूपिटर/बृहस्पति के उपग्रह गैनिमीड (Ganymede) के बाद सौर मंडल में दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह/चंद्रमा है।
कैसिनी(Cassini) -15 अक्तूबर, 1997 को लॉन्च किया गया।15 सितंबर, 2017 को यह मिशन समाप्त हो गया।

कैसिनी ने शनि और उसके चंद्रमाओं की परिक्रमा करने के साथ उनका अध्ययन किया। कैसिनी मिशन ने जनवरी 2005 में शनि के सबसे बड़े चंद्रमा टाइटन पर ह्यूजेंस प्रोब (Huygens Probe) को भी उतारा।

  • वैज्ञानिकों ने दो वर्ष पहले ईवेंट होरिज़न टेलिस्कोप द्वारा एकत्रित किये गए आँकड़ों के विश्लेषण के बाद आकाशगंगा M87 में 53 मिलियन प्रकाश-वर्ष दूर स्थित इस ब्लैक होल की तस्वीर जारी की है। विश्व के आठ रेडियो दूरबीनों के डेटा की सहायता से यह तस्वीर निकाली गई।

ब्लैक होल की तस्वीर प्राप्त करने में लगभग 200 वैज्ञानिकों ने कई सुपरकंप्यूटर तथा सैकड़ों टेराबाइट डेटा का उपयोग किया। इस ब्लैक होल से गैस और प्लाज़्मा का नांरगी रंग का प्रकाश आभामंडल दिखाई दे रहा है।

वर्ष 2017 में हवाई,एरिज़ोना,स्पेन,मेक्सिको,चिली और दक्षिण ध्रुव में स्थापित आठ रेडियो दूरबीनों की सहायता से आकाशगंगा M87 का अवलोकन किया गया। इन रेडियो दूरबीनों द्वारा प्राप्त डेटा की सहायता से लगभग 12,000 किमी. के क्षेत्र में फैली एक आभासी वेधशाला तैयार हो गई थी।
  • लाइटसेल 2(LightSail 2) नियंत्रित सौर सेलिंग को प्रदर्शित करने हेतु एक परियोजना। फ्लोरिडा,अमेरिका के कैनेडी स्पेस सेंटर से अप्रैल 2019 में लॉन्च किया जाएगा।
सौर सेलिंग (Solar Sailing)-अंतरिक्षयानों की एक ऐसी प्रस्तावित प्रणोदन प्रणाली है जो सूर्य जैसे विभिन्न तारों द्वारा उत्पन्न विकिरण के प्रयोग से अंतरिक्षयानों को गति प्रदान करेगी। सौर सेलिंग प्रणाली से युक्त अंतरिक्षयानों के पास असीमित मात्रा में ईंधन होगा जो उन्हें खगोलीय दूरी पार कराने में सक्षम बना देगा।

लाइटसेल 2 उन तीन उपग्रहों में से एक है जिन्हें सौर विकिरण का उपयोग करते हुए अंतरिक्षयान को गति देने की व्यवहार्यता का पता लगाने के लिये बनाया गया है। इस मिशन को यह देखने के लिये डिज़ाइन किया गया है कि क्या लाइटसेल सूर्य से केवल फोटॉन का उपयोग करके पृथ्वी की उच्च कक्षाओं में जा सकता है।

  • यूरोपीय स्पेस एजेंसी के मार्स एक्सप्रेस ऑर्बिटर मिशन ने 2013 की गर्मियों के दौरान मंगल की भूमध्य रेखा के समीप स्थित गेल क्रेटर के आस-पास मीथेन गैस की पहचान की थी। 2011 से इस क्रेटर के इर्द-गिर्द खोज कर रही अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के क्यूरोसिटी रोवर ने भी उस दौरान मीथेन की मात्रा बढ़ने की जानकारी दी थी। इससे मंगल ग्रह पर सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी की संभावना को बल मिला है, क्योंकि कई सूक्ष्मजीव मीथेन गैस के बनने में सहायक होते हैं। मीथेन गैस का निर्माण दो ही प्रक्रियाओं से होता है। पहली प्रक्रिया भूगर्भीय है जिसमें गर्मी और पानी की भूमिका होती है। दूसरी प्रक्रिया सूक्ष्मजीवों से संबंधित है, जिसमें कुछ मीथोनोजेन सूक्ष्मजीव अपशिष्ट के रूप में मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं।

अमेरिका के सदर्न कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्त्ताओं के एक अध्ययन से पता चला है कि मंगल ग्रह पर ध्रुवों की तुलना में व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में भूजल मौजूदगी की संभावना है।

  • ट्रांज़िटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (Transiting Exoplanet Survey Satellite-TESS) नासा द्वारा संचालित परियोजना है,जिसका उद्देश्य हमारे सौर मंडल के बाहर के ग्रहों की खोज करना है। इसमें ऐसे ग्रह भी शामिल हैं जिनमें जीवन की संभावना हो सकती है। इस मिशन के अंतर्गत ऐसे एक्सोप्लैनेट्स की खोज की जाएगी जो समय-समय पर अपने होस्ट तारों से आने वाले प्रकाश को अवरुद्ध करते हैं, इस प्रक्रिया को पारगमन (Transits) कहा जाता है।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)ने बेंगलुरु में ‘मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र’ (Human Space Flight Center) का उद्घाटन किया है। यह इसरो में मानव-संबंधी सभी कार्यक्रमों का प्रभारी होगा, जिसमें गगनयान परियोजना भी शामिल है जिसके तहत पृथ्वी की कक्षा में तीन अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा जाएगा।
  • तायानिलियन-2-1,चीन का नई पीढ़ी के एक उपग्रह

31 मार्च को दक्षिण-पश्चिम चीन के सिचुआन प्रांत के शिछांग उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र से सफलतापूर्वक लॉन्ग मार्च-3C रॉकेट से प्रक्षेपित किया गया। चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कॉरपोरेशन द्वारा विकसित,यह ट्रंक डेटा व्यवस्था का पहला उपग्रह है,जो मानवयुक्त अंतरिक्ष यान, उपग्रह,रॉकेट तथा गैर-अंतरिक्ष यान उपयोगकर्त्ताओं को डेटा रिले, निगरानी व नियंत्रण और परिवहन आदि सेवाएँ दे सकेगा। यह एक बहुउद्देश्यीय नेटवर्क है, जो तेज़ डेटा ट्रांसफर सेवा क्षमता के साथ मध्यम और निम्न पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों के लिये उपयोगी सिद्ध होगा।

प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्त[सम्पादन]

ऑस्ट्रेलिया ‘मोबाईल ट्रैकिंग कैमरा’ (Mobile tracking Camera) लगाने वाला विश्व का पहला देश बन गया है। यह कैमरा कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित है तथा यह हर मौसम में दिन-रात काम करने में सक्षम है। ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने यह कदम मोबाइल फोन के कारण होने वाले सड़क हादसों को रोकने के लिये उठाया है। न्यू साउथ वेल्स में प्रशासन ने वर्ष 2021 में होने वाली मौतों को 30% तक कम करने का लक्ष्य रखा है। सरकार का अनुमान है कि वर्ष 2012-2018 तक न्यू साउथ वेल्स में मोबाईल फोन के इस्तेमाल के चलते लगभग 158 लोगों की मौत हुई।

  • इलास्टोकेलोरिक प्रभाव रेफ्रिजरेटर (जर्नल साइंस में प्रकाशित एक शोध के अनुसार) और एयर-कंडीशनर में उपयोग किये जाने वाले द्रव रेफ़्रिजरेंट की आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है।

जब किसी रबर बैंड को घुमाया (Twisted) जाता है और फिर छोड़ (Untwisted) दिया जाता है तो यह शीतलन का प्रभाव उत्पन्न करती है इस प्रभाव को ‘इलास्टोकोलिक प्रभाव’ कहा जाता है। इलास्टोकेलोरिक प्रभाव ऐसे परिवर्तन हैं जो किसी बाहरी तनाव, बिजली या चुंबकीय क्षेत्र के कारण होते हैं। वर्तमान में कुशल और पर्यावरण के अनुकूल प्रशीतन प्रौद्योगिकियों (Refrigeration Technologies) की अधिक मांग के कारण इलास्टोकेलोरिक तथा विशाल केलोरिक प्रभाव वाले पदार्थों के विषय में व्यापक स्तर पर शोध कार्य किये जा रहे हैं।

  • फेडर(FEDOR)- रूस द्वारा 22 अगस्त को मानवाभ (Humanoid) रोबोट ले जाने वाले एक मानव रहित रॉकेट को लॉन्च किया गया। यह रोबोट अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 10 दिन बिताएगा तथा अंतरिक्ष यात्रियों की सहायता करना सीखेगा।

इसका नाम फेडर (Final Experimental Demonstration Object Research) रखा गया है। इसे रूस के बेकनूर से सोयूज MS-14 अंतरिक्षयान द्वारा भेजा गया। फेडर के पास इंस्टाग्राम और ट्विटर अकाउंट हैं, जिसमें लिखा है कि यह पानी की बोतल खोलने जैसे नए कौशल सीख रहा है और स्टेशन में बहुत कम गुरुत्वाकर्षण में हस्त-कौशलों का परीक्षण करेगा। रोबोट ने कक्षा में पहुँचने के बाद ट्वीट किया, इन-फ्लाइट प्रयोगों का पहला चरण उड़ान योजना के अनुसार हुआ।” फेडर मानव गतिविधियों को कॉपी करता है, एक प्रमुख कौशल जो इसे अंतरिक्ष यात्रियों या पृथ्वी पर भी लोगों के कार्यों को पूरा करने में मदद करने की अनुमति देता है, जबकि मनुष्य एक एक्सोस्केलेटन में बंधे होते हैं। [२] उच्च विकिरण वाले वातावरण में काम करने, कार्यों के निस्तारण और मुश्किल समय में बचाव हेतु मिशन के लिये फेडर को पृथ्वी पर संभावित रूप से उपयोगी बताया गया है।

फ़ेडर अंतरिक्ष में जाने वाला पहला रोबोट नहीं:-
वर्ष 2011 में नासा ने जनरल मोटर्स के सहयोग से विकसित एक ह्यूमनॉइड रोबोट रोबोनॉट 2 को अंतरिक्ष में भेजा, इसका उद्देश्य उच्च जोखिम वाले वातावरण में काम करना था। इसे वर्ष 2018 में तकनीकी समस्याओं का सामना करने के बाद पृथ्वी पर वापस बुला लिया गया था।
वर्ष 2013 में जापान ने ISS के पहले जापानी अंतरिक्ष कमांडर के साथ किरोबो (Kirobo) नामक एक छोटा रोबोट भेजा। यह टोयोटा की मदद से विकसित किया गया था जो केवल जापानी भाषा में वार्तालाप करने में सक्षम था।
  • INF संधि अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव के बीच वर्ष 1987 में शीतयुद्ध के दौरान पारंपरिक और परमाणु दोनों प्रकार की मध्यम दूरी की मिसाइलों की शक्तियों को सीमित करने के लिये हुई थी।

यह संधि अमेरिका और रूस के बीच एक द्विपक्षीय समझौता था, यह किसी भी अन्य परमाणु संपन्न देशों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाती है, साथ ही संयुक्त राष्ट्र का इस संधि में कोई हस्तक्षेप नहीं है। भारत इस संधि का अनुसमर्थनकर्त्ता देश नहीं है क्योंकि यह केवल अमेरिका और रूस के बीच एक द्विपक्षीय संधि है।

  • शोधकर्त्ताओं ने रोबोटिक्स का उपयोग करके आंत में पाए जाने वाले एक सामान्य जीवाणु एस्चेरिचिया कोलाई (Escherichia coli) से एंटीबायोटिक दवाओं का एक नया वर्ग प्रस्तुत किया है, जिसे द्वितीय श्रेणी पॉलीकेटाइड्स (Class II Polyketides) के रूप में जाना जाता है।

ये एंटीबायोटिक्स भी प्राकृतिक रूप से मिट्टी में उपस्थित बैक्टीरिया द्वारा निर्मित होते हैं और इनमें रोगाणुरोधी गुण होते हैं जो आधुनिक दवा उद्योग में संक्रामक रोगों और कैंसर से लड़ने के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राकृतिक रूप से उत्पादित एस्चेरिचिया कोलाई बैक्टीरिया के साथ काम करना मुश्किल होता है क्योंकि वे आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान के लिये उपयोग किये जाने वाले स्वचालित रोबोट सिस्टम के असंगत होते हैं। यह सफलता रोगाणुरोधी प्रतिरोध के खिलाफ चल रही लड़ाई में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, क्योंकि हाल ही में विकसित स्वचालित रोबोटिक्स सिस्टम का उपयोग अब तीव्र एवं कुशल तरीके से नए एंटीबायोटिक्स बनाने में किया जा सकता है।

एंटीबायोटिक (एंटीबैक्टीरियल)एक ऐसा यौगिक है, जो बैक्टीरिया (जीवाणु) को नष्ट कर देता है। हमारे इम्यून सिस्टम यानी रोग-प्रतिरोधक तंत्र में बैक्टीरिया के कारण हुए संक्रमण को दूर करने के गुण पाए जाते हैं। लेकिन कभी-कभी बैक्टीरिया का आक्रमण इतना अधिक हो जाता है कि संक्रमण को दूर करना इम्यून सिस्टम की क्षमता के बाहर हो जाता है। ऐसे संक्रमण से बचने के लिये हमें बाहर से दवा के रूप में एंटीबायोटिक लेने की आवश्यकता होती है।

बैक्टीरिया पर इसके प्रभाव या कार्य के अनुसार एंटीबायोटिक्स को दो समूहों में बाँटा जाता है।

  1. ‘जीवाणुनाशक एजेंट’- जीवाणुओं को मारते हैं।
  2. ‘बैक्टीरियोस्टेटिक एजेंट’- जो जीवाणु के विकास को दुर्बल करते हैं।

पेनिसिलिन जीवाणुनाशक एंटीबायोटिक है। यह जीवाणु के कोशिका दीवार या कोशिका झिल्ली पर वार करता है। पहला खोजा जाने वाला एंटीबायोटिक पेनिसिलिन है द्वितीय विश्व युद्ध में घायल हुए अमेरिकी सैनिकों के इलाज के लिये इस एंटीबायोटिक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया था।

  • पीयर टू पीयर लेन देन के लिये ब्लॉकचेन तकनीक में किसी तृतीय पक्ष या केंद्रीय प्राधिकारी की आवश्यकता नहीं होती।

ब्लॉकचेन तकनीक ब्लॉक की एकल जुड़ी (single linked) सूची है, प्रत्येक ब्लाक में लेन-देन (ट्रांज़ैक्शन) की एक संख्या होती है और यह वितरित, विकेंद्रीकृत,पब्लिक लेज़र उपलब्ध कराता है जो विश्व भर में प्रयोक्ताओं के नेटवर्क पर दृष्टिगोचर होती है और अत्यधिक पारदर्शिता के साथ लेन-देन के रिकॉर्ड के स्थानांतरण की विधि के रूप में कार्य करता है। ब्लॉकचेन तकनीक प्रयोक्ताओं जो कि उन्हें सुरक्षित और प्रभावी पहचान उपलब्ध कराते हैं, की डिजिटल पहचान पर नजर रखती है और उनका प्रबंध करती है। सिस्टम जो ब्लाकचेन अभिप्रमाणन प्रणाली पर आधारित है, डिजिटल हस्ताक्षर के प्रयोग से पहचान का सत्यापन कराता है। ‘पब्लिक की क्रिप्टोग्राफी’ डिजिटल हस्ताक्षर का आधार है।

  • गूगल ने वर्ष 2019 में होने वाले गूगल साइंस फेयर के लिये 18 युवा भारतीय वैज्ञानिकों का चयन किया है। इसमें प्रतिभागी 50 हज़ार डॉलर व अन्य पुरस्कार जीतने के लिये अन्य प्रतिभागियों को चुनौती देंगे। 13 से 18 वर्ष के युवाओं को विज्ञान,तकनीक,इंजीनियरिंग और गणित के माध्यम से समस्याओं का हल खोजने के लिये प्रेरित करती है। भारतीय छात्रों ने स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से लेकर पर्यावरण हितैषी गोंद और ईंधन के साथ-साथ पानी को पीने लायक बनाने जैसे विचारों के साथ कई क्रिएटिव और बेहतर विचार प्रस्तुत किये हैं। इस प्रतियोगिता के लिये आए आवेदनों का मूल्यांकन रचनात्मकता,वैज्ञानिक योग्यता और प्रस्तुति के प्रभाव के आधार पर किया गया।
  • IDAct प्रणाली का विकास अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों ने किया है। इसकी सहायता से हर छोटी-बड़ी चीज़ को इंटरनेट की दुनिया से जोड़ा जा सकेगा। एक अनुमान के अनुसार फिलहाल 1420 करोड़ स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इंटरनेट से जुड़े हुए है, लेकिन IDAct प्रणाली की सहायता से सैकड़ों करोड़ अन्य चीज़ों को इंटरनेट से जोड़ना संभव हो सकेगा। रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) को पढ़ने में सक्षम तथा बिना बैटरी के इस उपकरण(Tag) की कीमत बेहद कम है और इसे किसी भी वस्तु के साथ जोड़ा जा सकता है।
IDAct प्रणाली कमरे के भीतर रह रहे किसी व्यक्ति की मौज़ूदगी और उसकी हर गतिविधि पर नज़र रख सकेगा।
  • चीन ने दावा किया है कि शंघाई 5G और गीगाबिट नेटवर्क का इस्तेमाल करने वाला दुनिया का पहला ज़िला बन गया है। चीन की सरकारी कंपनी चाइना मोबाइल के सहयोग से यह परीक्षण किया गया।5G अगली पीढ़ी की सेल्यूलर प्रौद्योगिकी है, जो 4G की तुलना में 10 से 100 गुना तेज़ डाउनलोड स्पीड देता है। इसका आधिकारिक परिचालन शंघाई के हांगकोउ में शुरू किया गया, जहाँ पूरी तरह से कवरेज सुनिश्चित करने के लिये पिछले तीन महीने से 5G बेस-स्टेशन लगाए जा रहे थे।
  • योशुआ बेन्जियो,जेफरी हिंटन और यान ली चुन को ट्यूरिंग पुरस्कार 2018 से सम्मानित किया गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के क्षेत्र में डीप लर्निंग (Deep Learning) में विशेष योगदान के लिये यह पुरस्कार प्रदान किया गया। इन तीनों वैज्ञानिकों ने एक साथ मिलकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) तकनीकी को विकसित किया है।
एसोसिएशन ऑफ कंप्यूटिंग मशीनरी (Association of Computing Machinery) द्वारा स्थापित एसीएम ए.एम. ट्यूरिंग पुरस्कार को तकनीकी का नोबेल भी कहा जाता है।
'कंप्यूटर क्षेत्र में स्थायी और प्रमुख तकनीकी महत्त्व' के योगदान के लिये दिये जानेवाले इस पुरस्कार का नामकरण ब्रिटिश गणितज्ञ,एलन एम. ट्यूरिंग के नाम पर रखा गया था, जिन्होंने कंप्यूटिंग की गणितीय नींव और सीमाओं को स्पष्ट किया था।
  • गाइनान्ड्रोमॉर्फी:- किसी एक जीव में दोनों विशेषताओं का एक साथ पाया जाना कहलाता है। जीवों में यह विशेषता लिंग गुणसूत्रों की अनियमितता के कारण पाई जाती है।

कंप्यूटर[सम्पादन]

वाई-फ़ाई 6 तकनीक के निम्नलिखित लाभ हैं:-

  1. यह वर्तमान एवं भविष्य के विभिन्न उपयोगों के लिये,अल्ट्रा-हाइ-डेफ़िनेशन मूवी की स्ट्रीमिंग से लेकर मिशन-क्रिटिकल बिज़नेस एप्लीकेशन तक जिसमें उच्च बेंड्विड्थ और कम विलंबता की आवश्यकता होती है ताकि हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों नेटवर्क हेतु उपयोगी बने रहे, हेतु आधार प्रदान करती है।
  2. वाई-फ़ाई 6 समर्थित नेटवर्क और उपकरणों में बैटरी का उपभोग कम होता है।
  3. अधिकतम गीगाबाइट स्पीड में डेटा दर उच्चतर होती है।
  4. प्रयोक्ताओं और उपकरणों की उच्च संख्या को सहारा देने के लिये कम विलंबता के साथ यह क्षमता में वृद्धि करती है।
  5. सघनतम पर्यावरण में यह एक उच्च निष्पादन दर उपलब्ध करती है।
  6. अधिक मज़बूत आउटडोर नेटवर्क प्रचालन।
  7. बहु-प्रयोक्ता विविध इनपुट,विविध आउटपुट (MU-MIMO) अधिक डेटा स्थानांतरण की सुविधा देता है, जो पहुँच बिंदुओं (APs) को एक ही समय पर बड़ी संख्या में उपकरणों का संचालन करने में सक्षम बनाता है।

मालवेयर (Malware) Smominru पहली बार वर्ष 2017 में देखे जाने के पश्चात इसने विंडोज़ 7 और विंडोज़ सर्वर 2008 सिस्टम इसके अतिरिक्त विंडोज़ सर्वर 2012, विंडोज़ एक्सपी और विंडोज़ सर्वर 2003 भी संक्रमित कर रहा है। एक नवीन आँकड़े के अनुसार, एक दिन में यह लगभग 4,700 कंप्यूटरों को संक्रमित करता है। इससे प्रभावित सिस्टमों की समस्या दूर करने के बाद भी उनमें इसके लक्षण देखे जा रहे हैं। कैसे कार्य करता है? एक कंप्यूटर में प्रवेश करने के बाद यह एक नया उपयोगकर्त्ता (User) बनाता है, जिसे एडमिन $ (Admin$) कहा जाता है। इसके बाद यह सिस्टम में स्वंय को व्यवस्थित कर दुर्भावनापूर्ण पेलोड (Malicious Payloads) डाउनलोड करना शुरू कर देता है। उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य प्रभावित सिस्टम के माध्यम से क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग (Mining) करना है। यह जासूसी और क्रेडेंशियल चोरी (इसके तहत सिस्टम उपयोगकर्त्ता की पहचान चोरी की जाती है) के लिये उपयोग किये जाने वाले मॉड्यूल का एक सेट भी डाउनलोड करता है। मालवेयर (Malware):-मालवेयर सॉफ़्टवेयर को जान बूझकर कंप्यूटर, सर्वर, क्लाइंट या कंप्यूटर नेटवर्क को नुकसान पहुँचाने हेतु डिज़ाइन किया जाता है। मालवेयर लक्षित कंप्यूटर में से स्क्रिप्ट और डेटा इत्यादि को नुकसान पहुँचाता है।

  • क्वांटम सुप्रीमेसी(Quantum Supremacy)- गूगल (Google) के अनुसंधानकर्त्ताओं द्वारा इसके लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करने का दावा किया गया है जो क्वांटम कंप्यूटर के विकास की दिशा में एक प्रमुख उपलब्धि है।

सामान्य कंप्यूटर बिट्स (0 एवं 1) के रूप में जानकारी संग्रहीत करता है जबकि एक क्वांटम कंप्यूटर इसे क्वांटम बिट्स (Quantum Bits-Qubit) के रूप में संग्रहीत करता है। यह 0 एवं 1 के विभिन्न संयोजनों को संगृहीत कर सकता है। क्वांटम प्रोसेसर को एक निश्चित गणना करने में 200 सेकेंड का समय लगता है जबकि विश्व के सबसे तेज़ सुपर कंप्यूटर समिट (Summit) को इस गणना को पूरा करने में 10,000 वर्ष का समय लगेगा। समिट या OLCF-4 ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी (Oak Ridge National Laboratory) में उपयोग के लिये IBM द्वारा विकसित एक सुपर कंप्यूटर है। क्वांटम सुप्रीमेसी’ पर आधारित कंप्यूटर को क्रिप्टोग्राफी (Cryptography), रसायन विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ( Artificial Intelligence) और मशीन लर्निंग (Machine Learning) आदि क्षेत्र के लिये लाभकारी होने की उम्मीद है। हालाँकि गूगल ने 54 क्वांटम बिट्स पर आधारित कंप्यूटर का निर्माण किया है जिसे Sycamore नाम दिया गया। यदि यह दावा सही साबित होता है तो क्वांटम सुप्रीमेसी पर आधारित कंप्यूटर किसी भी गणना को करने में पारंपरिक कंप्यूटर की तुलना में अत्यंत कम समय लेगा। वर्ष 2011 में कैलिफोर्निया के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में सैद्धांतिक भौतिकी के प्रोफेसर जॉन प्रिस्किल को ‘क्वांटम सुप्रीमेसी’ पद के सृजन का श्रेय दिया जाता है।

  • वर्म (Worm) एक ऐसा कंप्यूटर कोड है जो उपयोगकर्त्ता की भागीदारी के बिना ही एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर में फैलता जाता है।

अधिकांश वर्म ईमेल अटैचमेंट के रूप में शुरू होते हैं, जिन्हें खोले जाने पर वे कंप्यूटर को संक्रमित कर देते हैं। वर्म किसी वायरस, ट्रोजन या अन्य मैलवेयर की तुलना में अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि उन्हें पकड़ पाना कठिन होता है। वर्म फाइलों को हैक करने के लिये संक्रमित कंप्यूटर को स्कैन करता है। इन फाइलों में एड्रेस बुक या अस्थायी वेब पृष्ठ के साथ ही ईमेल एड्रेस भी शामिल हो सकते हैं।

  • ट्रोजन हॉर्स (Trojan Horse) कंप्यूटर प्रोग्राम के अंदर छुपा एक दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर प्रोग्राम होता है।

यह किसी वैध प्रोग्राम जैसे- किसी स्क्रीन सेवर के अंदर छुपकर कंप्यूटर में प्रवेश करता है। कंप्यूटर में प्रवेश करने के पश्चात् यह ऑपरेटिंग सिस्टम में कोड डालता है, जिससे हैकर कंप्यूटर तक पहुँचने में सक्षम हो जाता है। आमतौर पर ट्रोज़न हॉर्स का प्रसार स्वतः नहीं होता है। यह वायरस, वर्म या डाउनलोड किये गए किसी सॉफ़्टवेयर द्वारा फैलाया जाता है।
क्रोनोस और हॉप्लाइटएक प्रकार के ट्रोजन हैं। यह एक ऐसा प्रोग्राम है जो कुछ ऐसा होने का दिखावा करता है जो वह नहीं है। ट्रोजन आमतौर पर ई-मेल अटैचमेंट के माध्यम से फैलते हैं और एक बार डाउनलोड होने के बाद यूज़र के वित्तीय डेटा, ईमेल और पासवर्ड जैसी संवेदनशील जानकारी चुरा सकते है। क्रोनोस पहली बार वर्ष 2014 में एक रूसी अंडरग्राउंड फोरम पर ऑनलाइन दिखाई दिये थे।

  • टिम बर्नर्स-ली द्वारा 1989 में अविष्कृत वर्ल्ड वाइड वेब के 12 मार्च, 2019 को 30 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में गूगल ने WWW को डूडल समर्पित किया।

उन्होनें डॉक्यूमेंट्स को लिंक करने के लिये हाइपरटेक्स्ट के उपयोग की कल्पना की थी। इसमें HTML, URL, HTTP जैसे फंडामेंटल शामिल थे। WWW आमतौर पर वेब के रूप में जाना जाता है। यह ऑनलाइन सामग्री का एक नेटवर्क है, जहाँ डॉक्यूमेंट्स और अन्य वेब रिसोर्सेज़ की पहचान यूनिफॉर्म रिसोर्स लोकेटर (URL) द्वारा की जाती है। पहली वेबसाइट वर्ष 1990 में बनाई गई थी जो World Wide Web प्रोजेक्ट को ही समर्पित थी।

एक्सोप्लेनेट और डार्क मेटर[सम्पादन]

भौतिकी का नोबेल पुरस्कार न्यू प्रेस्पेक्टिव ऑफ़ अवर प्लेस इन द यूनिवर्स (New Prespective of our place in the Universe) हेतु प्रदान किया गया। विजेता: इस वर्ष माइकल मेयर, डीडीयर क्युलेज़ व जेम्स पीबल्स को संयुक्त रूप से इस पुरस्कार के लिये चुना गया है। माइकल मेयर व डीडीयर क्युलेज़ जो कि जिनेवा विश्वविद्यालय से संबद्ध है को सौर मंडल के बाहर एक ऐसे ग्रह की खोज के लिये चुना गया है जो कि सूर्य जैसे तारे की परिक्रमा करता है। वही जेम्स पीबल्स जो कि प्रिंसटन विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं, को भौतिक ब्रह्मांड विज्ञान में उनके योगदान के लिये इस पुरस्कार हेतु चुना गया। एक्सोप्लेनेट क्या है: सौर मंडल से बाहर पाए जाने वाले ग्रह एक्सोप्लेनेट (Exoplanet) कहलाते हैं, ये सौरमंडल में मुख्य ग्रहों के अतिरिक्त उपस्थित ग्रह हैं। मेयर एवं क्युलेज़ द्वारा खोजा गया प्रथम एक्सोप्लानेट 51 पेगासी (Pegasi) b था जिसे वर्ष 1995 में खोजा गया था। 51 पेगासी बी (Pegasi b) किस प्रकार का ग्रह है? क्या यह मनुष्यों के रहने योग्य है? पेगासस तारामंडल (Pegasus Constellation) में एक तारा 51 पेगासी है जो पृथ्वी से लगभग 50 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। यह एक गैसीय ग्रह है, जो बृहस्पति के लगभग आधे आकार का है, इसी कारण इसे डिमिडियम नाम दिया गया था, जिसका अर्थ एक-आधा होता है। यह केवल चार दिनों में अपने तारे की परिक्रमा पूरी कर लेता है। यह संभावना काफी कम है कि यह मनुष्यों के रहने योग्य हो। एक्सोप्लेनेट संबंधी इतिहास: निकोलस कोपरनिकस (वर्ष 1473–1543) ऐसे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने यह बताया कि सूर्य सौरमंडल के केंद्र में अवस्थित है, साथ ही कहा कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है। इस खोज ने एक नई सोच को जन्म दिया जिसने सारे पुराने नियमों को परिवर्तित कर दिया। उपरोक्त तथ्यों को आधार बनाकर इटेलियन दर्शनशास्त्री गियोरदानो ब्रूनो (Giordano Bruno) ने सोलहवीं सदी में, वहीं बाद में सर आईज़ेक न्यूटन (Sir Isaac Newton) ने भी सूर्य की विशिष्ट स्थिति को स्पष्ट किया, साथ ही बताया कि पृथ्वी के साथ-साथ अन्य कई ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। पीबल्स को पुरस्कार दिये जाने का कारण: बिग बैंग से पहले ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझना मुश्किल था पर यह माना जाता था कि यह सघन, अपारदर्शी एवं गर्म था। बिग बैंग के लगभग 400,000 वर्ष बाद ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ और यह माना गया कि इसके तापमान में कुछ हज़ार डिग्री सेल्सियस की गिरावट आई। साथ ही ब्रह्माण्ड में पारदर्शिता बढ़ी एवं प्रकाश को गुजरने की अनुमति मिली। बिग बैंग के बचे हुए कणों को कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (CMB) कहा गया। ब्रह्मांड का यह विस्तार व ठंडा होना जारी रहा एवं इसका वर्तमान तापमान 2 केल्विन (kelvin) के करीब है अर्थात् लगभग माइनस 271 डिग्री सेल्सियस के करीब है। पीबल्स द्वारा बताया गया कि CMB के ताप को मापने से यह पता लगाया जा सकता है कि बिग-बैंग में कितनी मात्र में पदार्थ/कण/पिंड का निर्माण हुआ। जैसा कि हम जानते हैं कि CMB में माइक्रोवेव रेंज में प्रकाश निहित होता है और ब्रह्मांड के विस्तार के साथ यह प्रकाश विस्तारित होता गया। माइक्रोवेव विकिरण अदृश्य प्रकाश होता है। यह प्रकाश इस तथ्य की खोज में एक अहम् भूमिका निभा सकता है कि किस प्रकार बिग बैंग में उत्पन्न हुए पदार्थों ने वर्तमान समय में उपस्थित गैलेक्सी का सृजन किया। उनकी इस खोज से इन सवालों का जवाब आसानी से खोजा जा सकता है कि ब्रह्माण्ड में कितनी मात्रा व ऊर्जा है, साथ ही यह भी की यह कितना पुराना है? बिग बैंग थ्योरी (Big Bang Theory) यह बताता है कि ब्रह्मांड बहुत उच्च घनत्व और उच्च तापमान वाली स्थिति से कैसे विस्तारित हुआ और प्रकाश तत्वों की प्रचुरता, ब्रह्मांडीय माइक्रोवेव पृष्ठभूमि (CMB), बड़े पैमाने पर संरचना सहित घटनाओं की एक विस्तृत शृंखला के लिये एक व्यापक विवरण प्रदान करता है। CMB (Cosmic Microwave Background) के बारे में पहली बार 1964 में पता चला था, इस खोज को वर्ष 1978 में नोबेल पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। डार्क मेटर (Dark Matter): डार्क मेटर वह तत्त्व है जो कि ब्रह्मांड का लगभग 85% हिस्सा है, इसके कुल ऊर्जा घनत्व का लगभग ¼ है। यह उन कणों से बना होता है जो कि प्रकाश को प्रतिबिंबित नहीं करते है, साथ ही विद्युत चुम्बकीय विकिरण से इसे पता कर पाना मुश्किल होता है, वहीं दूसरी तरफ इन्हें देखा जाना भी संभव नहीं होता है। डार्क मेटर को समझने में पीबल्स की क्या भूमिका रही? आकाशगंगाओं की घूर्णन की गति से खगोलविदों ने यह अंदाज़ा लगाया कि ब्रम्हांड में अधिक मात्रा में द्रव्यमान होना चाहिये था जो कि आकाशगंगाओ को गुरुत्वाकर्षण शक्ति के साथ नियंत्रित करता हो। हालाँकि द्रव्यमान के एक हिस्से को देखा जा सकता था तथापि एक बड़ा हिस्सा अदृश्य था, इसी गायब तत्त्व को डार्क मेटर कहा गया। पीबल्स के हस्तक्षेप से पहले लापता द्रव्यमान को न्युट्रीनो के रूप में संदर्भित किया जाता रहा। बाद में इन्होंने यह भी बताया कि डार्क मेटर के इसे केवल गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से महसूस कर सकते हैं बजाय प्रभाव क्रिया के माध्यम से। ज्ञात हो कि ब्रह्मांड के द्रव्यमान का लगभग 25% हिस्सा डार्क मेटर से बना है। डार्क एनर्जी (dark energy): यह ऊर्जा का एक काल्पनिक रूप है जो कि गुरुत्वाकर्षण के विपरीत कार्य करता है एवं प्रतिकारक दबाव को बाहर निकालता है, इसे सुपरनोवा के गुणों के अवलोकन के लिये परिकल्पित किया गया है।

जीव विज्ञान[सम्पादन]

  • जी.वी.-971, चीन में विकसित तथा भूरे शैवाल से निर्मित विश्व की पहली बहु-लक्ष्यीय (Multi-Targeting) और कार्बोहाइड्रेट आधारित ओरल (Oral) दवा है जो प्रारंभिक तथा मध्यम स्तरीय अल्ज़ाइमर रोग के निदान तथा स्मरण क्षमता (Cognition) में सुधार के लिये उपयोगी है।
  • चीन में ब्यूबोनिक प्लेग (Bubonic Plague) के कुछ मामले सामने आए हैं। ब्यूबोनिक प्लेग संक्रमित पिस्सू के काटने से फैलता है। यह येर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरियम (Yersinia Pestis Bacterium) के कारण होता है।

ब्यूबोनिक प्लेग के अलावा प्लेग के दो संस्करण और हैं-

  1. न्यूमोनिक प्लेग (Pneumonic Variant)
  2. सेप्टिकैमिक प्लेग ( Septicaemic Plague)

जीवाणु संक्रमित महामारी होने के कारण प्रारंभिक अवस्था में ही प्लेग के लक्षणों को पहचान कर प्रभावी एंटीबायोटिक दवाओं द्वारा इसका उपचार किया जा सकता है।

  • केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र शिमला द्वारा आलू की एक नई किस्म कुफरी सह्याद्रि (Kufri sahyadri) का विकास किया गया है। हिमाचल क्षेत्र में आलू में नेमोटोड्स पाए जाने के कारण आलू के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है जिसके लिये कुफरी सह्याद्रि का विकास किया गया।

इस नई किस्म पर नेमोटोड्स का प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा यह किस्म आलू की कुफरी ज्योति और कुफरी स्वर्ण किस्म का स्थान लेगी।

नेमोटोड्स गोलकृमि होते हैं जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता। ये आलू की जड़ों को प्रभावित करते हैं,इनसे प्रभावित आलू से स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता परंतु आलू उत्पादन कम हो जाता है।
  • एरिथ्रोपोइटिन जिसे हेमेटोपोइटिन (Hematopoietin) या हेमोपोइटिन (Hemopoietin) कहा जाता है,मुख्य रूप से गुर्दे की कोशिकाओं द्वारा उत्पादित हॉर्मोन है जो लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन को बढ़ाने में सहायता करता है।

क्रोनिक किडनी रोग के कारण रक्ताल्पता (Anaemia) के शिकार लोगों में एरिथ्रोपोइटिन का उपयोग रक्त में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने में सहायता करता है। एथलीट्स के लिये एरिथ्रोपोइटिन का प्रयोग विश्व डोपिंग रोधी संस्था (World Anti Doping Agency-WADA) द्वारा प्रतिबंधित है।

  • इज़राइल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के दल ने एक मानव रोगी के ऊतक से विश्व के पहले 3-D प्रिंटेड हृदय का निर्माण किया है। इसका आकार खरगोश के हृदय के समान है। यह कोशिकाओं,रक्त वाहिकाओं, निलयों और कोष्ठों से पूर्ण पहला सफलतापूर्वक तैयार किया गया मानव हृदय है। इस प्रौद्योगिकी में अंगदान पर निर्भरता कम करने की क्षमता है।
  • स्किन-ऑन इंटरफेस(Skin-On Interface)

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के शोधकर्त्ताओं ने टेलीकॉम पेरिस टेक (Telecomm ParisTech) और फ्राँस की सोरबोन यूनिवर्सिटी (Sorbonne University) के साथ मिलकर इसको विकसित किया है, जो मानव त्वचा की बनावट एवं उसकी क्षमता (संवेदनशीलता) की नकल करता है।

सिलिकान झिल्ली की परतों से बने होने के कारण यह फोन के हार्ड केसिंग (Hard Casing) की तुलना में अधिक व्यावहारिक है और उपयोगकर्त्ताओं द्वारा किये गए संकेत को समझ सकता है।
कृत्रिम त्वचा इस उपकरण के माध्यम से उपयोगकर्त्ता के स्पर्श को स्थान (Location) एवं दबाव (Pressure) के साथ समझ लेती है। इस प्रकार यह गुदगुदी (Tickling) और प्रेम/ध्यान रखने (Caressing) जैसी गतिविधियों को पहचान सकती है।

इस प्रकार का शोध फोन, विअरेबल्स (Wearables) और कंप्यूटर जैसे इंटरैक्टिव उपकरणों में प्रयुक्त होने वाली स्पर्श प्रौद्योगिकी (Touch Technology) को अधिक विकसित कर सकता है।

‘वर्चुअल बायोप्सी' (Virtual Biopsy) उपकरण हाल ही में वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह उपकरण शरीर में बिना प्रवेश किये त्वचा के ट्यूमर कैंसर का पता लगाने में सक्षम है। कैंसर के इलाज की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्चुअल बायोप्सी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शरीर से ऊतकों या कोशिकाओं का नमूना लेकर प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता है। यह प्रक्रिया अतिशीघ्र ही (लगभग 15 मिनट में) पूरी हो जाती है।

प्रयोगशाला में विकसित चूज़े/चिकन की कोशिकाओं में बर्ड फ्लू को रोकने के लिये जीन-एडिटिंग तकनीक का उपयोग[सम्पादन]

  • एवियन इन्फ्लूएंजा एक विषाणु जनित रोग है,जिसे इन्फ्लूएंजा ए या टाइप ए (Type- A) विषाणु कहते है।‘H5N1’ बर्ड फ्लू का सामान्य रूप है।
  • महामारी का प्रकोप:-वर्ष 2009-10 में H1N1 वायरस के कारण होने वाली फ्लू महामारी में दुनिया भर से लगभग आधे मिलियन लोगों की मृत्युे हुई थी।
  • वर्ष 1918 में स्पेनिश फ्लू में लगभग 50 मिलियन लोग मारे गए।
  • स्वाइन फ्लू इन्फ्लूएंजा टाइप A वायरस का ही दूसरा नाम है जो सूअरों (स्वाइन) को प्रभावित करता है। यह आमतौर पर मनुष्यों को प्रभावित नहीं करता है,लेकिन वर्ष 2009-2010 में इसने एक वैश्विक प्रकोप (महामारी) का रूप धारण कर लिया था, तब 40 वर्षों से अधिक समय के बाद फ्लू के रूप में कोई महामारी पूरी दुनिया में फैली थी।
  • यह H1N1 नामक संक्रामक फ्लू वायरस के कारण होता है,यह सूअर,पक्षी और मानव जीन का एक संयोजन है,जो सूअरों में एक साथ मिश्रित होते हैं और मनुष्यों तक फैल जाते हैं।
  • H1N1 एक प्रकार से श्वसन संबंधी बीमारी का कारण बनता है जो कि बहुत संक्रामक होता है।
  • H1N1 संक्रमण को स्वाइन फ्लू के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि अतीत में यह उन्हीं लोगों को होता था जो सूअरों के सीधे संपर्क में आते थे।
  • H1N1 की तीन श्रेणियाँ हैं - A, B और C।A और B श्रेणियों को घरेलू देखभाल की आवश्यकता होती है,जबकि श्रेणी C में तत्काल अस्पताल में भर्ती कराने और चिकित्सा की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके लक्षण और परिणाम बेहद गंभीर होते हैं और इससे मृत्यु भी हो सकती है।

जीन एडिटिंग और अंतर्राष्ट्रीय विवाद[सम्पादन]

  • चीन के एक शोधकर्त्ता ने जीन एडिटिंग उपकरण CRISPR-CAS9 का प्रयोग एचआईवी (HIV) से संक्रमित एक गर्भवती महिला के भ्रूण के जीन को संशोधित/परिवर्तित करने के लिये किया।यह गर्भवती महिला अगस्त में जुड़वाँ बच्चियों को जन्म देने वाली है। जीन एडिटिंग प्रक्रिया द्वारा बच्चियों के जन्म लेने की घोषणा ने चिकित्सकीय शोध के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय विवाद को जन्म दे दिया है।

जीन एडिटिंग द्वारा जीन को निष्क्रिय कर एचआईवी संक्रमण को पूरे तरीके से खत्म किया जा सकता है। ऐसे किसी कार्य का परीक्षण करने के लिये विश्व भर में क्लिनिकल ट्रायल की कोई सुविधा मौजूद नहीं है। डॉ. हे द्वारा किया गया यह अनुप्रयोग वर्ष 2003 के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है जो स्पष्ट रूप से, प्रजनन उद्देश्य को पूरा करने के लिये भ्रूण के जीन से छेड़-छाड़ को प्रतिबंधित करता है।

चिकित्सक शोधकर्त्ता ने जुड़वाँ बहनों में उपस्थित CCR5 नामक जीन को निष्क्रिय करने हेतु CRISPR CAS-9 जीन एडिटिंग का प्रयोग किया। इस जीन एडिटिंग में एक प्रोटीन को एनकोड कराया जाता है ताकि एचआईवी कोशिका में प्रवेश कर उसे संक्रमित कर सके।

CCR5 जीन और HIV

  • एचआईवी के कुछ अन्य उपभेद कोशिकाओं को संक्रमित करने के लिये एक और प्रोटीन (CXCR4) का उपयोग करते हैं।
  • जो लोग CCR5 जीन की दो प्रतियों के साथ पैदा होते हैं लेकिन इनकी CCR5 जीन की दोनों प्रतियाँ क्रियाशील नहीं होती है वे एचआईवी संक्रमण के खिलाफ पूरी तरह से संरक्षित या प्रतिरोधी नहीं होते हैं।
  • यह भी संभावना है कि जीन एडिटिंग टूल के प्रयोग द्वारा जीनोम के अन्य भागों में अनपेक्षित रूप से म्युटेशन हो सकता है जिससे संबंधित व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँच सकता है।
  • दवाओं, ऑपरेशन के माध्यम से बच्चे के जन्म और बिना माँ के दूध के सेवन से भ्रूण में माँ से होने वाले वर्टीकल वायरल संचरण (Vertical Viral Transmission) को रोका जा सकता है। एचआईवी से पीड़ित महिलाओं से भ्रूण के संक्रमित होने संभावना अधिक होती है, कथित घटना में माँ एचआईवी-मुक्त थी, जबकि पिता एचआईवी संक्रमित थे।

CCR5 जीन के फायदे

  1. वेस्ट नील वायरस के खिलाफ लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।फेफड़े,गुर्दे, और दिमाग में होने वाले गंभीर किस्म के संक्रमण एवं बिमारियों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है।
  2. फेफड़ों में होने वाले इन्फ्लुएंजा के संक्रमण से लड़ने के लिये प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण करता है।इसकी अनुपस्थिति में हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली कार्य करना बंद कर देगी तथा मल्टीपल स्केलेरोसिस नामक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों की जल्द मृत्यु होने की संभावना दोगुनी हो जाएगी।

मलेरिया के उपचार हेतु नई खोज[सम्पादन]

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, संपूर्ण विश्व में मलेरिया से सालाना 400,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। परंतु हाल ही में पश्चिम अफ्रीका (West Africa) में किये गए एक परीक्षण में यह पाया गया है कि आनुवांशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified,GM) कवक एक-डेढ़ महीने में मलेरिया (Malaria) को खत्म कर सकता है।

  • शोधकर्त्ताओं ने इस परीक्षण हेतु कवक का आनुवंशिक रूप से संशोधित प्रारूप मेथेरिज़म पिंग्सशेंस (Metarhizum Pingshaense) का उपयोग किया।
  • मेथेरिज़म पिंग्सशेंस स्वभाव से लचीला (Flexible) होता है इसलिये इसे आसानी से आनुवांशिक रूप संशोधित किया जा सकता है।
  • जब इस कवक को यह ज्ञात हो जाता है कि वह किसी मच्छर के ऊपर बैठा हो तो यह बहुत तेज़ी से प्रतिक्रिया करता है।
  • GM कवक स्पाइडर नामक विष (Spider Toxin) का निर्माण करता है,जिसके कारण 45 दिन के अंदर 99% मच्छरों का सफाया हो जाता है।
  • संशोधित कवक में आनुवंशिक निर्देश प्राप्त करने की क्षमता विकसित की गई है ताकि यह मच्छर के अंदर प्रवेश कर विष बनाना शुरू कर दे।
  • मच्छरों में टॉक्सिन का प्रवेश कराये जाने हेतु ऑस्ट्रेलियन ब्लू माउंटेन फ़नल-वेब मकड़ी के जहर का प्रयोग किया जाता है।
  • GM कवक स्वाभाविक रूप से उन एनोफिलिस मच्छरों को संक्रमित करते हैं जो मलेरिया फैलाते हैं।
  • GM कवक केवल मच्छरों को पैदा करने वाले कीट एवं छल्ली (Mosquito’s Cuticle) में प्रवेश करते हैं,इसलिए यह कीटों के लाभदायक प्रजातियों जैसे कि मधुमक्खियाँ, ततैया इत्यादि के लिये किसी भी प्रकार का खतरा उत्पन्न नहीं करते।
  • मेथेरिज़म पिंग्सशेंस का परीक्षण प्रयोगशाला के अंदर प्रयोग में लाए जा रहे चादरों पर किया गया।
  • इस शोध का परीक्षण एक गाँव में किया गया जहाँ मक्खियों के लिये प्रयुक्त 6,550 वर्ग फीट के जाल (Fly Net) का प्रयोग किया जाता था।
  • इस शोध की सत्यता जाँचने हेतु आनुवांशिक रूप से संशोधित कवक को जंगल में छोड़ा गया जो कि सफल रहा।
  • पूर्व में मलेरिया की रोकथाम हेतु कीटनाशकों के प्रयोग से मच्छरों में कीटनाशक-प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण हुआ है।
  • इस अनुसंधान ने मलेरिया की रोकथाम हेतु ट्रांसजेनिक अप्रोच (Transgenic Approach) में नया मार्ग प्रशस्त किया है।


डिमेंशिया संज्ञानात्मक कार्य क्षमता (Cognitive Functions) का निरंतर कम होना है। यह दिमाग की बनावट में शारीरिक बदलावों (उम्र के बढ़ने) के परिणामस्वरूप होता है। ये बदलाव स्मृति, सोच, आचरण, बोधगम्यता तथा मनोभाव को प्रभावित करते हैं। डिमेंशिया विभिन्न प्रकार की बीमारियों जैसे- अल्जाइमर रोग या स्ट्रोक तथा चोटों के कारण होता है जो कि मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

रोगाणुरोधी प्रोटीनवैज्ञानिकों ने अंडे देने वाली एक स्तनपायी, एकिडना के दूध में एक रोगाणुरोधी प्रोटीन प्राप्त किया है। यह प्रोटीन पशुधन पर प्रयुक्त एंटीबायोटिक दवाओं के विकल्प के रूप में काम कर सकता है।एकिडना के दूध में पाया जाने वाला यह प्रोटीन बैक्टीरिया की कई प्रजातियों की कोशिका झिल्ली को क्षतिग्रस्त करते हुए संक्रमण के स्रोत को नष्ट कर सकता है। प्रोटीन का बड़ी मात्रा में उत्पादन करने के कई तरीके हैं, जैसे- ई. कोलाई बैक्टीरिया का उपयोग। वैज्ञानिकों ने पाया कि पशुधन में रोगाणुरोधी प्रतिरोधकों की संख्या बढ़ती जा रही है जिसे रोकने के लिये इस एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने कुछ घंटों पहले मृत सूअर के दिमाग में सेल फंक्शन को पुनः संचालित करने में कामयाबी हासिल की है। इस शोध का उपयोग भविष्य में हार्ट अटैक और स्ट्रोक के पीड़ितों के इलाज में मदद करने और मस्तिष्क आघात के रहस्यों को उजागर करने में किया जा सकता है। मानव एवं बड़े स्तनधारियों के मस्तिष्क में जैसे ही रक्त की आपूर्ति में कटौती होती है वैसे ही तंत्रिका तंत्र के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण कोशिकाएँ खराब होने लगती हैं और इस प्रक्रिया को अपरिवर्तनीय माना जाता है। लेकिन जर्नल नेचर में प्रकाशित परीक्षण के निष्कर्ष के अनुसार, सूअर के दिमाग में रक्त का प्रवाह हो सकता है और मृत्यु के कुछ घंटों पश्चात् भी कोशिका पुन: कार्य शुरू कर सकती है। परीक्षण NIH BRAIN (National Institutes of Health BRAIN), जो अमेरिकी अनुसंधान कार्यक्रम है, की एक टीम ने 32 सूअरों पर यह परिक्षण किया। उन्होंने मृत सूअरों को बिना खून या ग्लूकोज़ के प्रवाह के चार घंटे तक छोड़ दिया। इसके पश्चात् एक ऊतक सहायक प्रणाली का उपयोग करके उनके शारीर में कृत्रिम रक्त का प्रवाह कराया गया। निष्कर्ष उक्त प्रणाली के उपयोग से शोधकर्त्ताओं को आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त हुए। इससे कृत्रिम रक्त प्राप्त करने वाले सूअरों के दिमाग की कोशिकाओं की कार्यक्षमता पुन: बहाल हो गई। इस प्रकार उनकी रक्त वाहिका संरचना को पुनर्जीवित कर लिया गया।

इज़राइली वैज्ञानिकों ने इंसानी ऊतक और वाहिकाओं के साथ 3-डी प्रिंटेड हार्ट प्रस्तुत किया ===

  • इस सफलता ने भविष्य में प्रत्यारोपण की संभावनाओं को बल प्रदान किया है।
  • यह पहली बार है जब किसी ने ऊतकों, रक्त वाहिकाओं, निलय और कक्षों के साथ पूरे ह्रदय को सफलतापूर्वक डिज़ाइन करते हुए मुद्रित किया है। कुछ लोगों ने इससे पहले भी 3-डी प्रिंटेड हार्ट प्रस्तुत किया था किंतु उसमें ऊतक और रक्त वाहिका शामिल नहीं थे।
  • वैज्ञानिकों द्वारा मुद्रित यह ह्रदय खरगोश के ह्रदय के आकार का है। वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि इंसानी ह्रदय का आकर प्राप्त करने में भी इसी तकनीक की आवश्यकता होगी, लेकिन इसके लिये पर्याप्त ऊतकों हेतु कोशिकाओं का विस्तार एक चुनौती है।
  • वैज्ञानिकों ने एक मरीज़ के फैटी टिशू की बायोप्सी करते हुए इंक (3-डी प्रिंटिंग हेतु) विकसित की थी। इम्प्लांट रिजेक्शन के खतरे को खत्म करने के लिये यह महत्त्वपूर्ण होती है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हृदय रोग दुनिया में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है और वर्तमान में प्रत्यारोपण सबसे खराब मामलों में ही मरीज़ों के लिये उपलब्ध हो पाता है। कभी-कभी, किसी मरीज़ का शरीर भी प्रत्यारोपण को अस्वीकार कर देता है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है।


मानव मस्तिष्क की गुत्थी सुलझाने के क्रम में चीन के वैज्ञानिकों ने इंसानी दिमाग वाले बंदर तैयार किये हैं। इसके लिये मानव मस्तिष्क के MCPH1 जींस को 11 बंदरों में प्रयारोपित किया गया।अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना के साथ चीन के कनमिंग इंस्टीट्यूट ऑफ जूलॉजी तथा चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के शोधकर्त्ताओं ने प्रयोग के दौरान पाया कि मानव मस्तिष्क के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला यह जीन जब बंदरों के दिमाग में प्रत्यारोपित किया गया तो उन्हें विकसित होने में अधिक समय लगा। इन बंदरों ने किसी बात पर प्रतिक्रिया देने में भी तेज़ी दिखाई तथा शॉर्ट टर्म मेमोरी में भी बेहतर प्रदर्शन किया।

  • ग्रीक और स्पैनिश डॉक्टरों की एक टीम ने दो महिलाओं और एक पुरुष के आनुवंशिक तत्त्वों का उपयोग करके एक बच्चे (ग्रीस में) को जन्म दिया है।
  • चिकित्सा जगत में इस तकनीक को स्पिंडल ट्रांसफर के नाम से जाना जाता है। इस तकनीक में तीन लोगों के डीएनए के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है। आम भाषा में इस तकनीक को थ्री-पर्सन बेबी या थ्री-पैरेंट बेबी भी कहा जाता है।
  • इस तकनीक की सहायता से पहले बच्चे का जन्म मेक्सिको में हुआ था।
  • इस प्रक्रिया को माइटोकॉन्ड्रियल बीमारियों से पीड़ित माताओं तथा मौजूदा आईवीएफ उपचारों में मदद करने हेतु विकसित किया गया था।
  • माइटोकॉन्ड्रिया हमारे पूरे डीएनए का करीब 0.0005% डीएनए धारण करता है किंतु जन्म लेने वाले बच्चे इसे केवल अपनी माँ से ही प्राप्त करते हैं। यदि माँ के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए में कोई खामी हो तो बच्चे में भी बीमारी उत्पन्न होने की पूरी संभावना बन जाती है।

केरल के मालापुरम में एक सात वर्षीय बच्चे में वेस्‍ट नील वायरस (West Nile Virus- WNV) के लक्षण पाया गया[सम्पादन]

WNV एक मच्‍छर जनित बीमारी है। यह बीमारी मुख्यत: संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के द्वीपीय क्षेत्रों में पाई जाती है। इसकी खोज पहली बार 1927 में युगांडा के पश्चिमी नील उप-क्षेत्र में की गई थी। WNV का पहला गंभीर प्रकोप 1990 के दशक के मध्य में अल्जीरिया और रोमानिया में हुआ था। यह वायरस संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में 1999 में सामने आया। उस वर्ष न्यूयॉर्क में 62 मनुष्य, 25 घोड़े और अनगिनत पक्षी इस वायरस से ग्रसित पाए गए थे। तब से कम-से-कम 48 राज्यों में WNV से प्रभावित लोगों की 40,000 से अधिक रिपोर्ट्स प्राप्त की गई हैं और यह अमेरिका में मच्छरों से मनुष्यों में फैलने वाला आम वायरस है। WNV के लक्षण WNV से संक्रमित लगभग 80% लोगों में WNV का या तो कोई लक्षण नहीं दिखता है या हल्का बुखार हो सकता है। इसमें सिरदर्द, तेज़ बुखार, थकान, शरीर में दर्द, उल्टी, कभी-कभी त्वचा पर चकत्ते और लसीका ग्रंथियों (Lymph Glands) में सूजन आ सकती है। यह वायरस किसी भी उम्र के व्यक्ति को अपनी चपेट में ले सकता है। हालाँकि, 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और कुछ प्रत्यारोपण के रोगियों के WNV से संक्रमित होने पर गंभीर रूप से बीमार पड़ने का अधिक खतरा होता है। वेस्ट नील वायरस मनुष्यों में एक घातक न्यूरोलॉजिकल बीमारी का कारण बन सकता है। वर्तमान में WNV के लिये कोई टीका (Vaccine) उपलब्ध नहीं है।

वेस्ट नील वायरस हाल ही में केरल के मलप्पुरम और कोझिकोड ज़िलों में वेस्ट नील वायरस के कारण संक्रमण फैलने के कई मामले सामने आए हैं। इसके कारण राज्य के स्वास्थ्य विभाग को इस क्षेत्र में वेस्ट नील फीवर और संक्रमण के स्रोत के विषय में जानकारी प्राप्त करना कठिन हो गया है।

आमतौर पर वेस्ट नील वायरस (West Nile Virus-WNV) अफ्रीका, यूरोप, मध्य पूर्व, उत्तरी अमेरिका और पश्चिम एशिया में पाया जाता है, यह विषाणु/वायरस जनित संक्रमण के लिये उत्तरदायी है। यह आमतौर पर मच्छरों द्वारा फैलता है और लोगों में तंत्रिका/स्नायु (Neurological) संबंधी बीमारी के साथ-साथ मृत्यु का कारण भी बन सकता है। वर्ष 1937 में पहली बार एक माहिला में इस बीमारी की पहचान की गई थी जो पश्चिमी नील नदी के युगांडा ज़िले की निवासी थी, एक बार फिर से इस बीमारी को नील नदी क्षेत्र के पक्षियों में ही देखा गया है। इस विषाणु (Virus) को मनुष्यों और जानवरों में इंजेक्ट किया जा सकता है (अथवा प्रवेश कराया जा सकता है) तथा अन्य संक्रमित जानवरों, उनके रक्त या ऊतकों के संपर्क में आने से भी यह संचरित हो सकता है। कुछ दुर्लभ मामलों में इस संक्रमण के अंग प्रत्यारोपण, रक्त संचारण (Blood Transfusion) और स्तनपान के माध्यम से फैलने के मामले भी सामने आए हैं। अभी तक मानव से मानव के संक्रमित होने की घटना देखने को नहीं मिली है। WHO के अनुसार, संबंधित बीमारी के लक्षण या तो पकड़ में ही नहीं आ रहे है या 80% संक्रमित लोगों में यह संक्रमण गंभीर वेस्ट नील के बुखार के रूप में व्याप्त हैं।

न्यू डेल्ही सुपरबग जीन अब आर्कटिक पहुँचा लगभग एक दशक पहले दिल्ली के पानी में खोजा गया यह जीन 100 से ज़्यादा देशों में देखा जा चुका है और कई जगहों पर इसके नए वैरिएंट भी देखने को मिले है। आर्कटिक के स्वालबार्ड द्वीप (Svalbard) के आठ अलग-अलग स्थानों से जुटाए गए सैंपल में एंटीबायोटिक रज़िस्टेंट जीन के रूप में NDM-1 की पहचान की गई है जिसे न्यू डेल्ही मैटलो-बीटा-लैक्टामेज़-1 (New Delhi Metallo-beta-lactamase-1) कहा जाता है। इस तरह के एंटीबायोटिक रज़िस्टेंट जीन (ARG) विभिन्न सूक्ष्म जीवों में एक से ज़्यादा दवाओं के प्रति प्रतिरोधकता (Multidrug-resistant-MDR) पैदा करते हैं।

  • विभिन्न बैक्टीरिया में दवा प्रतिरोधकता पैदा करने में सक्षम प्रोटीन NDM-1 की पहचान सबसे पहले वर्ष 2008 में की गई थी। उस समय क्लीनिकल परीक्षण में इस प्रोटीन वाले जीन blaNDM-1 को देखा गया था।
  • विभिन्न जीवों और मनुष्यों के पेट में मिलने वाले blaNDM-1 व अन्य एंटीबायोटिक रज़िस्टेंट जीन (ARG) संभवतः आर्कटिक आने वाले पक्षियों और पर्यटकों के ज़रिये यहाँ पहुँचे होंगे।
  • ध्रुवीय क्षेत्र धरती के प्राचीनतम संरक्षित पारिस्थितिक तंत्र में शामिल हैं। इनसे प्री-एंटीबायोटिक काल को समझने में मदद मिलती है।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. https://nationaldaycalendar.com/national-moon-day-july-20/
  2. https://www.thehindu.com/sci-tech/science/russia-sends-its-first-humanoid-robot-fedor-into-space/article29220831.ece