हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )/साठोत्तरी साहित्यिक आन्दोलनों की प्रवृतियाँ

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )
 ← आंचलिक उपन्यास साठोत्तरी साहित्यिक आन्दोलनों की प्रवृतियाँ जनवादी साहित्य → 

साठोत्तरी साहित्य की प्रवृतियाँ[सम्पादन]

साठोत्तरी हिन्दी साहित्य में जीवन और जगत से जुड़ी प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति को अत्यंत यथार्थ पूर्ण ढंग से चित्रित किया गया है। भरसक प्रयासों के बाद भी जब स्वराज्य को रामराज्य में परिणत ना किया जा सका तो जनमानस में मोहभंग की स्थिति पैदा हो गई। जीवन के इस कटु यथार्थ का सामना करने में उसे जिन दबाव तथा तनावों को झेलना पड़ा है, जिन-जिन आरोहों-अवरोहों से गुजरना पड़ा है,उसकी स्पष्ट छाप हमें साठोत्तरी साहित्य में दिखाई पड़ती है। पारंपरिक मूल्यों, मान्यताओं का विरोध करने वाली इस समय की कविता और कहानी में प्रतिक्रियात्मक स्वर ही अधिक प्रबल है। यथास्थिति को नकार कर आमूल-चूल परिवर्तन लाने की आकांक्षा तथा समकालीन परिवेश एवं यथार्थ को स्पष्ट‌ बेलाग शब्दों में व्यंजित करना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। साठोत्तरी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों का अनुशीलन इस प्रकार किया जा सकता है-

विघटित व्यवस्था के प्रति आक्रोश[सम्पादन]

व्यवस्था ही किसी देश अथवा समाज की पहचान बनाती है उसे स्थायित्व प्रदान करती है किन्तु जब इस व्यवस्था के मूल्यों आदर्शों एवं परंपराओं की अवहेलना कर इसमें मनमाने ढंग से परिवर्तन किए जाते हैं तो या विघटन का शिकार हो जाती है और कोई भी विघटित व्यवस्था कल्याणकारी नहीं हो सकती है। यही कारण है कि साठोत्तरी हिन्दी कविता में भी ऐसी अव्यवस्थित व्यवस्था के प्रति तीव्र आक्रोश एवं असंतोष दिखाई पड़ता है। इस विषम अव्यवस्था को दूर करने का एक ही उपाय है - वह है जनक्रांति।

जीवन का वास्तविक निरूपण[सम्पादन]

कोई भी रचना तभी जीवन्त और प्राणवान बन सकती है, जब उसका जुड़ाव जीवन से हो। चूँकि रचनाकार अपने परिवेश के प्रति आबद्ध होता है। अतः यह आवश्यक है कि बदलते मानव मूल्यों के साथ-साथ साहित्य के विधाओं का तेवर भी परिवर्तित हो। साठोत्तरी साहित्य में जीवन की निर्मम वास्तविकताओं को अत्यंत ईमानदारी से निरूपित किया गया है।

मोहभंग की स्थिति[सम्पादन]

छठें दशक का साहित्य पूर्णतः मोहभंग का साहित्य है। भ्रष्ट व्यवस्था, राजनेताओं की वादाखिलाफी, बढ़ते विदेशी ऋण, पूंजीवादी अधिनायकत्व, भूखमरी, बेरोजगारी, कालाबाजारी, आदि समस्याओं ने आम आदमी के मन में असंतोष एवं आक्रोश की भावना को ही उपजाया। धूमिल ने आजादी पर व्यंग्य करते हुए लिखा है-

क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है

जिन्हें एक पहिया ढोता है

या इसका कोई खास मतलब होता है?

जनवादी चेतना की विस्तृत व्यंजना[सम्पादन]

साठोत्तरी साहित्य में आस्था और अनास्था दोनों का संकुल चित्रण मिलता है।जनवाद‌ के मूल में सर्वहारा वर्ग की मुक्ति और संघर्ष के लिए किए गए सचेत प्रयास एवं वर्गविहीन समाज की परिकल्पना प्रमुख है। वहीं साठोत्तरी साहित्य की भाषा अभिजात्य और संस्कार की भाषा नहीं है अपितु अनुभवों की मिट्टी में तपी-निखरी आम बोलचाल की भाषा है। उदाहरण स्वरूप---

बाबूजी सच कहूँ-मेरी निगाह में

न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है

मेरे लिये,हर आदमी एक जोड़ी जूता है।


साठोत्तरी साहित्य के समस्त प्रवृत्तियों के परिशीलन के उपरांत कहा जा सकता है कि यह साहित्य युगीन सच को प्रस्तुत करने वाला साहित्य है। परिवेश का सच्चा और बेबाक चित्रण यही हुआ है। यहां मुक्ति की आकांक्षा भी है और भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति विक्षोभ भी।