आदिकालीन एवं मध्यकालीन हिंदी कविता/मीराबाई

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राग हमीर

बस्याँ म्हारे णेणणमाँ नंदलाल।।टेक।।
मोर मुगट मकराक्रत कुण्डल अरुण तिलक सोहाँ भाल।
मोहन मूरत साँवराँ सूरत णेणा बण्या विशाल।
अधर सुधा रस मुरली राजाँ उर बैजन्ती माल।
मीराँ प्रभु संताँ सुखदायाँ भगत बछल गोपाल॥३॥

व्याख्या

म्हां गिरधर आगां, नाच्यारी ॥टेक॥
णाच णाच म्हां रसिक रिझावां, प्रीत पुरातन जांच्या री।
स्याम प्रीत री बाँध घुँघरयां मोहण म्हारो सांच्यांरी।
लोक लाज कुलरा मरजादां जगमां णेक णा राख्यांरी।
प्रीतम पल छण णा बिसरावां, मीरां हरि रंग राच्यांरी॥१७॥

व्याख्या

राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी।
सांकडली सेरयां जन मिलिया क्यूं कर फिरूँ अपूठी।
सत संगति मा ग्यान सुणै छी, दुरजन लोगां ने दीठी।
मीरां रो प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अंगीठी॥३३॥

व्याख्या

पग बांध घूंघरया नाच्यांरी।
लोग कह्यां मीरां बावरी, सासु कह्यां कुलनासां री।
विख रो प्यालो राणा भेज्यां, पीवां मीरा हांसां री।
तण मण वारयां हरि चरणामां दरसण अमरित प्यास्यां री।
मीरां के प्रभु गिरधर नागर, धारी सरणां आस्यां री॥३६॥

व्याख्या

हेरी म्हा दरद दिवाणां म्हारां दरद न जाण्यां कोय॥
घायल री गत घायल जाण्यां, हिबड़ो अगण संजोय।
जौहर की गत जौहर जाण्यां, क्या जाण्यां जिण खोय।
दरद की मारयां दर दर डोलयां बैद मिल्या णा कोय।
मीरां री प्रभु पीर मिटांगा जब बैद सांवरो होय॥७०॥

व्याख्या

संदर्भ